जून 2017
अंक - 27 | कुल अंक - 60
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

आलेख

कृष्ण-काव्य में नारी: उमेशचन्द्र

काल-क्रमानुसार सामाजिक गतिविधि में निरन्तर परिवर्तन होता रहता है। नारी सामाजिक प्राणी होने के कारण युगीन गतिविधियों का अनुसरण करती हुई अपने जीवन-क्रम में विकास अथवा ह्रास के नाना रूपों का विधान करती निरन्तर आगे बढ़ती जा रही है। भारतीय इतिहास के प्रारम्भिक काल से नारी अपनी मानसिक एवं शारीरिक शक्तियों का दान समाज को देती आई है। वैदिक साहित्य से लेकर हिंदी के भक्तिकाल तक नारी के विभिन्न रूपों का उल्लेख लिता है, कि नारी जीवन की दैनिकचर्याओं की पूर्ति के साथ ही साथ वेद की ऋचाओं का निर्माण करना, समर-क्षेत्र में पुरुष की सहयोगिनी के रूप में कार्य करना तथा समाज का विभिन्न रूप में नेतृत्व रहा है।
मेरे इस शोध पत्र का विषय ‘‘कृष्ण काव्य में नारी’’ है। भक्त कवियों का नारी के प्रति क्या दृष्टिकोण रहा है ? वह नारी को किस रूप में देखते हैं, इस विषय पर चर्चा करना ही इस शोध पत्र का उद्देश्य है। सन्तों और भक्त कवियों ने अपनी वैराग्यपूर्ण वृत्ति से प्रेरित होकर नारी को ’सर्पिणी’ और ’भव-बन्धन’ का मुख्य कारण बताया तो वहीं तुलसीदास ने उसे माता और जीवन की सच्ची सहधर्मिणी के रूप में भी चित्रित किया। मध्ययुग के वैभवपूर्ण भौतिक वातावरण में नारी के प्रति एक विशेष प्रकार के दृष्टिकोण का आविर्भाव हो जाना कोई आश्चर्यजनक बात नहीं थी। कृष्ण-काव्य में नारी की निन्दा और प्रशंसा दोनों बातें पाई जाती हैं। एक ओर सन्तों ने उसे काम-स्वरूपा जानकर उसकी निन्दा की है, तो दूसरी ओर भारतवर्ष में ही यह भी कहा गया है कि जहां स्त्रियों का आदर होता है, वहां देवता विचरण करते हैं। स्त्री के सम्बन्ध में मीरा का दृष्टिकोण अन्य भक्तिकालीन कवियों में एकदम अलग है। मीरा की कविता में सामन्ती समाज और संस्कृति की जकड़न से बेचैन स्त्री-स्वर की मुखर अभिव्यक्ति हुई है। उनकी स्वतंत्रता की आकांक्षा जितनी अध्यात्मिक है, उतनी ही सामाजिक भी। आज भी स्त्री-विमर्श के बुलन्द नारे के बीच मीरा का व्यक्तित्व एवं उनका काव्य प्रासंगिक है। भक्त कवियों के बारे में सूरसागर में नंददुलारे बाजपेयी लिखते हैं- ’’नारी सौन्दर्य की उदात्तता, उसके तीनों रूपों- माता, पत्नी और कन्या में भक्तिकाल के कवियों ने अंकित की है। ज्ञानमार्गियों के लिए माता परमात्मा स्वरूप भी है अथवा कहना चाहिए कि उन्होंने माता में परमात्मा की विशेष स्थापना देखी है।‘’1  इसी खण्ड में बाजपेयी जी आगे लिखते हैं-  ’’सूरदास ने माता यशोदा के मक्खन समान स्नेह, आत्मत्याग और निःस्पृह वात्सल्य का जो चित्र प्रस्तुत किया है, वह मधुरता के साथ उदात्त है।‘’2  नारी हृदय कोमलता, दया, सहानुभूति और स्नेह की सजीव प्रतिमा है। कार्यो  रूपों और स्थितियों के अनुसार नारी के अनेक नाम भारतीय साहित्य में प्रचलित है, जिससे नारी के विभिन्न स्वरूपों का बोध होता है।


कृष्ण काव्य में सूरदास ने संतों द्वारा परम्परा में प्राप्त नारी-निंदा को और भी अग्रसर किया है। सूरसागर प्रथम खण्ड में कृष्ण-कथा-वर्णन के पूर्व राजा पुरु की कथा में कवि नारी के स्वभाव की तुलना नागिन से भी अधिक भयंकर मानता है। नागिन का विष तो तभी व्याप्ता है जब वह काट लेती है, पर नारी अपनी दृष्टि-निक्षेप मात्र से मानव को चेतना-हीन कर देती है। इसका उदाहरण देखिए-  ‘‘सुकदेव कहौ सुनौ हौ राव, नारी एक सुभाव। नागिन के काटे विष होई, नारी चितवत नर रहै मोह।।‘’3  कवियों ने माना है कि नारी हृदयहीन तथा कठोर होती है लेकिन विडम्बना देखिए कि नर-नारी से प्रेम करता है, परन्तु वह नृशंसता से उसका परित्याग करता है-  ‘‘नारी सौ नर प्रीति लगावै, पै नारी तिह मन महि लावै, नारी संगै प्रीति जो करै, नारी ताहि तुरत परिहरै।‘’4


नारी के स्वभाव का जो चित्र उर्वशी के रूप में खींचा गया है, वह दया ममता से हीन है। संतों के समान कृष्ण काव्य के कवि पराई नारी से दूर रहने का उपदेश देते हैं। सूर सागर से ही एक और उदाहरण देखिए-  ‘‘भामिनी और भुजंगिनी कारी, इनके विषहि डरिए, रांचेहु विरचै सुख नाहीं, भूल न कबहुँ पम्यैये, इनके बस मन परैं मनोहर, बहुत जतन करि पैयौ।‘’5  उनके अनुसार नारी के संबंध मिथ्या, माया के मूल और भक्ति में बाधक हैं। पुनः कृष्ण-चरित वर्णन में भी दूती मानिनी राधा के मान-मोचन में भामिनी और काली सर्पिणी की तुलना करते है। सूरसागर में ही एक जगह वर्णन मिलता है-  ‘‘कबहूँ बालक मुँह न दीजियौ, मुँह न दीजियौ नारी, जोई मन करै, सोई करि डारैं, मूड़ चढ़त है भारी।‘’6  दान लीला कृष्ण में नारी के प्रति हीनता प्रदर्शित करते हुए कवि कहता है कि बालक और स्त्री को अधिक सिर नहीं चढ़ाना चाहिए। स्पष्टतः इन कवियों ने नारी को माया का रूप, मिथ्या और गहिंत माना है। परन्तु उपास्य के प्रति अपनी भावनाओं की अभिव्यंजना प्रायः नारी भाव से की। गोपी रूप में ब्रजचन्द के साथ रास ही इनका काम्य रहा। कृष्ण-भक्तों को नारी के दो रूप मान्य हैं, सामान्य और विशेष। सामान्य रूप में वह लौकिक नारी है, जो माया और मिथ्या की प्रतीक है। समाज के बन्धनों और कुलमर्यादा का पालन उसके लिए अनिवार्य है। विशेष रूप गोपियों का है,  जो पार्वत्य सरिता के समान अप्रतिहत वेग वाली है। मर्यादा के कगारे, लोक-कानि और कुल-कानि के तटीय वृक्ष कृष्ण-प्रेम की प्रचण्डता के समक्ष नष्ट हो जाते हैं। इस विशेष रूप में आर्य-पथ त्याग करने पर भी यह दोष की भागिनी नहीं होती, इसका कारण है कि यह गोपियाँ स्वयं भक्त अथवा वेद की ऋचाएँ हैं। वह माता-पिता के स्नेह, कुल की मर्यादा आदि बन्धनों का परित्याग कर देती हैं। किन्तु उनका यह मर्यादा त्याग भी श्लाध्य है। सूरदास जी लिखते हैं- ‘‘भार भयौ जब पृथ्वी पर तब हरि लियौ अवतार, वेद ऋचा ह्वै गोपिका हरि संग कियौ विहार। जो कोउ भरता भाव हृदय धरि हरि पद ध्यावै, नारि पुरष कोउ होइ स्रुति ऋचा मति पावै।‘’7


कृष्ण-काव्य की नारी भावना के विश्लेषण के पूर्व उसके मधुर भाव की भक्ति के सिद्धान्त पर दृष्टि डाल लेना समीचीन होगा। बल्लभ तथा अन्य सामयिक विद्वानों के द्वारा की हुई व्याख्याओं से भक्ति का स्थायी भाव प्रीति सिद्ध होता है। मानव संबंध के जितने रूप संभव हैं, उन सबकी प्रीति को इन कवियों ने ईश्वरोन्मुख किया है। इन्होंने ईश्वर को तीन रूपों में देखा है- एक स्त्री रूप में, दूसरे पुरुष रूप में और तीसरे युगल रूप में। कृष्ण-भक्तों में ईश्वर की युगल रूप की उपासना तथा एकाकी रूप की उपासना दोनों ही मान्य हैं। भक्तों ने लोक में उपलब्ध प्रीति के भिन्न-भिन्न स्वरूपों को प्रेम में ही पर्यवसित किया है। सांसारिक अनुरक्ति में लिप्त मानव को मुक्त करने के लिए विषय-तृप्ति का साधन भी भगवान को ही माना है। प्रेम के समस्त सम्बन्धों में पूर्णता एवं दृढ़ता, सहज समर्पण एवं प्रणय की भावना स्त्री-पुरुष संबंध में ही अधिक सम्भव है। इन अष्टछाप के कवियों ने स्त्री को लेकर, संयोग की सरसता और वियोग की व्याकुलता के चित्रण में स्वकीया भाव को ही प्रधानता दी है। परकीया भाव की अभिव्यक्ति बहुत कम है। वास्तव में राधा और गोपी का विह्वल प्रेम, कीट और भृंग की गति, व्याकुल विरह-वेदना इन भक्तों के हृदय की ही अभिव्यंजना है। अष्टछाप के कवियों ने भगवान को सभी रूपों में उपासना योग्य माना है, परन्तु उनकी भक्ति में स्त्री-भाव की प्रधानता है। ‘‘कृष्ण-प्रेम-मतवाली उन गोपिकाओं को, जो अविवाहित हैं, अनन्यपूर्वा मानकर उनमें पूर्वराग का आरोप किया है। राधाबल्लभ सम्प्रदाय की सखी-भाव की उपासना का भी प्रभाव इन कृष्ण-भक्त कवियों पर पड़ा है। इसमें भक्त का अस्तित्व दर्शक रूप में, सखी चेरी भाव से होता है। वह कृष्ण और राधा की परिचर्या कर उनके नित्य विलास में सहायक होता है। जैसा कि कहा जा चुका है इन कृष्ण-भक्तों ने कृष्ण की नारी-भाव से उपासना के अन्तर्गत दो भावों को प्रधानता दी है, वात्सल्य भाव तथा दाम्पत्य भाव। अपनी भावनाओं का उन्नयन उन्होंने भारी बन कर ही किया है।‘’8
 

कृष्ण-भक्तों ने काव्य के मध्य सामान्य अथवा लौकिक नारी के लिए आदर्श-विधान किया है। इस संसार में जन्म लेकर कुलमर्यादा और लोकधर्मपालन ही श्रेयस्कर है। युग की परम्परा के अनुसार कृष्ण-भक्तों ने भी नारी की चरमगति पति को ही बताया। उनके लिए पतिव्रत धर्म ही चारों पदार्थों का आवाहक है। सूरसागर में एक जगह वर्णन मिलता है-  ‘‘नारी पतिव्रत मानै जो कोई, चारिं पदारथ पावै सोई।‘’9  सूरसागर में सूरदास जी आगे लिखते हैं-  ‘‘तजि भरतार और को भजिए, सो कुलीन नहिं होई। मरै नरक, जीवत इस जग में भला कहें नहिं कोई।‘’10  अर्थात् अपने पति को त्याग कर अन्य से प्रीति करने वाली नारी जीवन-पर्यन्त लोकापवाद अपजस और मृत्यु-उपरान्त घोर नरक की भागिनी होती है। इस प्रकार सामान्य नारी के लिए कृष्ण-भक्त कवि मर्यादा पालन, पतिव्रत धर्म ही सर्वश्रेष्ठ और श्रेयस्कर बताते हैं। सामान्य नारी के लिए जो अवगुण हैं, विशेष के लिए वही गुण हैं। नारी के लिए समाज की मान्यताओं का पालन अनिवार्य है। अखण्ड पतिव्रत ही उसकी मुक्ति का साधन है। सामान्य रूप में नारी काम-वासना की मूल मानी जाकर भत्र्सना और तिरस्कार की पात्र रही है। इन काव्यकारों का नारी-निन्दा का स्वर यदि सन्तों से अधिक नहीं, तो समान उग्र तो है ही। कामवासना की मूल प्रेरणा के अतिरिक्त इन भक्तों ने नारी को विश्वास के अयोग्य तथा नृशंस भी बताया है। सामान्यतः कृष्ण-भक्तों ने नारी का,  प्रेयसी-पत्नी आदि विविध रूपों में जो चित्रण किया है, वह सरल और स्वाभाविक है। यद्यपि कृष्ण के लोकरंजक रसेश्वर स्वरूप को लेकर काव्य रचना करने वाले कवियों से जीवन के सामाजिक पक्ष में आदर्श-विधान की आशा तथा अपेक्षा नहीं की जा सकती, पर इन कवियों ने पति एवं पत्नी दोनों को अपने कत्र्तव्यों के समुचित पालन का निर्देश दिया। इनके काव्य में नारी के धार्मिक तथा आर्थिक अधिकारों के विषय पर कोई प्रकाश नहीं पड़ता है, परन्तु भक्ति के क्षेत्र में पुरुष और नारी का भेदभाव इन्हें मान्य नहीं है। इनके अनुसार शुद्ध-हृदय तथा भक्ति भाव से जो कोई हरि की उपासना करता है, वह नर अथवा नारी अभय पद का अधिकारी है।
 

भक्त कवि सूर की राधा भी एक आदर्श कृति है जो अपने कौमारव्रत की  पूर्णता में ही अपने जीवन का सफल अनुभव करती है। वासना का कल्मष कहीं भी उसकी साधना को कलंकित नहीं कर पाता है। प्रेम का ऐसा समुज्वल, परमपूत आदर्श अन्यत्र प्रायः  नहीं ही मिलेगा। भक्तिकाल के साहित्य में नारी के कतिपय कुटिल रूप भी आए हैं। यथा जायसी की देवपाल की दूती, सूर की पूतना और तुलसी की मंथरा, शूर्पनखा। ये चरित्र सामान्य जीवन के एक पक्ष विशेष का चित्रण करते हैं। भक्त कवियों ने जीवन की सामान्य वृत्तियों का परिचय कराते हुए उदत्त वृत्तियों के स्पृहणीय रूप की व्यंजना की है। उनके द्वारा स्थल-स्थल पर नारी के प्रकृत रूप-व्यापार का उल्लेख हुआ है, साथ ही उस रूप-व्यापार की भी प्रतिष्ठा हुई है जो हमारी मानवता के रूप को  सँवारता है, जो हमारी जीवनाशा का केन्द्र बिन्दु बनता है, जो हमारी समस्त ईप्सा को संजोता है, और जो हमारे जीवन का सत्य एवं साध्य बनता है।
निष्कर्षतः  कहा जा सकता है कि भक्तिकाल में विभिन्न कवियों द्वारा चित्रित नारी के रूपों को विभिन्न रूपों में चित्रित किया है। कबीर ने नारी को माया रूप में देखकर उसे साधना-पथ का बाधक मानकर उसकी घोर निंदा की, तो जायसी ने सामान्य जीवन में नारी-जीवन के अनेक पक्षों का उद्घाटन किया। सूर-साहित्य में यद्यपि नारी चित्रण में गृहणी, मातृत्वादि के प्रौढ़ स्वरूप हैं तो वहीं उसमें नारी जीवन की समग्रता का अभाव है। सूर ने नारी का एकांगी चित्र दिया है और वह है उसका वियोगी रूप और नारी की विविध मनोदशाओं का वर्णन मिलता है।




संदर्भ-

1- सूरसागर, पहला खण्ड, सं.  नन्द दुलारे बाजपेयी, पृ.  सं.  255 से 594 तक के विविध प्रसंग
2- वही, पृ. सं. 255 से 594  तक के विविध प्रसंग
3- सूर- सूरसागर  प्रथम खण्ड,  नन्ददुलारे बाजपेयी,  नवम् स्कंध, पृ.  180
4- वही,  पृ. 180
5- वही,  पृ.  1187-2826
6- वही,  पृ. 786, 1518, 2136
7- सूरदास,  सूरसागर,  खण्ड 1, पद 1175, 1793
8- सावित्री सिन्हा,  मध्यकालीन हिन्दी कवयित्रियाँ,  पृ.  95, 1953, दिल्ली।
9- सूर- सूरसागर,  प्रथम खण्ड,  पृ.  539, 800, 1418
10- सूर- सूरसागर,  प्रथम खण्ड, पृ.  611, 1017, 1635


- डॉ. उमेश चन्द्र सिरसवारी

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