जुलाई 2016
अंक - 16 | कुल अंक - 61
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

ग़ज़ल-गाँव

 

ग़ज़ल-
 
मुद्दत से जो बंद पड़ा था आज वो कमरा खोल दिया
मैंने तेरे सामने दिल का कच्चा चिठ्ठा खोल दिया
 
मुझसे लड़ने वाले सारे मैदाँ छोड़ के भाग गए
लेकर इक तलवार जो मैंने अपना सीना खोल दिया
 
फूल समझकर तितली भँवरे उसपे आकर बैठ गए
बाग़ में जाकर जूं ही उसने अपना चेहरा खोल दिया
 
सारे कामों को निपटाकर आधी रात में सोई थी
भोर भये फिर उठकर अम्मा ने दरवाज़ा खोल दिया
 
मुझ को देख के मेरा जुमला जूं ही उसको याद आया
उसने जो बाँधा था वो बालों का जुड़ा खोल दिया
 
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ग़ज़ल-
 
फसादों से उख़ुवत की जड़ें कमज़ोर होती हैं
बग़ावत से हुकूमत की जड़ें कमज़ोर होती हैं
 
गिले-शिकवे, शिकायत एक हद तक ठीक है लेकिन
सिवा हों तो मोहब्बत की जड़ें कमज़ोर होती हैं
 
फ़लक से तुम ज़मीं पर आओगे मग़रूर होते ही
ये मत भूलो के शोहरत की जड़ें कमज़ोर होती हैं
 
दुवाएं बे-असर होती हैं रिज़क-ए- बद के खाने से
दिखावे से इबादत की जड़ें कमज़ोर होती हैं
 
मुसलसल अश्क का बहना मियाँ अच्छा नहीं होता
नमी हो तो इमारत की जड़ें कमज़ोर होती हैं
 
ये फ़िर्क़ा वारीयत अच्छी नहीं होती मेरे भाई
इसी से ही तो उम्मत की जड़ें कमज़ोर होती हैं
 
ये काले कोट वाले जज के जो इन्साफ परवर थे
उन्हीं से अब अदालत की जड़ें कमज़ोर होती हैं।
 
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ग़ज़ल-
 
जिस्म में ख़ूँ की रवानी का मज़ा आएगा
इश्क़ होते ही जवानी का मज़ा आएगा
 
जोश गुफ़्तार में कुछ और बढ़ा लो अपने
तब ही कुछ शोला बयानी का मज़ा आएगा
 
आज हम दोनों नहाएंगे बड़ी शिद्दत से
आज बरसात के पानी का मज़ा आएगा
 
बारिशें वक़्त पे खेतों को हरा कर दें तो
सब किसानों को किसानी का मज़ा आएगा
 
आज तो मूड है महफ़िल भी है मोहसिन साहब
आज अँगूर के पानी का मज़ा आएगा
 

- मोहसिन आफ़ताब

रचनाकार परिचय
मोहसिन आफ़ताब

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ग़ज़ल-गाँव (2)