मई 2017
अंक - 26 | कुल अंक - 61
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

ग़ज़ल-गाँव

ग़ज़ल-

हलों से जमीं पर फ़सल लिख रहे हैं
बड़ी ख़ूबसूरत ग़ज़ल लिख रहे हैं

जिन्हें झोपड़ी भी मयस्सर नहीं, वो
अमीरों के हिस्से महल लिख रहे हैं

बड़ी शातिराना सियासत चली अब
लगाकर स्वयं आग, जल लिख रहे हैं

वही घोषणा-पत्र फिर ला रहे हैं
कि परिणाम ख़ुद का सफल लिख रहे हैं

दिया ही नया एक दीपक जलाए
यहाँ सूर्य को हम विफल लिख रहे हैं

उन्हें चाँद बस गोल रोटी दिखी, फिर
कहाँ आप चेहरा कमल लिख रहे हैं

निचोड़ी सदी जब कई पीढ़ियों ने
ख़ुशी शाह की एक पल लिख रहे हैं


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ग़ज़ल-

जीत की झूठ पर ख़ुमारी है
साँच फिर एक बार हारी है

ख़्वाहिशो वक़्त दो मुझे थोड़ा
एक बेटी अभी कुँवारी है

ज़िन्दगी मौत से हुई बदतर
भूख से रोज़ जंग जारी है

आदमी चाँद पर भले पहुँचा
ज़ह्न में 'निर्भया', 'निठारी' है

मैं कहाँ क़ब्र में अकेला हूँ
हस्रतों का हुज़ूम भारी है

लोकशाही भले यहाँ अब है
राजसी ठाट-बाट जारी है

अच्छे दिन आएँगे भला कब तक
मुल्क में आज बेक़रारी है

बिजलियो, बारिशो तरस खाओ
फूस की झोंपड़ी हमारी है


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ग़ज़ल-

ज़माने देख ले मैं छा रहा हूँ
निहत्था दुश्मनों में जा रहा हूँ

चलो तुम नाव अपनी ढूंढ लो अब
समंदर साथ लेकर आ रहा हूँ

छिपाकर घाव अपने यार से मैं
उसे ढाँढस बंधा कर आ रहा हूँ

उछाला एक सिक्का आज फिर से
मुकद्दर आज़माकर आ रहा हूँ

दवा ही मर्ज़ को देती हवा अब
दवा तो प्यार की मैं खा रहा हूँ

दिया ही रोज क्यों जलता रहे शब
तेरा अब  घर जलाने आ रहा हूँ

सियासत में मची क्यों खलबली है
तराना अम्न का जो गा रहा हूँ


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ग़ज़ल-

मिसरा मिसरा हर्फ़ सजाकर रखता है
शायद कोई दर्द छिपाकर रखता है

बिकना उसका शौक़ नहीं, मजबूरी है
ख़ुद को इक बाज़ार बनाकर रखता है

सूरज, जुगनू, चाँद, सितारे सब कायल
आँधी में वो दीप जलाकर रखता है

कुछ ऐसे वो मार गिराता नफ़रत को
दुश्मन की दस्तार उठाकर रखता है

खुश है यूँ परिवार ग़रीबी में उसका
रिश्तों में वो प्यार मिलाकर रखता है


- प्रमोद वत्स

रचनाकार परिचय
प्रमोद वत्स

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ग़ज़ल-गाँव (1)