जुलाई 2016
अंक - 16 | कुल अंक - 61
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कविता-कानन

मैं और तुम

 
सृष्टि के अंत तक
रहेगी हमें
प्रतीक्षा एक दूसरे की
 
पुतलियों में
नेह भर कर
करते हैं आस एक दूसरे की
 
एक न एक दिन
जब हम होंगे
एक दूसरे के सामने
 
घुटनों पर झुककर
करेंगे प्रपोज़ एक दूसरे को
फिर से
जैसे पृथ्वी और गगन
एक दूसरे के समानंतर।
 
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गश्त पर निकले हैं वे
 
रात में वे गश्त पर निकलते हैं
झांकते हैं खिड़की, रोशनदान
हम पीठ पर कांटे उगाए
छुप रहें है अपनी ही खाल के भीतर
कछुए की तरह
 
वे धरती में बनी बांबियों को
रौंद रहे हैं अपने बूटों से
बारिश शुरु होते ही
चींटियां मुंह में अपने अंडे थामे
फैल जाती हैं धरती के ऊपर
और चींटें अपने पंखों समेत
उड़ कर देते हैं अपनी जान
नियोन लाइट के इर्द गिर्द
उन्हें नहीं पता
यह उनकी है आखिरी उड़ान
वे ही उनकी उड़ानों को ध्वस्त करते हैं
हमारे विश्वासों के पर कतरते हैं
वे कीचड़ में सान देना चाहते हैं हमारे सपने
 
पेड़ों पर उदासी घिरती है
और दरकने लगती है धरती
समन्दर का खारापन बढ़ रहा है
साथ ही जु़बान का भी
 
पानी पर लग रहा टैक्स
सपने होते जा रहे हैं मंहगें
नमक के पानी में तड़प रही है मछली
ईष्या के अथाह सागर में
तड़क रही है आदम की नाव
 
जंगलों में शहर की ओर से
आता शोर बढ़ रहा है
बूटों और बंदूक की आवाज़ से
टूट रही है नींद सबकी
साथ ही टूट रहें हैं सपने
क्योंकि वे रात में गश्त पर निकले हैं
 
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क्या हंसते हुए देखा है तानाशाह
 
मुस्कुरा रहा है वह छद्म हंसी
कर रहा है बात पर बात
बता रहा है सबको अपने मन की बात
नहीं सुनता दूसरों की बात
कर रहा है सभा दर सभा
सुना है अकेला है वह
कोई नहीं है उसका
फिर भी अपने लाव लश्कर के संग
खाता है लेविश लंच और डिनर
नहीं है उसे कोई परवाह
 
कि लापता हो रहे हैं बच्चे
खट रही हैं औरतें
धर्म के नाम पर जंग जारी है
सारे वादे ताक पर रख
वह घूम रहा है
आसमान-आसमान
बातों का हुनर आता है उसे
धरती से फलक तक
नाप रहा है आसमान की थाह
बदल रहा है रोज नई पोशाक
इधर प्रजा कर रही है त्राहि त्राहि
न जाने कब पड़ेगी नज़र?
भूखे प्यासों पर उसकी
सेल्फी का लग गया है रोग उसको
हंसता हुआ भी दिखाई नहीं देता कभी
पूरी तरह आत्ममुग्ध है वह
क्या हंसते हुए देखा है कोई तानाशाह?
 
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मुट्ठियां बांध ली हैं हमने
 
जब हम चुप होते हैं
वे घबरा जाते हैं
हमारे अगले कदम का
बेसब्री से इंतजार करते हैं
 
हमारे अगले कदम पर
वे कुछ नहीं बोल पाते
 
उन्हें पता है
कि हमने पकड़ लिए हैं
झूठ उनके
खोखले दावे उनके
सत्ता पर काबिज़ रहने के
इरादे उनके
 
हम भी लाल बीज बोने से
बाज़ नहीं आयेंगे
लेकिन वे हमारे बीज
जमने नहीं देना चाहते
इसलिए अपने लाल मुंह के साथ
हमने चुपचाप
खड़े होकर
भींच ली हैं मुट्ठियां अपनी
और अब वे घबरा गये हैं
 
देख रहें हैं इधर उधर
बचना चाहते हैं हमसे
लेकिन अब हम बोलेंगे
बस तुम चुपचाप सुनो हमें।
 

- मनीषा जैन

रचनाकार परिचय
मनीषा जैन

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कविता-कानन (1)