जुलाई 2016
अंक - 16 | कुल अंक - 61
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम

कहानी- आसरा

 
 
दरवाजा बंदकर माँ मुड़ी तो वो दर्द भरी रेखाएँ अब अपना दर्द उगलने लगीं, जो कई महीनों पहले पैदा हुई थी। गोबर से लीपी दीवार को थाम उस पर सिर टिकाया तो अनायास ही आंखें डबडबा आयीं। लिपी दीवार पर उघड़ी हुई हथेली की रेखाएं भी जैसे वही बयान करने लगीं, जो उनके भाग्य में होने वाला है। 
"माँ"
"दो दिन बाद ही........"
जो पीड़ादायी शब्द ज़बान न कह सकी, उनका दर्द पुष्पा ने भरपूर गहरे तक महसूस किया। लंबी सांस भर जैसे उसने उस भाग्य को स्वीकार किया।
पौळ को पार कर पुष्पा खुले आंगन में आ गई तो वर्षों से झूमता नीम उदास-उदास सा डालियां झुका गले मिलने को आतुर प्रतीत हुआ। दो घड़ी उसे उदास आंखों से निहारा और दौड़कर उसके तने से लिपट गई। उदास रुँख का दिलासा पाकर खारे पानी ने अब भीतर ही भीतर उमड़ना घुमड़ना स्वीकार न किया और बह चला।
चूल्हे पर दाल की हाँडी चढ़ा, आटे के लिये पींपे को उठाया तो............। कल इस पींपे को भी अपना घर छोड़ना होगा। वही यात्रा करनी होगी जो घर के लोग तय करेगें। वर्षों से यही कोना इसका ठिकाना है। शायद धूप का मुंह अब तक इसने देखा ही नहीं होगा। पुष्पा के हाथ उसे बच्चे की तरह सहलाने लगे। अंतरतम पीड़ की लहर सभी निर्जीव वस्तुओं से निकलकर जैसे पुष्पा के सीने में आकर मचलने लगी। तवा, चिमटा, बर्तन, थाली, तसली ...........सबको ये पुश्तों का ठिकाना त्यागकर जाना होगा। वो परछत्ती जहां माँ गुड़ का डिब्बा, मिठाईयां बच्चों की पहुंच से दूर रखती थी। न जाने कितनी कितनी कोशिशों में लपक लपक कर माँ से चुपके मिठाई खाई है उस परछत्ती से। ऊँचे पहाड़ जैसे मुश्किल इस काम में  भाई का सहयोग पाकर टुकड़े-टुकड़े  मिठाई में अनमोल स्वाद चखा है। सदैव ही यह परछत्ती मुंह चिढाते-सी लगी, उसका वजूद बच्चों की आंखों में सदैव खटका ही है किंतु आज यह भी वर्षों की साथिन लग रही है।
कच्ची दीवार पर आड़े ठूंठ रखकर उस पर बांस का ताना-बाना बुन मिट्टी के थेपड़ों को लगाते समय दादा जी का सीना गर्व, संतोष से चौड़ा हो गया होगा। ऐसा आसरा जो पीढ़ियों को सहारा देगा लेकिन ये नहीं सोचा होगा कि पीढ़ी ही की जरुरत पड़ी तो वह इसका सहारा नहीं बन पायेगी, तब क्या होगा? माटी के थेपड़ों ने मौसम के न जाने कितने थपेड़े सहन किये किंतु  समय की एक मार सहन न कर सका।
 
पुष्पा ने सुबकते हुए आटा गूंद रोटियां सेंकी। जैसी तैसी दाल बना माँ पिताजी के सामने परोस दी। दीवार से सिर टिकाये बैठे वे ऐसा लगा जैसे छत को देख रहे हैं। लेकिन पलके मुंदी और आंखों की कोर नम थी। शायद कभी दर्द इतना निस्सीम हो जाता है कि फफककर रोना कम पड़ जाता है। अंदर ही अंदर घुटता हुआ गुबार मन की पीड़ अधिक बांटता है, व्यक्त कर पाता है।  पुष्पा ने थाली में रोटी-दाल रखी और जानते हुये भी कि आज कोई भी खाना नहीं खा सकेगा।
पिताजी!
सान्त्वना भरे हाथ कंधे पर रख अबोली ही खाने को कहा। पिताजी जैसे नींद से जागे। जाने किन विचारों में गुम थे। उन्हें बेदर्दी से झटककर पास रखे कटोरे को और पास खिसका लिया और झट से कौर तोड़ा, जैसे बहुत भूखे हों और रोटी का ही इंतजार था। पुष्पा खड़ी रही। कटोरा परे खिसका दिया होता तो वह बहुत दुखी होती लेकिन जिस अभिनय से अपना दर्द पुष्पा से निरा छुपाकर ऐसे खाने बैठे जैसे कुछ हुआ ही न हो। यह समझ उसका गला रुंध गया। सब भूखे न रह जाएँ इसलिये वे रोटी खाने का सफल अभिनय कर रहे हैं। तो वह भी रोटी खा ही लेगी अब।  भले जैसे-तैसे ही सही। रोटी न खाने से तो समस्या नहीं सुलझेगी। उसने सोचा। दो वक्त भूखे रहने से मर नहीं जायेगें। अक्सर ही ऐसा होता है कि एक वेला पेट को शांत रखना पड़ता है। अब भी न खायें तो क्या होगा? इससे सेठजी का मन पसीजेगा? और फिर वो भी क्या करे, कोई अपना आशियाना न बचा पाये तो उनका क्या दोष?
 
दसवीं तक पढ़े थे पिताजी उस जमाने में। बहुत गिना जाता था दसवीं तक पढ़ना। माँ-बाप ने मेहनत करके पढ़ाया था। दो एक बार बंबई जाकर आये, अच्छा कमाया। फिर शादी हुई। शादी के बाद पत्नि (माँ) को साथ ले जाना संभव नहीं था और पत्नि से दूर रहना नामुमकिन। कभी बंबई जाते लेकिन टिक न पाते। माँ उलाहना देती कि यहीं कुछ कमाई का साधन ढूंढ़ लो। परदेस जाते हो तो इतने दिन जुदा होकर रहना अच्छा नहीं लगता। यहां कुछ धंधा जमने की आशा में पिछड़ते चले गये। साथी दोस्त मेहनत कर के कहां के कहां पहुंच गये। दुकान मकान सब हो गये उनके। वक्त आने पर परिवार भी वहीं स्थापित हो गये। लेकिन पिताजी की कमाई की गाड़ी संतानों के बोझ तले बैठ गई। चिंता-चिंता ने शरीर खा लिया। कोई धंधे पर न लगाता। छोटी-मोटी लारी लगाते। अँधेरा होने से पहले घर लौटना पड़ता क्योंकि रात को कम दिखता। उसमें भी कमाई के रास्ते कम से कमतर होते गये। यूं भले ही धन-माया को निरर्थक कहते हो साधु-संत पर धन का सही जुगाड़ न होने पर कैसे एक चंगा आदमी ढलकर बेसमय ही बेचारा और अभागा सा हो जाता है, उसका उदाहरण पिताजी हैं। भाई की पढने की इच्छा थी लेकिन छठी पढ़कर उसे भी बंबई का रुख करना पड़ा। कमाने के लिये। धीरे-धीरे हालत बदतर हो गई। उधार वसूली वाले नित घेरा लगाते। पिताजी सिर झुकाये उनके सामने  बैठे रहते, मानो कहते हों पैसे तो नहीं है गर्दन मूंड सको तो मूंड लो हाजिर है! वे शब्दों से बरसकर अपनी राह लेते। कैसे पैसे लें इस आदमी से यही जुगत लगाते।
 
कपडे़ की दुकान वाले धारीवाल सेठ जी की नजर पिताजी के मकान की कीमती जमीन पर थी। दादा से भी कई बार कहा कि जमीन दे दो, मुंह मांगा दाम दूंगा। लेकिन सुना है कि दादा लाठी लेकर उस सेठ जी के पीछे भागे थे। ये बात उनको गाली जैसी लगी थी कि कोई उनसे उनकी पुश्तैनी जमीन को बेचने की बात कर कैसे ले। वे अपनी पुश्तैनी जमीन को माँ की तरह पूजते थे। उसको बेचना नाक कटाने के समान मानते था। प्राण देकर भी उसे बचाना और बढ़ाना चाहते थे। तभी से सेठ जी पीठ पीछे चालें चलते रहे हैं जमीन हथियाने के लिये।
पैसों की जरुरत पड़ती तो कोई पिताजी को उधार न देता था। हार कर धारीवाल सेठ के पास जाना पड़ता। जितने भी रुपये चाहिये होते सेठ जी बड़ी आसानी से दे देते। मानो उधार देकर भी धन्य हो गये हों। माँ पिताजी अचरज करते कि ये अडि़यल टट्टू होकर भी गउ कैसे हो गया। लेकिन पिताजी मन ही मन सब समझ रहे थे। इसलिये अक्सर ही फुंफकार कर प्रण लेते कि अब उस के दर कभी न जायेगें लेकिन मजबूरी सीधा उसी राह ले जाती। और कोई रास्ता भी न सूझता। धीरे-धीरे ब्याज का बोझ मूल से ज्यादा हो गया। मूल तो क्या सूद भी हर महीने न चुका पाते।
 
"पुष्पा!!!........."
कहते-कहते पड़ोस की मुन्नी ने घर में कदम रखा तो शेष शब्द मुंह में ही रह गये। पिताजी को देखते ही ठिठककर चुप हो गई। बारह वर्ष की मुन्नी को भी पता है कि कुछ बातें घरवालों से भी छुपानी पड़ती हैं। पुष्पा के दिल में एक हूक-सी उठी। मन व्यग्र हो उठा क्या कहेगी वह? जानती है मुन्नी किस काम से आई है। पड़ोस की चाची के यहां अवश्य ही फोन आया होगा उसका। हर बार एक ही बात, एक ही सवाल दोहराता है बंशी। गौना कब करायेगें? इधर-उधर की बातें कर बात को टाल जाती वह। कितनी व्यग्रता और प्रेम होता है बंशी की बातों में। मन तो जैसे हवा में लहराने लगता है। मसखरी भरी बातों ही बातों में न जाने क्या कह देता कि कान तक सुर्ख हो जलने लगते। उस घड़ी ऐसा लगता जैसे अभी ही बंशी सामने आ जाये तो गले लगकर एक अनन्त आकाश में उड़ जाये। लेकिन अगले ही पल परिस्थितियां जमीन पर ले आतीं। हर बार यही दिलासा देती कि पिताजी पैसों की व्यवस्था में लगे हैं। कहकर एक और इंतजार पुष्पा बंशी की झोली में डाल देती। लेकिन सुलगती स्वयं भी। रातें आकाश तले तारे गिनते बंशी का चेहरा यादों में और गहरा तराशते बीतती। सुबह ललाई  उभरी आँखें माँ से मिलाने की हिम्मत न होती। लेकिन माँ की अनुभवी आंखें जवान सगाईशुदा बेटी की आंखे और मन सब पढ लेती। एक ठंडी उसांस सी भर लेती मजबूरी में।
 
आज क्या कहेगी वह? उसकी सूरत आँखों में घूम गई। कितनी तड़प, कितना व्यग्रता छलकती है बातों में जैसे पास होता तो सीने में भींच देता। सगाई के बाद किसी रिश्तेदार की शादी में अचानक ही मिल गया था। वो तो संभाल ही न पाई थी एकबारगी अपनी धड़कनों को और उसके होंठों का ताप कानों के पास महसूस होने लगा था। बेसुध-सी वह मन ही मन कामना करने लगी कि ये वक्त यहीं ठहर जाये। वो पल उतना ही सजीव है उसकी यादों में और उस पल के उस ताप ने उसको हर बार ज्यादा से ज्यादा बेसुध किया है। साधारण कद के साधारण से चेहरे पर लाल डोरों से भरी पुकारती-सी आंखें उतनी ही  सजीव है जिस दिन पहली बार थी।
लेकिन अब जो उसने सोचा है वह कैसे कहेगी उससे? उसकी क्या कहे, वह स्वयं ही उस बात से दरक गई है। वो मीठी बातें एक बार फिर महकने लगीं, ताप उघड़ने लगा।
 
आज कह देगी वह। अब और इंतजार मत करो बंशी। मुश्किलें बढती ही जा रही हैं। छत के लाले पड़ रहे हैं, गौना कहां से होगा? अपने बंशी को और दुखी नहीं देख सकती। आज कह ना ही होगा कि कहीं और रिश्ता गांठ ले। सोचकर ही पुष्पा की आंखों में पानी भर आया।
माँ-पिताजी को उसकी जरुरत है और ......। मुन्नी ने झिंझोड़ा तो चौंक उठी। आँखों की गीली कोर पोंछी। मुन्नी के साथ चल पड़ी। कैसे कहेगी? उसने तो  यह बात केवल सोची ही थी और कहने का समय इतना जल्दी आ गया? और क्या सचमुच ही कह पायेगी?  उसकी जबान जो शब्द कहेगें वो क्या उसके स्वयं के कान सुन पायेगें?
रिसीवर धीरे से उठाकर कान से लगाया। कुछ बोला न गया। शायद बंशी ही उसकी सांसों की आवाज सुनकर बोल उठे। वही मीठी बातें, मदहोश करने वाली। जाने क्या उन शब्दों में है जो उसे बहाकर जाने किन उंचाइयों पर ले जाता है। कितना इठलाती है वो ....वो....शब्द सुनते हुये जो किसी से पहली बार सुने और अंकित होते जाते हिया में। आज... आज सुन ले आखिरी बार फिर......तो ....।
 
टुं...टुं....टुं
ओह! लाइन तो कट गई। जानकर जैसे वह उछल पड़ी। शुक्र है भगवान का वह सब जो सोचा हुआ था, कहने से बच गई। खुशी और दर्द से फफक कर रो पड़ी। नहीं बंशी! नहीं! तुम्हारे बिन जी न सकूंगी। इन सब में तुम्हारे मिलन की आशा ही तो है जो उसे जिलाये रखती है। आज एक बड़ी घाटी मुश्किल की आप ही टल गई। नहीं तो इस फोन के बाद उसकी जिंदगी न जाने कैसी हो जाती? मन ही मन बुदबुदाई पुष्पा। आकाश की ओर देख प्रारब्ध को धन्यवाद कहा। बंशी का सहारा रहा तो जिंदगी की गाथा से खुशी-खुशी जूझ लेगी। पर अगर......नहीं......ये न होने देगी। अपने बंशी को यूं कभी न कहेगी।
आंसू पोंछ वह खड़ी हो गई। हर बार के फोन आने से जितनी खुशी होती है, उससे ज्यादा आज उसका यह फोन कटने से हुई है।
अपने घर में दाखिल हुई। आज भी बंशी साथ ही तो है। कई दिनों से जो मन में मथ रहा था वो हट गया। जी कुछ हल्का हुआ। बंशी फिर हुमक -हुमक कर याद आने लगा। घर पहुंचते ही उन्हीं हवाओं ने फिर जकड़ लिया। लेकिन ये अलबत्ता कुछ घड़ी पहले, जो मुश्किल अपने हाथों पैदा करने वाली थी, उससे कुछ हल्की ही लगी। लंबी उच्छवास खुशी और दर्द की मिली जुली भरी। इंसानी प्रकृति भी कितनी अजीब है। मुश्किलों का मूल्य भी दूसरी मुश्किलों के मद्दे नजर घटता-बढ़ता रहता है।
 
माँ-पिताजी उसकी लंबी उंसांस को सुन एक बार तो चौंके लेकिन फिर अपराध बोध से सिर झुका लिया। वह उनसे बचती हुई जल्दी से पार हो गई। बंशी को अपने मन में छुपाये जैसे भीतर जाकर अकेले में उसका चेहरा, उसकी बातें.....वो....वो....होठों की तपिश नई खुशी के साथ महसूस करेगी। आज उसे जैसे एक बारगी खोकर वापिस पाया है।
एक कल का दिन ही तो है इस घर में आखिरी। फिर तो शायद जीवन भर इस ओर का रुख करने की हिम्मत ही न पड़ेगी।
"पुष्पा!"
वह चौंककर पिताजी को देखने लगी। आवाज में ढोयी हुई मजबूती थी। जैसे वह दिखा देना चाहते हों कि मुश्किलों से घबराते नहीं हैं।
".... सामान बांध दीजै........काल ही जावणो पड़सी......"
कहकर आप ही सिर झुका लिया। सोच रहे होगें सामान किसको कह रहे हैं वे? जहाँ दो जून रोटियों के लाले पड़ रहे हों, छत बचाना मुश्किल हो, उस घर में क्या सामान बचा रह सकता है? कुछेक गुदडि़यां, बहुत थोड़े से चूल्हे चौके के बर्तन, दो माचे (खाट), छोटा मोटा दूसरा सामान और एक सिलाई की मशीन।जो माँ को सरकार की गरीब उद्धार योजना के अंतर्गत मिल गई थी।
 
लेकिन माँ ने सिलाई तो करना दूर उसे छुआ भी नहीं। उसकी बहनों और पुष्पा ने ही इधर-उधर से सीखकर कामचलाउ सिलाई की। धीरे-धीरे खुद की चतुराई से ही दूसरे कपड़े सिलने सीखे। उसमें भी माँ का  सहयोग न के बराबर रहता। दोनों समय रोटी-बाटी बनाकर फुर्ती से सिलाई करने बैठ जाती तीनों बहनें। माँ तो सुबह उठकर नहा धोकर बैठ जाती बाहर की चौकी-पेल्ला पर। हर राह चलते को रोककर बतियाती रहती। गृहिणी सदृश काम करते पुष्पा ने उन्हें कम ही देखा। बल्कि येन केन प्रकारेण कामों को टालती रही। नारी होकर भी कभी गृह कार्यों में रुचि दिखलाई नहीं दी। बल्कि पिताजी ही कभी-कभार खाना बना देते थे। पड़ोस की चाची बताती रही है कि पहले तुम्हारी दादी जीवित रही, तब तक वो ही रसोई संभालती रही। उनके मरने के बाद तुम्हारे दादाजी को रोटी बनाना तुम्हारी माँ को नही सुहाया इसीलिये वो बूढ़े अलग रहकर खुद की रोटी खुद ही बनाने लगे। फिर तुम्हारे पिता को यहीं रोक लिया। काम पर जाने से पहले तुम्हारे पिताजी रोटी बनाकर जाते और शाम को वापिस आकर बनाते। सदा से आलसी ही रही है माँ। अब लगता है पिताजी कभी कुछ कर नहीं पाये तो उसकी वजह केवल माँ है। वे चाहती तो पिताजी को प्रेरित कर सकती थी। पिताजी बिचारे माँ को कुछ कहने की हिम्मत कभी न जुटा पाये। जाने क्यूं दयनीय से रहते। माँ की अकर्मण्यता पर क्रोध आता पर .....शायद पिताजी को भी ये 'पर' ही रोक लेता होगा। ये भी एक विडम्बना है कि जो सोचे-समझे वह ही कुछ कह नहीं पाता।
 
बैलगाड़ी में गृहस्थी का सामान। चढ़ाया जा चुका है। पूरा मुहल्ला विदा करने आया है। पुष्पा को यह एक तमाशा-सा लगा। जैसे तमाशबीन एक घर को बिकते हुये देखने आये हैं। तमाशा ही तो है वरना इस मौहल्ले में जिससे जितना हुआ अपने घर की उंचाई या चौड़ाई में बढ़ोतरी ही की है। दमड़ी से भी ज्यादा अहमियत देते हैं धरती के अपने इस टुकड़े को। और यहां घर के रोजमर्रा के खर्चों में ही पुरखों की निशानी हाथों से तोते की तरह फुरर्र हो गई। पुरखे अपने वंशजों को देखकर क्या ही गुमेज कर रहे होगें। वह फीकी-सी हंसी हंस दी। सिर झुकाये ही यंत्रवत् काम में लगी रही, चलती रही। तमाशाईयों को वह कहाँ देख पाई। वही तमाशाई जिनको बचपन से देखती आई है। काकीयां-धा, भाभू-भाभी, सखियां, सहेलियां आज तमाशाई हैं। नहीं तमाशाई तो नहीं पर जो हो रहा है वो फकत देखने को मजबूर है। सखियों के मुंह उतरे हुये हैं। वो तमाशाई नहीं। काकी भाता बांध कर लाई हैं। ना वो कहाँ तमाशाई? देखो कैसी रुंआसी हो रही है। वो भी गलगली-सी हो रही। मन रोने को हुआ। अभी सीमा को देख लेगी तो रो ही पड़ेगी। उसकी प्यारी सखी। इस बात से उनके संबंध प्रगाढ हो गये क्योंकि दोनों के मंगेतर मुंबई काम करते थे। एक डोर बंध गई कि भविष्य में दोनों सखियां मुंबई रहेंगी और मिलती भी रहेंगी। अहा! कितना सुखद सपना है वह। मुस्कुरा दी बरबस ही। वास्तविकता का खयाल आते ही कुछ दरक गया। भूलने की आदत कितनी जरुरी है इंसान के लिये। पिताजी सिर झुकाये थे पर माँ कोई खास दुखी ना लगी। सामान ऐसे रखवा रही थी जैसे कि नये घर में रहने जा रहे हो तबादले के बाद। एक पल के लिये उसे माँ से घृणा-सी लगी और पिता पर क्रोध उमड़ा। दोनों अकर्मण्य और गृहस्थी की गाड़ी आज बेघर हो गई। इतने महीनों की कशमकश से हिया भारी ही रहता है। हर बात उसके भारीपन और बेबसी में बढोतरी करती जाती। घर का छूटना .....बंशी की याद ....जाने कब मुकलावा (गोना) होगा .......कम होती आस और आज यहां से हमेशा के लिये जाना शरमिंदा होकर। मन-मन के पत्थर कलेजे पर पड़े हों जैसे। वह रो पड़ेगी अब ....नहीं सहा जाता ...ये सब ....उसी पल पुष्पा की पुकार हुई। मुन्नी क्या है? पुष्पा इतना आंखों भर से कह पाई....सामने सीमा आ रही थी भागी-सी...वो ....बंशी का फोन है ...तुझसे......माँ-पिता ने हैरत से देखा उसे। और सबने ही हैरत से देखा। एक पल को वो समय सब भूल ही गये। क्यूंकि किसी को अंदाज नहीं था कि पुष्पा, इतनी सीधी-सी पुष्पा ससुराल के नाम से ही दोहरी होकर शरमाने वाली पुष्पा क्या अपने मंगेतर से बात भी करती है! उंह! क्यूं नहीं कर सकती। वो भी तो एक साधारण लड़की ही है। इस वाकये ने उसे और भी दुख से दबा दिया। लाख दलील दी मन ने अपने सही होने की पर एकाएक ही इस शरमिंदगी से वो खिन्न हो गई। दो पल भर माँ और पिताजी को देखा उलाहना भर कर...बंशी का आतुर चेहरा आंखों में फिर नाच उठा। निरुपाय-सी  दो कदम आगे बढ़ कर सीमा से गले लगकर फफक पड़ी।

- किरण राजपुरोहित नितिला

रचनाकार परिचय
किरण राजपुरोहित नितिला

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कथा-कुसुम (1)