जुलाई 2016
अंक - 16 | कुल अंक - 61
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

आलेख

जनजातीय समाज और संस्कृति: डॉ. अल्पना सिंह

 
 
भारतीय समाज पूर्वाग्रह से युक्त है, इसी कारण यहाँ हमेशा से आदिवासियों को असभ्य व बर्बर समझा जाता रहा है। सामान्य जन के लिए ये वर्ग मात्र मनोरंजन का साधन ही बनकर रहे हैं। विडंबना यह है कि संविधान द्वारा प्रदान की गई तमाम सुविधाओं, सुरक्षा और उनके हितों के अनेक प्रावधानों से यह अब तक पूरी तरह अनभिज्ञ हैं, अधिकारों व कर्तव्यों की तो बात ही क्या की जाये। उन्हें देखकर यह विश्वास ही नहीं किया जा सकता कि इक्कीसवीं सदी के भारत में ऐसा समाज और जीवन भी अस्तित्व में है, जिनके पास न आय का कोई साधन है, न रहने के लिए घर हैं, न पहनने के लिए कपड़े और न खाने के लिए भोजन। और जल, जंगल और जमीन की जो ऐतिहासिक विरासत वे संजोए हैं, वह भी उनसे छीनी जा रही है। विकास के नाम पर उन्हें उनकी ही जमीन से बेदखल किया जा रहा है और उन्हें वैकल्पिक आय का कोई जरिया भी मुहैया नहीं कराया गया है। न वहाँ कारखाने हैं न कृषि और न ही कोई काम। यहाँ तक कि उनके जीवन की मूलभूत आवश्यकताएं भी पूरी नहीं हो पा रही हैं। उनकी इस स्थिति के लिए मुख्य समस्या यही है कि इतने प्रयासों के बाद भी बड़े पैमाने पर हो रहे उनके आर्थिक व सामाजिक विस्थापन को रोका जाना सम्भव नहीं हो पा रहा है।
 
निरंतर आधुनिक से उत्तर आधुनिक हो रहे शहरी लोग उन्हें बर्बर, जंगली और असभ्य मानते हैं। उनके मन में यह धारणा बन गयी है कि आदिवासी गंदे, अभद्र, अशिक्षित तथा कच्चे माँस का सेवन करने वाले घृणा के पात्र जीव हैं। इसी कारण वह सभ्य समाज का हिस्सा बनने के हकदार ही नहीं हैं। इसी भ्रामक प्रचार के द्वारा अनेक व्यक्ति तथा संस्थाएं अपने अपने हितो को साधने में लगे हैं। भूमंडलीकरण और निजीकरण की प्रक्रिया के चलते उन्हें उनके ही जंगलों व पहाड़ों से बेदखल किया जा रहा है। उनकी जमीनें छीनी जा रही हैं, उन्हें जल-जंगल-जमीन से वंचित कर बाहर खदेड़ा जा रहा है।
जस्टिस मार्कंडेय काटजू व ज्ञान सुधा मिश्र की खंडपीठ ने 5 जनवरी, 2011 को टिप्पणी करते हुए कहा है कि- "यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज आदिवासी, जो कि संभवतया भारत के मूल निवासियों के वंशज हैं, अब देश की कुल आबादी के 8 प्रतिशत ही बचे हैं। वे एक तरफ गरीबी, निरक्षरता, बेरोजगारी, बीमारियों और भूमिहीनता से ग्रस्त हैं। वहीं दूसरी तरफ भारत की बहुसंख्यक जनसंख्या जो कि विभिन्न अप्रवासी जातियों की वंशज हैं, उनके साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार करती हैं।" वास्तव में  सामाजिक स्तर पर यह स्थित दुर्भाग्यपूर्ण है। इसी सौतेले व्यवहार तथा अन्य निजीकरण आदि प्रक्रियाओं के चलते आदिवासियों के समाज व संस्कृति पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा है। जवाहरलाल नेहरू ने भी इस बात को स्वीकारा है कि "औद्योगीकरण के बुरे प्रभावों से आदिवासी संस्कृति का बचाव किया जाना चाहिए।"
 
संविधान में इतने सख्त नियम व कानूनों के बावजूद जबरन भूमि अधिग्रहण द्वारा उनकी जमीनें उनसे धोखे से छीनी जा रही हैं और उनका जीना दिन पर दिन दूभर होता जा रहा है। इस सब से तंग आकर जब उन्होंने अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए अस्त्र-शस्त्र का प्रयोग करना प्रारम्भ कर दिया तो उन्हें नक्सलवादी कहकर अपराधी घोषित कर दिया गया। परन्तु वास्तविकता इससे कोसों दूर है। यथार्थ यह है कि स्वतंत्र रूप से जीवन यापन करने वाले आदिवासी अपनी प्रथाओं और मान्यताओं के अनुसार निश्चिंत होकर स्वच्छंदतापूर्वक जीवन यापन करना चाहते हैं। लेकिन जब कोई उनकी इस जीवन शैली में अतिक्रमण या हस्तक्षेप करता है, तब वे उसके खिलाफ विद्रोह करने को मजबूर हो जाते हैं। और चूंकि वे विद्रोह का अन्य कोई तरीका नही जानते इसलिए विवश होकर हथियार उठा लेते हैं। अन्यथा वे स्वभाव से शान्तिप्रिय हैं, हिंसा उनकी संस्कृति में ही नहीं है। वे तो आधुनिक समाज से कोसों दूर रहकर, प्रकृति के समीप शान्तिपूर्वक जीवन यापन करना चाहते हैं। डॉ. वीर भारत तलवार के अनुसार "आदिवासी जिन समस्याओं का दिन-रात सामना करते हैं, उन समस्याओं को चुनाव लड़ने वाला भारत का कोई भी राजनीतिक दल नहीं उठाता है और उठाता भी है तो बहुत सीमित उद्देश्यों के साथ। ऐसी स्थिति में जंगल-पहाड़ों में बसे आदिवासी मददगार के रूप में अपने नजदीक सिर्फ नक्सलवादियों को ही पाते हैं। कई मुद्दों पर जैसे जंगल के मजदूरों, बीड़ी बनाने वाले और तेंदू पत्ता तोड़ने वाले आदिवासी स्त्रियों के यौन शोषण को रोकने, दुष्ट जमीदारों और सूदखोर महाजनों द्वारा आदिवासियों की लूट ली गई जमीन उन्हें वापस दिलाने की लड़ाइयाँ नक्सलवादियों ने लड़ीं। ऐसी स्थिति में निश्चय ही आदिवासी से उनके सम्पर्क बनेंगे। इन सब के बावजूद आदिवासी व नक्सलवादी एक नहीं हैं। नक्सलवादियों ने जिन अत्याधुनिक हथियारों का इस्तेमाल किया है, वे तो आदिवासियों के पारंपरिक हथियारों से भिन्न हैं ही। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि आदिवासियों में संघर्ष व विद्रोह की परम्परा हमेशा उनकी सामूहिकता पर आधारित रही है। उन्होंने हमेशा सामूहिक रूप से संघर्ष किया, जो जनविद्रोह का रूप लेता रहा है लेकिन नक्सलवादियों द्वारा संचालित हथियारबंद संघर्ष न तो कभी आदिवासियों का सामूहिक विद्रोह बन पाता है और न कभी जन विद्रोह का रूप धारण कर पाता है।" इस कारण नक्सलवाद और आदिवासियों को एक साथ जोड़कर देखना उनके साथ अन्याय करने जैसा है।
 
सामाजिक स्तर पर उन्हें स्थापित करने तथा उन्हें उनके हक दिलाने के लिए कुछ संस्थाएं व बुद्धिजीवी वर्ग निरन्तर सक्रिय हैं। रमणिका गुप्ता निरंतर चालीस वर्षों से झारखंड के छोटा नागपुर क्षेत्र में आदिवासी अस्मिता को पहचान दिलाने के लिए प्रयासरत हैं। उनके द्वारा स्थापित व संचालित ‘रमणिका फाउंडेशन’ हाशिए पर जीने वाले, पीड़ित तथा शोषित आदिवासियों के सशक्तीकरण द्वारा समाज में बदलाव लाकर उन्हें बराबरी का दर्जा दिलाने के लिए प्रतिबद्ध है। उनके द्वारा सम्पादित ‘युद्धरत आम आदमी’ पत्रिका इस दिशा में जागृति की ओर निरन्तर प्रयासरत है। उनका फाउंडेशन आदिवासियों की भाषाओं को बचाने की ओर भी प्रयासरत है। इनके अतिरिक्त ‘निजधरे परदेसी', ‘मौसी और सीता’ आदि कृतियों के द्वारा वह आदिवासियों के यथार्थ को समाज के सामने ला रही हैं। प्रो। वीर भारत तलवार भी आदिवासी समाज, संस्कृति, भाषा, साहित्य आन्दोलन व राजनीति की गहरी समझ रखते है। उनकी कृतियों ‘नक्सलबाड़ी के दौर में', ’झारखण्ड के आदिवासियों के बीच', ‘रस्साकसी’ आदि में आदिवासी समाज का यथार्थ चित्रित हुआ है। इसके साथ ही वे आदिवासियों को उनका हक दिलाने व समाज में उनकी स्थिति सुधारने हेतु निरन्तर प्रयासरत हैं।
आदिवासियों को यदि समाज की मुख्य धारा से जोड़ना है तो यह आवश्यक है कि सबसे पहले उन्हें उनका हक दिलाया जाये और उनके जल, जंगल और जमीन को उन्हीं के लिए छोड़ दिया जाये। उसके बाद विकास में उनकी भागीदारी के प्रति ठोस कदम उठाये जाएँ।
 
यदि आदिवासियों की संस्कृति की बात कि जाये तो यह तो उनकी मूल धरोहर है। यही कारण है कि इन्हें हमेशा से अपनी संस्कृति से विशेष लगाव रहा है। वास्तव में इनकी संस्कृति अपने आप में विशिष्ट है। इनके उत्सव, आयोजन, लोकगीत, लोकनृत्य, लोककथाएं, रीति-रिवाज, मेले-त्योहार आदि के आयोजन सर्वथा भिन्न तरीके से होते हैं। उनके पास हर अवसर पर गाये जाने वाले अपने अलग गीत हैं, जिनमें उनकी संस्कृति रची-बसी दिखाई देती है। इन आदिम जनजातियों के यहाँ धार्मिक अनुष्ठानों के साथ ही जीवन-मरण से सम्बन्धित संस्कार भी विधि विधान से किये जाते है। यद्पि इनके कोई निश्चित व लिखित नियम नहीं है। इनमें गांव का मुखिया या बड़ा बूढ़ा व्यक्ति ही पूजा आदि आयोजनों को सम्पन्न कराता है। स्वतन्त्रता व समानता की भावना इनमें कूट-कूट कर भरी हुई है। प्रख्यात आदिवासी चिन्तक प्रो. हेमराज मीणा ने लिखा है- "आदिवासी समाज की संस्कृति सम्मान, भाई-चारे और स्वतन्त्रता की संस्कृति है। आदिवासी जीवन में अन्याय और अत्याचार नहीं है। नारी जाति को बन्धनों की बेड़ियों में बांधनें की परम्परा नहीं है।" यही प्रेम भाव उनके जीवन को सरल बनाता है।
 
उनकी अपनी अलग भाषाएं हैं। ऐसा माना जाता है कि आदिवासियों की लगभग छः सौ बोलियां हैं, जिनमें से लगभग नब्बे में साहित्य सृजन का कार्य हो रहा है इन भाषाओं में बारेलाओं की बारेली, गोंड़ो की गोंड़ी, ओझाओं की शिव भाषा, भीलों की भीली, भिलालों की भिलाली, नहालों की नहाली, भरियाओ की भरियाटी, कोल की कोली, थारूओं की थारूई, संतालो की संताली आदि हैं। इनकी अपनी-अपनी भाषाओं में गीत, कथाएं, नाट्य, मंत्र आदि की भरमार है। नृत्य-संगीत इनके जीवन का अभिन्न अंग है। यही कारण है कि आदिवासियों के जीवन और संस्कृति का केन्द्र बिन्दु इनका नृत्य, गीत व संगीत है। इनके गीत-संगीत मात्र आनन्द की अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं है बल्कि जनजातीय परम्परा में यह सब धार्मिक अनुष्ठानों का एक अंग है। इनका नृत्य व संगीत प्रकृति की देन है। "आदिवासी प्रकृति के सबसे निकट रहते हैं, अतः ताल और लय उनकी रग-रग में रक्त के साथ संचरित होती है। वृक्षों का झूमना, पतंगों का नर्तन करना, खगदल का कतारबद्ध होकर एक लय से उड़ान भरना, हवा का सरसराना, बिजली का कड़कना, बादलों का गरजना-बरसना, नदियों का कल-कल बहना-निसर्ग के ये सारे कार्य-व्यापार संगीत और नृत्य के उद्भव कारक है।"
भारतीय जनजातियों की अपनी-अपनी सांस्कृतिक विशेषतायें हैं। जैसे प्रत्येक जनजाति में त्योहारों व उत्सवों पर सामूहिक नृत्य की परम्परा है। वह मनोरंजन के लिए भी लोक नाटक, नृत्य, गीत आदि का आयोजन करते है। ‘भीलों‘ में मुख्य रूप से विविध अवसरों पर भगोरियां, महुल्या, इन्दल, होली, दशहरा, मवेशी, पोला आदि लोकोत्सव बड़े धूम-धाम से मनाये जाते हैं। इसके साथ ही उनमें बार्या, कुलंगी, राठ्या, घण्ठा या गैर, नेजा, गवरी, मूड़ा आदि विविध नृत्य व नौटंकी की परम्परा भी है। वह अपने उत्सवों को परम्परा व रीति रिवाजों के अनुसार मानते है। अवसर के अनुसार ही उनके यहाँ गीत गाने की परम्परा भी प्रचलित है, जिनमें थावणा, दावण, लावणी, पूजा, त्योहार, होली तथा मिश्रित आदि गीत प्रमुख है। इन गीतों के साथ वह मुख्य रूप से मांदल, कुड़ी, ढ़ाक, फेफरया, बाँसुरी, अलगोझा, केन्दरिया, कामड़ी आदि वाध यन्त्रों का प्रयोग भी करते है। ‘पाँगी जनजाति‘ में त्योहार आदि उत्सव मनाने की अपनी अलग परम्परा है। इनके प्रमुख त्योहारों में उटैण (उत्तरायण-मकरसंक्रान्ति), बार त्यौहार तथा जुकारू है। इनके यहाँ मुख्य रूप से शरद ऋतु में फुल्ल यात्रा, सावन महीने में दखैण मेला, उयाज, उनीणी, पारवाच्च, मिंधलयाच्य आदि मेलों का आयोजन किया जाता है। इसके साथ ही इनकी अपनी अलग लोक मान्यताएं व विश्वास भी प्रचलित हैं, जैसे उल्लू का बोलना अशुभ, कौऐ का बोलना अतिथि आगमन का सूचक माना जाता है।
 
‘थारू‘ जनजाति के लोकगीत उनके जीवन का अभिन्न अंग हैं। यहाँ जन्म से लेकर मृत्यु तक के गीत गाये जाते हैं। इनमें बारहमासा, वैवाहिक गीत, विदाई गीत, गौना गीत, कहरा गीत आदि हैं। हिन्दू होने के कारण इनमें हिन्दू देवी देवताओं, पूजा-पर्वो व हिन्दू चरितों के प्रति अगाध श्रद्धा व विश्वास दिखाई देता है। ‘कोल’ जनजातियों में भी त्योहारों का विशेष महत्व है। इनके लोकगीतों में श्री राम, हनुमान, कृष्ण, शिव, पार्वती आदि के उल्लेख के साथ ही घर पूजने की भी परम्परा है। इनमें विवाह के अवसर पर स्वागत के रूप  में गाली गाने का रिवाज भी है। ये गालियां तानों, शरारतों व हास-परिहास से युक्त होती हैं।  द्वार पर बारात व वर के आने पर स्त्रियां इस प्रकार से गाती हैं-
 
मैं तोसे पूछो दूल्हे, मौरी कहां से पायें, दूल्हा के माता छिछोली, माली संग सोई।
मैं तोसे पूछो दूल्हे, जामा कहां से पाये, दूल्हा के माता छिछोली, दर्जी संग सोई।
मैं तोसो पूछो दूल्हे, कंकन कहां से पाये, दूल्हा की माता छिछोली, लूहर संग सोई।
मैं तोसे पूछो दूल्हे, जूते कहां से पाये, दूल्हा के माता छिछोली लूहर संग सेई।
 
गोंड जनजाति के लोग भी उत्साह व उमंग के साथ त्योहारों का आयोजन करते हैं। उनमें मुख्य रूप से ‘लाडूकाज', इरपूपाण्डुम तथा कारापाण्डुम आदि त्योहार मनाये जाते हैं। जिनमें धार्मिक अनुष्ठानों के साथ ही नदी पूजा, पशुबलि आदि का प्रावधान है। ‘संताल’ आदिवासी प्रत्येक माह के अनुसार त्योहार मनाते हैं जैसे माघ में मांघबोंगा, फागुन में बाहाबोंगा, चैत में रोहिनी, बैसाख में ऐरोःबोंगा, जेठ में मुचरी, आसाढ़ में आसाड़ियां, सावन में गोमहा, भाद्र में जानताड़, अश्विन में दांसाय, कार्तिक में सोहराय बोंगा, पौष में सकरात यामकर पर्व का आयोजन होता है। संतालो के भी अपने अलग लोक गीत व कथाएं हैं। यह परम्परागत वस्त्राभूषण पहनते हैं।
इनकी प्रमुख विशेषता है इनका श्रंगार प्रेमी होना। यह लोग अपनी वेशभूषा, आभूषण  व अलंकरण के द्वारा ही जाने व पहचाने जाते है। वह अपने बालों व शरीर के अंगों की सजावट कलात्मक ढंग से करते हैं। पुरुष तथा स्त्रियां कान, गले, हाथ, पैर आदि में भी आभूषण पहनते हैं तथा अपने शरीर को रंगों से सजाते हैं। "आदिवासी जगत में जीवन का आधार लोक कथाएं हैं, लोकवार्ता एवं संवादों के आदान-प्रदान हैं, विचारों को जानना है और अभिव्यक्ति की गहरायी से सोचना समझना है।" इन कथाओं में अवसाद-विशाद, राग-द्वेष, पूर्वाग्रह-दुराग्रह, प्रेम अलगाव-विलगाव, कसक-तड़प, आनन्द-पीड़ा की आवाजें होती हैं। इन कथाओं में न तो अतीत के अवशेष हैं, न शिक्षित जनों की जीवन शैली से सम्बन्धित व्याख्यान हैं, वे एक समृद्ध संस्कृति की निरंतरता और उसके साथ अपने वर्तमान को नयी सीख के साथ जीवन योग्य बनाने के नुस्खे हैं।" ये लोग स्वभाव से जितने सरल व सीधे हैं, उनकी संस्कृति में भी उतनी ही सहजता है। उनकी सांस्कृतिक मान्यताएं, परम्पराएं व आस्थाएं जीवन के सुख, दुख, हर्ष उल्लास के साथ ही दर्शन से भरे-पूरे हैं। उनके गीत-संगीत, नृत्य, त्योहार परम्पराएं आज भी उतने ही स्वाभाविक और प्राकृतिक हैं, जितने प्रारम्भ में थे। आधुनिकता या बनावट का प्रभाव उनसे कोसो दूर है। सैकड़ों वर्षों के बाद भी उनमें कोई परिवर्तन नहीं हुआ है। स्वयं आदिवासियों ने अपनी प्राचीन संस्कृति को अब तक ज्यों का त्यों सहेज कर रखा है। वह भारत की अनमोल धरोहर के समान है, इस कारण इसे और भी अधिक सहेजने व संरक्षित करने के प्रयत्न होने चाहिए। इस क्षेत्र में सामाजिक, राजनैतिक इनकी इस अनमोल धरोहर को नष्ट होने से बचाया जा सके।
 
इस समस्त विवेचन से स्पष्ट है कि आधुनिकीकरण, भूमंडलीकरण, औद्योगीकरण तथा नगरीकरण के फलस्वरूप विस्थापन का दंश झेल रही जनजातियां येन-केन-प्रकारेण अपनी परम्परा व संस्कृति को बचाने के लिए संघर्षरत हैं। प्रयत्न ये होना चाहिए कि उन्हें उनका नैसर्गिक व सहज जीवन जीने दिया जाये। आदिवासी अस्मिता तथा अस्तित्व को सुरक्षित रखने के लिए यह आवश्यक है कि उन्हें संरक्षित करने के लिए गये प्रयास स्तरीय हों। संवैधानिक, राजनैतिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक के साथ ही साथ साहित्यिक स्तर पर भी इस प्रकार के ठोस व सशक्त प्रयास किये जाये जो उनके विकास व प्रगति के नये मार्ग प्रशस्त कर सके।
 
 
 
 
 
सन्दर्भ-
 
1- कथाक्रम (आदिवासी विशेषांक)- सम्पादक- शैलेन्द्र सागर, अक्टूबर-दिसम्बर अंक-2011
2- हंस, सम्पादक-राजेन्द्र यादव, अप्रैल अंक, 2011, प्रथम संस्करण-2008
3- राजस्थान के आदिवासी- डॉं. एस. के. सैनी यूनिक ट्रेडर्स प्रकाशक, जयपुर, प्रथम संस्करण, 2003
4- आदिवासी लोक, सं. रमणिका गुप्ता, अंश प्रकाशन-दिल्ली, संस्करण-2007
5- उत्तर प्रदेश की जनजातियाँ-अमीर हसन, उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र 14 सी.एस.पी. मार्ग, इलाहाबाद-211001

- डॉ. अल्पना सिंह

रचनाकार परिचय
डॉ. अल्पना सिंह

पत्रिका में आपका योगदान . . .
विमर्श (1)