नवम्बर 2016
अंक - 20 | कुल अंक - 60
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

आलेख

हिंदी बाल कविताओं में पर्यावरण चेतना: उमेश चन्द्र


पर्यावरण मानव-जीवन का अभिन्न अंग है। मानव पर्यावरण का अनिवार्य घटक है। मानव के चारों ओर उसे आवृत करता हुआ भौतिक जगत का जो परिआवरण है, वही पर्यावरण है। इस प्रकार "हम जीवधारियों तथा वनस्पतियों के चारों ओर जो आवरण है, उसे पर्यावरण कहते हैं।"1
मानव के साथ-साथ विविध प्रकार की वनस्पतियाँ और जीव जंतु तथा प्राकृतिक-संपदा इसमें सम्मिलत हैं। पर्यावरण की सुरक्षा, सुधार एवं संवर्द्धन मानव-मात्र की समृद्धि और भविष्य की पीढि़यों के कल्याण के लिए अनिवार्य है। जनसंख्या-वृद्धि के साथ मनुष्य की भौतिक आवश्यकताओं में बहुआयामी वृद्धि हुई है। विविध विकास-कार्यों हेतु प्राकृतिक संसाधनों के अनियंत्रित दोहन से पर्यावरण का निरंतर हृास होता जा रहा है।
आधुनिक जीवन की परिस्थितियाँऔर परिवेश प्रदूषण की विभीषिका को और अधिक गहन और विस्तृत बना रहे हैं। आधुनिक युग में जो विकास-कार्य हुए हैं, उनसे लाभ तो अवश्य हुए हैं, परन्तु पर्यावरण का अपघटन भी हुआ है। इतिहास का अध्ययन करने से पता चलता है कि आदिमानव तथा पर्यावरण के बीच मधुर तथा मित्रवत संबंध थे। जो मानव प्रारम्भ में प्रकृति का अंग तथा साझीदार था, वही आगे चलकर उसका स्वामी बन बैठा। मानव एवं पर्यावरण के मध्य सहभागिता तथा परस्परावलम्बन का संबंध चरमरा गया और मानव प्राकृतिक पर्यावरण का कारक एवं पालक न होकर उसका विध्वंशक हो गया, जो आज तक जारी है।

पर्यावरण को सुरक्षित और संरक्षित रखने के लिए प्रत्येक व्यक्ति, समाज और राष्ट्र को सतत जागरूक रहने की आवश्यकता है। हिंदी के बालकाव्य-प्रणेताओं ने भी अपनी रचनाओं में पर्यावरण-संरक्षण का संदेश देकर अपने दायित्व और कर्त्तव्य का निर्वहन किया है। स्वातंत्र्योत्तरयुगीन हिंदी-बालकाव्य में पर्यावरण-संरक्षण एवं प्रदूषण-नियंत्रण का संदेश निहित है। इससे जन-जन को प्रेरणा प्राप्त होती है। 'देवपुत्र' मासिक पत्रिका के नवीन अंक में कवि पेड़ों की महिमा बताते हुए कहता है-


आँखों के आकर्षण पेड़,
करते दूर प्रदूषण पेड़।
इनके बिन दुनिया फीकी,
धरती के आभूषण पेड़।2


पेड़ हमारी अमूल्य निधि हैं। इनसे हमें कीमती लकड़ी तो मिलती ही है, लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि पेड़ ही हैं, जो वायु को शुद्ध रखते हैं। आषाढ़-सावन के महीने में बादल झूम-झूमकर बरसते हैं और फसल को जीवनदान देने का काम करते हैं, साथ ही मनुष्य की जरूरतों को पेड़ पूरी करते हैं। बचपन में हम अपने खेतों में मक्के पर जाते और जब तेज वर्षा आती तो हम पेड़ों का ही सहारा लेते थे।
आज मानव ने अपने स्वार्थ के लिए प्रकृति का यह 'सोना' छीन लिया है। बाल साहित्य के प्रख्यात बालसाहित्यकार विनोद चंद्र पांडेय 'विनोद' पर्यावरण को सुरक्षित रखने के लिए मानव को सचेत करते हैं-


जल, ध्वनि, वायु प्रदूषण सब पर,
करना हमें नियंत्रण।
दें न खुला आमंत्रण,
हो परिवेश हमारा पावन, यही एक ही नारा।
पर्यावरण सुरक्षित रखना है कर्त्तव्य हमारा।3


हिंदी बाल कविताओं के माध्यम से बाल साहित्यकारों ने पर्यावरण को स्वस्थ करने का बीड़ा उठाया है। आज की बाल कविताओं में पर्यावरण चेतना साफ-साफ देखी जा सकती है। पर्यावरण प्रदुषण एक गंभीर समस्या बनी है, ऐसे में पर्यावरण संरक्षण बेहद जरूरी है। पर्यावरण आज एक बहुत बड़ा मुद्दा बन गया है। पेड़ नहीं होंगे तो वर्षा नहीं होगी, साथ ही मनुष्य को भयंकर परिणाम भी भुगतने होंगे। बाल रचनाकार राजेन्द्र निशेश कहते हैं-

कहीं बाढ़, कहीं सूखा, रंग-दिखलाता,
खून के आँसू भीतर बहाती धरती।
सुनामी का तांडव कहीं लील न जाए,
बचा लो तटों को, पाठ पढ़ाती धरती।
अंधाधुध न काटो, बढ़ाओ वृक्षों को,
पर्यावरण बचा लो समझाती धरती।4


आज के उभरते बाल रचनाकार, हिंदी बाल-कविता के सशक्त हस्ताक्षर शादाब आलम ने पेड़ की महिमा का बखान सुन्दर शब्दों में किया है। वे जोर देकर कहते हैं कि पेड़ों से हमें छाँव, फल-फूल और कीमती लकड़ियाँ मिलती हैं, लेकिन पेड़ गुरुर बिल्कुल नहीं करते। वे पर्यावरण-सुधार के लिए पेड़ों को न काटने और नए पेड़ लगाने के लिए प्रेरित और प्रोत्साहित करते हैं। शादाब आलम की कविता 'मैं पेड़ हूँ' में पेड़ खुद कह उठा है-

हरा-भरा, तना खड़ा हूँ,
बिल्कुल नहीं गुरूर।
दूजों की सेवा में मुझको,
मज़ा मिले भरपूर।
फल-छाया, खुशबू, जीने को,
साँस मुझी से पाएँ।
फिर भी लिए कुल्हाड़ी मानव,
मुझ पर ज़ोर दिखाएँ।5


पेड़-पौधों से जानवरों को भी प्यार है। पशु-पक्षी और जानवर पेड़ों की छाँव पाकर चहचहा उठते हैं। लेकिन एक समय आता है, जब मानव पेड़ काटता है तो बगैर जुबान पशु कुछ कह नहीं सकता लेकिन मन ही मन रोता ज़रूर है। जानवरों की आवाज को अभिव्यक्ति देती शादाब आलम की कविता 'पेड़ बचाओ' भुलाई नहीं जा सकती-

गधा शिकारी लेकर आरी,
बढ़ा काटने पेड़।
उसकी यह हरकत देखी तो,
दौड़ी आई भेड़।
बोली, ठहरो गधेराम जी,
ज़रा होश में आओ।
भारी संकट में है अपनी
धरती, पेड़ बचाओ।6


पेड़ हमारे जीवन को बचाते हैं, इनसे मिलने वाली आॅक्सीजन मानव के लिए महत्त्वपूर्ण है। इस बात को युवा बाल कवि सुरेश सौरभ अपनी कविता 'पेड़' में हमें बताते हैं-

कितने अच्छे-अच्छे पेड़,
बिल्कुल बच्चों जैसे पेड़।
फल-फूल हमको देते हैं,
आॅक्सीजन हमको देते पेड़।
पर्यावरण साफ हैं रखते,
हमारे भाग्य-विधाता पेड़।7


जब पेड़ों के महत्त्व और उनके उपयोग की चर्चा हो तो विमला जोशी की कविता 'वृक्ष' को कैसे भुला सकते हैं-

वृक्ष हमारे बड़े उपयोगी,
हरियाली है इनसे छाई।

मिले औषधि जड़ी बूटियां,
इनसे तन-मन स्वस्थ बनाएँ।

नीड़ बनाएँ पंछी इन पर,
काम सभी के आते पेड़।

पर उपकारी जीवन इनका,
सुंदर धरा बनाते पेड़।8


पवन चौहान बिगड़ते पर्यावरण से चिंतित हैं। उनकी कविताओं में पेड़ों का दर्द उभर कर आया है। वह मानव को पेड़ लगाने का संदेश देते हुए कहते हैं-

वह कट रहा था
बिखर रहा था
दर्द से कराह रहा था
सबके सब बहरे
नहीं समझ पाए उसकी पीड़ा
वे उसे ज़ख्म देते गए
तिलतिल मारते गए।9


जब पर्यावरण संरक्षण की बात हो और नागेश पाण्डेय 'संजय' को न पढ़ा जाए तो बालसाहित्य की बात अधूरी होगी। नागेश पाण्डेय 'संजय' अपनी कविता 'आओ पेड़ लगाएँ' में पेड़ों के उपकारी होने का संदेश देते हैं। पर्यावरण संरक्षण की चर्चा करते हुए कहते हैं-

सारे जग के शुभचिंतक,
ये पेड़ बहुत उपकारी।
सदा-सदा से वसुधा इनकी,
ऋणी और आभारी।
परहित जीने-मरने का,
आदर्श हमें सिखलाएँ।10


पेड़ प्रकृति के परिवार हैं, उसका गहना है, शृंगार है। लेकिन मानव ने अपने स्वार्थ के लिए जंगलों को उजाड़कर महल बना लिए हैं। स्वार्थी मानव को फटकारते हुए नागेश जी कहते हैं-

पेड़ प्रकृति का गहना है,
ये हैं शृंगार धरा का।
इन्हें काट क्यूँ डाल रहे,
अपने ही घर में डाका।
ग़लत राह को अभी त्याग कर,
सही राह पर आएँ।11


पेड़ हमारे लिए हमेशा से ही महत्त्वपूर्ण रहे हैं। पेड़ों से हमारे आस-पास का वातावरण सुन्दरता से महक उठता है। पशु-पक्षियों की आवाज से वातावरण गुंजायमान हो उठता है। अविनाश मिश्र 'अवि' बालसाहित्य में उभरते रचनाकार हैं। पेड़ों की सुन्दरता का बखान करती उनकी कविता खुद बोल पड़ी है-

पेड़ ही रौनक लाते हैं,
रंग-बिरंगी कलियों से ये,
और भी सुन्दर हो जाते हैं।
वर्षा, धूप, आँधी सहकर,
साहस का पाठ पढ़ाते हैं।12


डाॅ. फ़हीम अहमद ने हिंदी-बालकाव्य को समृद्ध करने का सतत प्रयास किया है। उन्होंने बालकविताओं द्वारा बाल जगत को अपना रचनात्मक योग दिया है। बिगड़ते पर्यावरण से डाॅ. फहीम भी चिंतित दिखते हैं। पक्षियों की आवाज को अभिव्यक्ति देती उनकी कविता प्रशंसनीय है-

चिड़ियों ने आवाज उठाई,
कहाँ बनाएँ नीड़।
रोज पेड़ कटते जाते हैं,
बढ़ती जाती भीड़।
रोक कुल्हाड़ी बात हमारी,
सुनो भाइयो खास।
पेड़ न होंगे तो फिर कैसे,
लेंगे हम तुम सांस।13


उत्तराखण्ड के बालसाहित्यकारों में अग्रणी रमेशचंद्र पंत का हिंदी-बालकाव्य के विकास में योगदान अविस्मरणीय है। इस पृथ्वी के विनाश से क्या पक्षी, क्या कवि...सब कराह उठे हैं। जब पृथ्वी पर कुछ नहीं होगा, तब क्या होगा? यह सोचकर ही कवि कराह उठता है। भविष्य की सोच मन में सिहर उठती है, पंत जी कहते हैं-

सोच रहे थे पक्षी सारे,
बैठ नीम पर साँझ-सकारे।
अगर नहीं भू पर जल होगा,
धरती का सोचो क्या होगा?
यदि यह बंजर हो जाएगी,
दुनिया कैसे बच पाएगी।14


जंगल उजाड़कर मानव बस्तियाँ बसाता जा रहा है। लेकिन उसे नहीं मालूम कि वह खुद के लिए ही काँटे बो रहा है। इसलिए वक्त रहते मानव को संभलना होगा। बाल कवियों ने बढ़ते प्रदूषण और कटते वृक्षों को अपनी कलम के ज़रिए सुन्दर अभिव्यक्ति दी है।
प्रतिभा शर्मा ने इन पंक्तियों से समझाने का प्रयास किया है-


वक्त अभी भी है संभलो,
यूँ सृष्टि का न विनाश करो।
पेड़ लगाकर धरा का अपनी,
दुल्हन-सा सिंगार करो।
जंगल में होगा मंगल,
चहूँ ओर भी मंगल छाएगा।
आपदाओं से डरने का फिर,
वक्त नहीं रह जाएगा।15


हिंदी बालकाव्य-प्रणेताओं में रावेन्द्र कुमार 'रवि' का योगदान भी विशिष्ट है। अपनी कविता 'पेड़ लगाएँ' में वे मानव को पेड़ लगाकर वातावरण में खुशहाली आने का राज़ बतलाते हैं-

पेड़ों को भाती है मस्ती,
इनकी छाया बिल्कुल सस्ती।
इनकी हरियाली से सजकर,
चहक-चहक गाएगी बस्ती।
इन पर फूल खिलें, मुस्काएँ,
सबका मन-मंदिर महकाएँ।16


हिंदी के मूर्धन्य बालसाहित्यकार परशुराम शुक्ल का बालसाहित्य को योगदान अविस्मरणीय है। बालसाहित्य को दिए उनके योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। हालाँकि शुक्ल जी को सभी क्षेत्रों में महारत हासिल है, लेकिन उन्होंने सबसे अधिक पर्यावरण के लिए ही लिखा है। बालसाहित्य के कुशल चितेरे शुक्ल जी पर्यावरण प्रदूषण को लेकर चिन्तित हैं। वे वृक्षों की महिमा का बखान करते हुए वृक्ष बचाने का संदेश देते हैं-

जीव जगत की रक्षा करना,
अब कर्तव्य हमारा।
शोर और मिट्टी का संकट,
दूर करेंगे सारा।
एक वृक्ष हम नित रोपेंगे,
आज शपथ ये खाओ,
पर्यावरण बचाओ।17


बालसाहित्यकारों में डाॅ. राष्ट्रबंधु, भैरूँलाल गर्ग, विनोदचंद्र पांडेय 'विनोद', सत्यनारायाण 'सत्य', नागेश पाण्डेय 'संजय', रावेन्द्र कुमार 'रवि', देशबंधु शाहजहाँपुरी, पवन चौहान, शादाब आलम, मो. साजिद ख़ान, मो. अरशद ख़ान, शिव मोहन यादव, अरविन्द साहू, मनोहर चमोली मनु, सतीश कुमार अल्लीपुरी, उमेशचन्द्र सिरसवारी, विमला जोशी, कीर्ति श्रीवास्तव, राजकुमार जैन 'राजन', प्रभुदयाल श्रीवास्तव, रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक', ललित मोहन राठौर, सीताराम गुप्त, परशुराम शुक्ल, अविनाश मिश्र 'अवि', दीनदयाल शर्मा, रजनीकांत शुक्ल, अनिल शर्मा 'अनिल', रीना मौर्य, आशा शैली, प्रत्युष गुलेरी, नीलम राकेश, सतीश मिश्र, अनुप्रिया, शिव अवतार रस्तौगी 'सरस', स्नेहलता, डाॅ. दिविक रमेश, प्रो. सुरेन्द्र विक्रम, प्रो. शम्भुनाथ तिवारी आदि ने पर्यावरण चेतना पर अपनी लेखनी चलाई है।


संदर्भ ग्रन्थ-
1- एस. के. ओझा, पारिस्थितिकी एवं पर्यावरण, बौद्धिक प्रकाशन, 146 ‘राम भवन’ नया गाँव, अल्लापुर, इलाहाबाद, संशोधित संस्करण 2012-13, पृ. 01
2-सुरेशचंद्र ‘सर्वहारा’, ‘उपकारी पेड़’ बाल कविता, ‘देवपुत्र’ मासिक पत्रिका, प्रबंध संपादक- विकास दबे, सितम्बर 2016, पृ. 23
3-विनोदचंद्र पांडेय ‘विनोद’, ‘पर्यावरण सुरक्षा’, ‘बालवाणी’ द्वैमासिक पत्रिका, मई-जून 2016 ‘पर्यावरण विशेषांक’, मुख्य संपादक-उदय प्रताप सिंह, पृ. 03
4-राजेन्द्र निशेश, ‘गरमाती धरती’, बाल कविता, ‘देवपुत्र’ मासिक पत्रिका, प्रबंध संपादक- विकास दबे, जून 2016, पृ. 32
5-शादाब आलम,‘मैं पेड़ हूँ’, बाल कविता, ‘नेशनल दुनिया’, (दैनिक समाचार पत्र)06 जून 2015 के अंक में प्रकाशित, संपादक- अलोक शर्मा,जयपुर संस्करण, पृ. 14
6- वही, पृ. 14
7-सुरेश सौरभ, बाल कविता संग्रह- ‘बिटिया’, प्रथम संस्करण 2015,पुष्पांजलि प्रकाशन, लखीमपुर-खीरी, उ.प्र., पृ. 06
8-विमला जोशी, बाल कविता संग्रह-‘मेरा भारत देश महान’, प्रथम संस्करण 2014, बालसाहित्य शोध एवं संवर्धन समिति द्वाराहाट, अल्मोड़ा, पृ. 25
9-पवन चैहान, ‘कटता पहाड़’, ‘शब्द मंच’ में प्रकाशित, अंक- 15 अगस्त से 15 सितम्बर 2003।
10-नागेश पाण्डेय ‘संजय’, हिंदी पथ प्रदर्शक, हाईस्कूल पाठ्य पुस्तक में सम्मिलित, सम्पादक-कसीन बोध, माॅरीशस।
11- वही।
12- अविनाश मिश्र ‘अवि’ की बाल कविता ‘देश बचाना होगा’ से।
13-डाॅ. फहीम अहमद, ‘चिडि़यों की आवाज’, ‘नेशनल दुनिया’, (दैनिक समाचार पत्र) 03 जून 2016 के अंक में प्रकाशित, संपादक- अलोक शर्मा, जयपुर संस्करण, पृ. 15
14-रमेशचंद्र पंत, ‘धरती का क्या होगा ?’ बाल कविता, ‘देवपुत्र’ मासिक पत्रिका, प्रबंध संपादक- विकास दबे, जून 2016, पृ. 49
15- प्रतिभा शर्मा, ‘नन्हे पक्षी की सीख’, ‘बालवाणी’ द्वैमासिक पत्रिका, मई-जून 2016 ‘पर्यावरण विशेषांक’, मुख्य संपादक- उदय प्रताप सिंह, पृ. 34
16- रावेन्द्र कुमार ‘रवि’, ‘पेड़ लगाएँ’बाल कविता, ‘बच्चों का देश’ बाल मासिक पत्रिका, संपादक-संचय जैन, जुलाई 2016, पृ. 42
17-परशुराम शुक्ल, ‘पर्यावरण बचाओ’ बाल कविता, ‘चिरैया’ बाल मासिक पत्रिका, संपादक-बेला जैन, जून 2016, पृ. 24


- डॉ. उमेश चन्द्र सिरसवारी

रचनाकार परिचय
डॉ. उमेश चन्द्र सिरसवारी

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