जुलाई 2016
अंक - 16 | कुल अंक - 61
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

उभरते स्वर

 

जैसा मैं चाहती हूँ
 
फिर बैठी हूँ आज
तेरी यादों की मिट्टी को
गीला करके
आज मन हो रहा है
तुझे वैसे सोचूँ
जैसा मैं चाहती थी
 
ले आई हूँ
तेरी यादों को सजाने के लिए
एक सुंदर साँचा
अब गढ़ूंगी तुझे वैसा
जैसा मैं चाहती हूँ
 
पहन आई हूँ
अपने भरोसे का वो चश्मा
अब तेरी बेवफाई को
वफा का चोला पहना
तरासुंगी तुझे वैसा
जैसा मैं चाहती हूँ
 
*******************
 
 
कुछ यादें खो गई थीं बरसो पहले
 
सुनो!
क्या कर रही हो?
बोलो ना!
आँखों में नमी क्यूँ है?
कुछ नहीं।
कुछ यादें खो गई थीं बरसो पहले
उन्हीं को ढूँढ रही हूँ
मिली क्या?
हाँ, कुछ मिली हैं
मेरी ख्वाहिशों में लिपटी
कोने में पड़ी थी
शायद धोने से साफ दिखें
अभी तो मलिन हो गई हैं
सिकुड़ गई हैं, धो लाती हूँ
अपनी यादें, अपनी ख्वाहिशें,
शायद मेरी तरह बुढा गई है
साफ नहीं दिख रही
 
*******************
 
 
उस दिन
 
मुझे अच्छा लगा उस दिन
जिस दिन मैं सच में अकेली रह गई थी
और तुमने जबरन मुझे
गले से लगा लिया था
और मैं घंटों सिर्फ रोती रही
ना तुम कुछ बोले, ना ही मैंने कुछ कहा
सिर्फ मेरी सिसकियाँ तुम्हें बयां करती रहीं
मेरी दास्ताँ
और हमेशा की तरह तुम
सुनते रहे मेरी ख़ामोशियाँ
 
*******************
 
 
आज मुझे तुम जी लेने दो
 
सुनो!
आज मुझे तुम जी लेने दो
तोड़ लेने दो मुझे उन बांधों को
जो बरसों से मेरी कोरें भिगोये हुए हैं
तुम हट जाना
वरना बह जाओगे
मेरे आंसूओं के सैलाब में
आज इस प्रवाह को
बह जाने दो
अश्रु प्रवाहित करने दो
आज मुझे तुम जी लेने दो
 
सुनो!
आज बह जाने दो
मुझे भी खुलकर जीना है
मुझे भी खुलकर जीने दो
बहुत दिनों से मुस्कान ओढे हूँ
आज मुझे खिलखिलाने दो
बहुत ढांक ली रिश्तों की चादर
अब उन्मुक्त गगन में उड़ने दो
बहुत ओड़ ली खुशियों की चादर
अब उन्हें बेनकाब होने दो
 
सुनो!
आज मुझे तुम जी लेने दो
बहुत जी हूँ ख़ामोशी से
अब मुझे खुद को सुनने दो
मुझे रूबरू होने दो खुद से
मुझे मुझ ही से मिलने दो
मैं भी तो कभी
एक सरगम-सी थी
उसकी झंकार में जी लेने दो
आज मुझे तुम जी लेने दो

- मिष्टी गोस्वामी

रचनाकार परिचय
मिष्टी गोस्वामी

पत्रिका में आपका योगदान . . .
उभरते स्वर (1)