जून-जुलाई 2020 (संयुक्तांक)
अंक - 61 | कुल अंक - 63
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

यात्रा-वृत्तान्त

मुम्बई दर्शन: अजन्ता गुफाएँ




यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थलों में सन् 1983 में अजन्ता गुफाओं को भी शामिल किया गया। उत्तर-मध्य महाराष्ट्र में औरंगाबाद से लगभग 107 किलोमीटर पर अजन्ता गाँव के समीप आग्नेय चट्टानों को काटकर बनाये गये बौद्ध गुफ़ा मंदिर स्थित हैं, जो अपनी भित्ति चित्रों के लिए विश्व विख्यात हैं। कहते हैं कि इनकी खोज़ का श्रेय आर्मी ऑफिसर जॉन स्मिथ व उनके कर्मचारी दल को जाता है, सन् 1819 में वे यहाँ शिकार खेलने आये थे, तभी उनकी नज़र घोड़े के नाल अर्थात् अंग्रेजी के अक्षर U के आकार में कतारबद्ध 29 गुफाओं का ऐतिहासिक ख़ज़ाना मिला, जो अपने भित्तिचित्रों व शिल्प से विश्वप्रसिद्ध हुआ।

अजन्ता की ऐतिहासिक चित्रकारी पर्यटकों को अपनी ओर खींचे बिना नहीं रहती। जो भी कलाप्रेमी सुनता है, वो अपनी मुम्बई यात्रा में इन्हें देखे बिना औरंगाबाद से वापिस नहीं होता। ये गुफ़ाएँ ऐतिहासिक काल की अभियांत्रिकी का एक उत्कृष्ट उदाहरण हैं। ये सभी गुफाएँ पूर्वोत्तर में वाघुर नदी घाटी की बाईं तरफ स्थित चट्टानों को काटकर निर्मित की गयीं हैं, जो कि देखने में पूर्णतया नैसर्गिक लगती हैं अपितु हैं ये मानव निर्मित।
अजन्ता के भित्ति चित्र हजारों वर्षों के भी पहले से अपने अस्तित्व को जताते हुये अपनी चित्रों में अंकित जातक कथाओं व पात्रों, घटनाओं को जीवित रखे हुये हैं। बौद्ध धर्म को समर्पित इन गुफाओं का निर्माण पाँचवीं व दसवीं शताब्दियों के मध्य किया गया था।


मेरे लिये आज तक सहेजी दो सबसे प्रमुख यादों में से एक तो रोशनी में चमकते भित्तिचित्र और उनके पात्रों के दमकते आभूषणों की जगमगाहट है और दूसरी याद घाटी में बहती नदी का आनन्द, जिसके पानी की सतह से तल के रंग-बिरंगे चिकने पत्थर और रंगीन मछलियाँ बाख़ूबी देखी जा सकी थीं। पैरों को पानी में डालने पर वो नन्हीं मछलियाँ तलवों और पिंडली पर गुदगुदी करने लगी थीं। बहरहाल आपको गुफाओं तक लिये चलती हूँ, उससे संबंधित इतिहास के संग-संग।

इतिहास के झरोखे में झाँकें तो ये सह्याद्रि की पहाड़ियों पर स्थित तीस गुफाओं का समूह है ,जिनका खनन दो अलग-अलग कालखंडों में किया गया । घोड़े की नाल के आकार में पहाडियों को काटकर निर्मित की गयी इन 30 गुफाओं में लगभग 5 प्रार्थना भवन और 25 बौद्ध मठ बताये गये हैं ।
अजन्ता की गुफाओं को दो भागों में बाँटा गया है - एक भाग में बौद्ध धर्म के हीनयान और दूसरे भाग में महायान सम्प्रदाय की झलक देखने को मिलती है ।हीनयान वाले भाग में 2 चैत्य और 4 विहार हैं ,तथा महायान वाले भाग में 3 चैत्य और 11 विहार है।
प्रार्थना,ध्यान ,शिक्षा-दीक्षा और विश्राम हेतु प्रत्येक को सुनिश्चित किया गया था ।
इन गुफाओं की शिल्पकला व चित्रकारी बौद्ध धर्म का अनुसरण करती दिखती है ,इसमें बौद्ध भिक्षुओं की मूर्तियाँ व चित्र है। इन गुफाओं में अनेक प्रकार के फ्लोरा-फौना को उकेरा गया है । बुद्ध एवं बोधिसत्वों की प्रतिमाओं के टंकन के साथ -साथ ये चित्र अधिकतर जातक कथाओं को दर्शाते हैं,जो बोधिसत्व के रूप में बुद्ध के पिछले जन्‍म से संबंधित विविध कहानियों का चित्रण करते हैं। शिल्प में बुद्ध से जुड़ी आध्यात्मिक शांतिधारा स्पष्ट दिखाई देती है । बोधिसत्त्व नारी रूप के अतिरिक्त किसी भी रूप में हो सकते हैं – हाथी, बंदर, हंस साँप या पुरुषमानव रूप ।


अजन्ता की गुफाओं की भित्तियों पर सुन्दरतम् राजकुमारियों व उनकी दासियों के ना-ना मुद्राओं में मनोहारी चित्र भी उकेरे गए है, जो अपने आप में ही उत्कृष्ट चित्रकारी व मूर्तिकला के शानदार नमूने है।
गुफा क्रमांक एक के बावत् कहूँ तो ...यह गुफा ढ़ेरों चित्रों से भरी हुई है जिन्हें बखूबी संरक्षित किया गया है ।
प्राचीनतम् चित्रकारी को धुंधले,कहीं उखड़े रंगों वाले,कहीं खंडित नैन-नक्श के बावजूद इन्हें बहुत एहतियात से सहेजा गया है । तराशी गयी इन गुफाओं में काफी अँधेरा रहता  है ,इन्हें बिना उचित प्रकाश व्यवस्था के देखा जाना संभव नहीं । गाइड महोदय आपको टंकित बारीकियों के बखूबी दर्शन करवायेंगे ।
समुचित प्रकाश में मोती से चमकते भित्ति चित्र आपको मुग्ध भी करेंगे और सोचने पर मजबूर भी कि...किस तरह शताब्दियों बाद ये शिल्प टिका रह सका ?
उस काल में न तो समुचित उपकरण थे ना साधन और ना ही प्रकाश की व्यवस्था ,फिर किस तरह के रहे होंगे वो सम्पन्न, गुणी चितेरे ,शिल्पी ??
कहना चाहूँगी कि.. इन गुफाओं को अनुभवी गाइड और उनके द्वारा इस्तेमाल किये गये रिफ्लेक्टर्स की सहायता द्वारा ही देखकर आनंदित हुआ जा सकता है ।


अजन्ता में 'फ्रेस्कॉस' तथा 'टेम्पेरा' दोनों ही तकनीक की मदद से चित्र गढ़े गए हैं। बताते हैं कि... चित्रों को बनाने के पूर्व भित्ति को भली भाँति रगड़कर साफ़ किया जाता था तथा फिर उसके ऊपर कुछ शिल्प मसालों (भूसे ,चूने,शीशे ) का लेप चढ़ाया जाता था ,जिनके सूखने पर ये चित्र उकेरे गये हैं ,तकनीकी दृष्टि से ये फ्रेस्कॉज नहीं हैं क्यों कि ...उस विधि में लेपन की गीली सतह पर ही कलाकारी की जाती है । सूखे लेपन पर उकेरे चित्रों को टेम्पेरा तकनीकी में सुरक्षित किया गया है ,अतः इनको टेम्पेरा चित्रकला कहना ही उचित होगा । हजारों साल बाद भी इनके रंगों की चमक जस की तस बनी हुई है । यही खूबी इनके गौरवशाली और सम्पन्न विरासत होने को दम भरती है ।
अजन्ता की गुफा संख्या 16 में उत्कीर्ण ‘मरणासन्न राजकुमारी‘ के चित्र की खूबसूरती देखने योग्य है,तो वहीं बोधिसत्त्व पद्मपानी और बोधिसत्त्व वज्रपानी भी अलौकिक छवि दर्शाते हैं । इन गुफाओं की छतों पर समान्यतया जानवरों की आकृतियों के चित्र हैं। साथ ही छतों पर आपको बहुत सारी ज्यामितीय आकृतियाँ भी दिखेंगी तो क्षितिज के समानान्तर लकीरें भी, उनमें संगत घुमाव, मेहराब उकेरने के साथ ,सृजन की हज़ारों जटिलताओं पर ध्यान जाता है । कोनों में भाँति-भाँति की आकृतियों के ब्रह्मराक्षसों को अंकित करा गया है ।
कह सकती हूँ कि...निश्चित ही यह कलाकारी आश्चर्यचकित करती है ।
अब इस चित्र को पूर्ण रूप से देखिये। इसमें आपको भौतिकवादी जीवन के सारे लक्षण दिखेंगे, जैसे किरीट, बहुमूल्य गहने और रेशमी कपडे। इसी के साथ क्या आप करुणा से भरी उन अधखुली आँखों को देख सकते हैं? साथ ही साथ क्या वे साधना में लीन नहीं जान पड़ती? यही विरोधाभास अजंता के प्रसिद्ध चित्र पद्मपानी को और सुंदर बनाता है। वह एक साथ कामुक और दिव्य भी है और एक ही समय पर भौतिकवादी और आध्यात्मिक भी है।


वज्रपानी के चित्र में आप उसके किरीट की जटिल रचनावली को देख सकते हैं। तथा उसमें चांदी की महीन कारीगरी को उत्तम तरीके से दिखाया गया है।
बाईं तरफ गुफा क्रमांक एक में ही आप बोधिसत्व महाजनक की कथा को अंकित देखेंगे , मिथिला में वे एक सामान्य मनुष्य के रूप में पले-बड़े और बड़ा होने पर राजसी परिवेश में ।उन्होंने श्रीलंका की यात्रा के दौरान राजकुमारी शिवाली से विवाह किया था । एक दिन वे सारे सांसरिक सुखों का त्याग कर देते हैं ।
दाहिनी ओर नन्द जातक अंकित हैं,जो बुद्ध के सौतेले भाई की कथा बताते हैं, जिसमें बुद्ध अपने भाई नन्द को स्वर्ग में लेकर जाते हैं, जिसके बाद वे संसार का त्याग कर बुद्ध की शरण लेते हैं ।
कुछ कथा चित्र कामुक ,भोगविलास,राजसी रहन-सहन,परिवेश,संगीत ,वाद्ययंत्रों आदि को भी दर्शाते हैं ,जिनकी कथाओं से अभी तक जुड़ नहीं सकी । इसके लिये पुनः एक यात्रा आवश्यक लगती है मुझे ।
गुफा क्रमांक सत्रह में उत्कीर्ण चित्रों में माता और शिशु नाम का चित्र मुग्ध करता है । इस गुफा के चित्रों को ‘चित्रशाला‘ कहा गया है। इसका निर्माण हरिषेण नामक एक सामन्त ने कराया था। इस चित्रशाला में बुद्ध के जन्म, जीवन, महाभिनिष्क्रमण एवं महापरिनिर्वाण की घटनाओं से संबंधित चित्र उकेरे गए हैं।


यही नहीं आप गुफा नंबर एक में आप एक फ़ारसी राजदूत भी देख सकते हैं और गुफा के इस भाग की सारी चित्रकारी फ़ारसी परिवेश को प्रदर्शित करती है। इस व्यक्ति को गोरी त्वचा में दर्शाया गया है, जबकि ज़्यादातर मूल निवासियों की त्वचा सांवली है। पर्दे, लम्बे अंगरखे, टोपी ,हाथ में पकड़ा हुआ प्याला आदि फ़ारसी परिवेश को उद्धृत करता है, जो फ़ारसी व्यापारियों से सम्बंधों की निश्चित ही पुष्टि करते हुये जताता है कि... चित्रकार को उस संस्कृति का भी पूर्ण ज्ञान रहा होगा या विदेशी सभ्यता से परिचय रहा होगा ।

अपनी अजन्ता यात्रा में भित्तिचित्रों की बारीक डीटेलिःग पर जरूर ध्यान दीजियेगा ,आनन्द में तैरेंगे । यहाँ की वास्तुकला एवं भित्तिचित्रों को और अच्छे से समझने हेतु आप पुरातात्विक विभाग की पुस्तक संग रख सकते हैं ,वो टिकिट लेते समय ही खरीदी जा सकती है ।

हमारी धरोहरें हमारे समृद्धशाली इतिहास और तकनीकी ज्ञान को बखूबी समझाती हैं ,विज्ञान व तकनीकी हर काल खंड के लिये भिन्न रही है और निरंतर समृद्ध भी होती रही है ।
हमारी वास्तुकला का कोई सानी नहीं..... ना कल ना आज और ना आगे कभी ।


 


- प्रीति राघव प्रीत