जून-जुलाई 2020 (संयुक्तांक)
अंक - 61 | कुल अंक - 63
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

ख़बरनामा


सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए हुआ पुस्तक विमोचन




बरेली। 28 जून। लॉक डाउन की चुभन भरी खामोशी के बाद यदि कहीं कोई रचनात्मकता मुखर होती है तो बहुत अच्छा लगता है। प्रख्यात नवगीतकार रमेश गौतम की दूसरी पुस्तक दोहा संग्रह के रूप में पाठकों के बीच में आयी है। इस पुस्तक का विमोचन समारोह पुस्तक के प्रकाशन अनुकृति प्रकाशन (रजि.) की स्वत्त्वाधिकारी डॉ. हितु मिश्रा के सौजन्य से सम्पन्न हुआ। विमोचन समारोह में विशिष्ट अतिथि प्रख्यात इतिहासकार रणजीत पांचाले जी ने कहा कि
गौतम जी एक साहित्यकार होने के साथ-साथ एक चित्रकार भी हैं इसलिए उनकी कविता में विलक्षण चित्रात्मकता और बिम्ब विधान दिखायी देता है। प्रस्तुत दोहा संग्रह भी इससे अछूता नहीं है। विशिष्ट अतिथि बरेली आकाशवाणी की केन्द्राध्यक्ष व सुप्रसिद्ध हाइकुकार मीनू खरे जी ने कहा कि दोहा संग्रह का शीर्षक ही 'बादल फेंटें ताश' पुस्तक को पढ़ने की सुखद उत्सुकता पैदा करता है। उन्होंने उदाहरण दिया-

आँखे अन्धी हो गयी, ताक-ताक आकाश।
कर्तव्यों से बेख़बर, बादल फेंटें ताश।।

नये बिम्बों  से भरपूर उनके दोहे सामयिक स्थितियों का खूब आकलन करते हैं।

मुख्य अतिथि श्री विलास सिंह जी संयुक्त आयकर आयुक्त एवं नई कविता के विशिष्ट कवि ने कहा कि रमेश गौतम की कृति नि:सन्देह पाठकों के बीच लोकप्रिय होगी। अभी उनके कुछ दोहों की बानगी मिली है, जिससे एक बात स्पष्ट है कि कविता केवल मानसिक व्यायाम नहीं है। कविता की सफलता और सामर्थ्य ही उसे सिद्ध करती है। काव्यविधा का कोई भी प्रकार हो, उसे अच्छा काम करके ही बचाया जा सकता है। दोहा हमारा प्राचीन छंद है, गौतम जी ने उसे वर्तमान संदर्भ दिए यह सराहनीय है।

कार्यक्रम के अध्यक्ष प्रसिद्ध पर्वतारोही श्री गोपाल शर्मा ने कहा कि रमेश गौतम जी का संग्रह हमें आश्वस्त करता है कि समय और स्थितियों पर सटीक नज़र रखते हैं। कथाकार डॉ. लवलेश दत्त ने दोहा संग्रह पर केन्द्रित वक्तव्य दिया व प्रसिद्ध शास्त्रीय गायिका डॉ. हितु मिश्रा ने कुछ दोहों पर मर्मस्पर्शी गायन प्रस्तुत किया। डॉ. लवलेश दत्त की बेटियों अनुकृति व अनुश्रुति ने सरस्वती वन्दना प्रस्तुत की। रमेश गौतम ने सभी आगन्तुकों के प्रति हार्दिक आभार व्यक्त किया। संचालन डॉ. लवलेश दत्त ने किया।






सम्पर्क द्वारा आयोजित ई-साहित्य उत्सव मंच जोरो पर




जयपुर। 'संपर्क ई-काव्य उत्सव मंच' की तीसरी कड़ी में खूबसूरत काव्य गोष्ठी की मधुर शाम यादगार रही। संस्थान के अध्यक्ष श्री अनिल लढ़ा ने मुख्य अतिथि डॉ. अखिल शुक्ला व निर्णायक भारतीय प्रशासनिक सेवा अधिकारी मनोज जी का स्वागत करते हुए मंच संचालक व संयोजक रेनू शब्दमुखर व वीडियो निर्देशक मास्टर मनु लेखक के साथ सभी प्रतिभागियों का स्वागत किया।

मुख्य अतिथि शुक्ला जी ने संपर्क संस्थान के सामाजिक कार्यों के साथ साहित्य की सेवा में रत रहने पर ख़ुशी जताते हुए इस ऑनलाइन काव्य गोष्ठी की सराहना करते हुए सभी कवयित्रियों को शुभकामनाएँ दी। निर्णायक मनोज जी ने प्रस्तुत काव्य गोष्ठी में सभी समसामयिक कविताओं को श्रेष्ठ बताते हुए प्रथम पुरस्कार अजमेर की नंदिता रवि चौहान की कविता 'अलाव में पकता सच' और जयपुर की डॉ. आशा शर्मा की आशावादी कविता 'नई भोर' को दिया व अपनी कविताओं के रस से सभी को सराबोर किया।

प्रतिभागी कवयित्रियों में डॉ. आशा शर्मा, नंदिता रवि चौहान, डॉ. आरती ने 'अन्तहीन संघर्ष', कल्पना गोयल ने 'माँ की महिमा पर', सीमा भाटी ने स्त्री जाति की पीड़ा की मार्मिक अभिव्यक्ति, स्वाति जैसलमेरिया ने 'हे सत्य तुम अमर हो', सोनू सिंघल ने 'संध्या और चांद के मिलन पर', सत्या कीर्ति ने स्त्री की महिमा पर, डॉ. अनिता राठी ने अस्मिता को लेकर, डॉ. प्रिया सूफी ने पुरानी यादें, मोना बग्गा ने स्त्री की महिमा पर 'हौसला रख फूलों में पलने वाली' कविता सुनाकर सभी का मन जीत लिया।

अंत में लता-सुरेश की जुगल जोड़ी ने 'ले चल मेरे नाविक भुलावा देकर' गाकर जयशंकर प्रसाद जी की स्मृतियों को ताजा कर दिया। काव्य गोष्ठी में देश भर के सहित्यनुरागियों में डॉ. अमला बत्रा, वीना आडवाणी, डॉ. लता श्रीमाली, संगीता राजा, पारुल वर्मा, नीलम वंदना, कविता जी, भाग्यम जी, ज्योत्सना जी, एकता शर्मा, डॉ. सूरज माहेश्वरी, मंजु शुक्ला, नंदिता, मीना सोनी, डॉ. कविता रायजादा, शशि पाठक, किरन आचार्य, अर्चना श्रीवास्तव आदि सम्मलित हुए।






सप्तदिवसीय ऑनलाइन राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन


संत गणिनाथ राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, मोहम्मदाबाद गोहना, ज़िला- मऊ में संस्कृत विभाग के तत्वावधान में 'संस्कृत छंदसाम शिक्षणम अनुप्रयोग' विषयक सप्तदिवसीय ऑनलाइन राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन दिनांक एक जून से सात जून 2020 तक किया गया। एक जून 2020 को उद्घाटन सत्र में मुख्य अतिथि के रूप में संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर राजाराम शुक्ल जी, विशिष्ट अतिथि के रूप में सुज्ञान कुमार माहान्ति जी एवं सारस्वत अतिथि के रूप में प्रो. मनु लता शर्मा जी (काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी) उपस्थित रहीं। मुख्य अतिथि प्रोफेसर शुक्ल जी ने संबोधित करते हुए कहा कि संस्कृत छंदशास्त्र एक महत्वपूर्ण विषय है, जिससे वर्तमान में संस्कृत अध्येताओं और काव्य रचनाकारों को गति मिलेगी। प्रतिदिन इस कार्यशाला में दो सत्र होते थे- प्रथम शिक्षण सत्र एवं द्वितीय अनुप्रयोग
सत्र। प्रथम सत्र में शिक्षण हुए छंदों पर ही द्वितीय सत्र में अनुप्रयोग करना होता था। शिक्षण सत्र में प्रो. बलदेवानंद सागर, प्रो. मुरली मनोहर पाठक, प्रो. रामसुमेर यादव, डॉ. नवलता आदि कुल 20 प्रशिक्षकों द्वारा लगभग 30 छन्दों पर प्रशिक्षण हुआ, जिसमें कुल 415 शिक्षकों, शोधार्थियों एवं संस्कृत अनुरागियों ने प्रतिभाग किया।

अनुप्रयोग सत्र में चार गण क्रमशः कालिदासगण, भवभूतिगण, वेदव्यासगण, भासगण बनाए गये थे। प्रत्येक गण में शताधिक प्रतिभागियों ने विभिन्न छंदों पर अनुप्रयोग किया। दिनांक 7 जून 2020 को अंतिम समापन सत्र में डॉ. वाचस्पति मिश्र, अध्यक्ष उत्तर
प्रदेश संस्कृत संस्थान, लखनऊ ने मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित करते हुए कहा कि इस कार्यशाला की सार्थकता तभी होगी, जब सभी
प्रतिभागी छंदशास्त्र को आत्मसात करने के साथ-साथ संस्कृत काव्य रचना में भी प्रवृत्त होंगे। सारस्वत अतिथि के रूप में रानी दुर्गावती
विश्वविद्यालय जबलपुर, मध्यप्रदेश के संस्कृत विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. रहस बिहारी द्विवेदी जी ने बताया कि यह बहुत सुखद
क्षण है कि मैं संस्कृत अनुरागियों और नवोदित कवियों से इस कार्यशाला के माध्यम से परिचित हो रहा हूँ। मुझे पूर्ण विश्वास है कि
यह कार्यशाला सबके लिए उपादेय एवं लाभकारी तब होगी, जब हम स्वयं प्रेरित होने के साथ-साथ दूसरों को शुद्ध संस्कृत बोलने एवं संस्कृत
पद्य रचना के लिए प्रेरित करेंगे। इस सप्तदिवसीय कार्यशाला के दोनों सत्रों प्रतिभागियों को छंद ज्ञान कराने में डॉ. निरंजन मिश्र, डॉ. कमला
पाण्डेय, डॉ. राजेन्द्र त्रिपाठी 'रसराज', डॉ. अरविन्द तिवारी, डॉ. अरुण कुमार निषाद, डॉ. शैलेश कुमार तिवारी, डॉ. शशिकांत शास्त्री, डॉ. राजकुमार मिश्र, डॉ. संजय कुमार चौबे आदि का विशेष सहयोग प्राप्त होता रहा है। सभी अतिथियों का स्वागत महाविद्यालय के
यशस्वी प्राचार्य डॉ. सतीश चंद्र कुमार एवं धन्यवाद ज्ञापन संस्कृत विभागाध्यक्ष डॉ आर. एन. यादव ने किया। कार्यशाला के समन्वयक
डॉ. चंद्रकांत दत्त शुक्ल, सचिव डॉ. अवनीश कुमार सिंह एवं सह संयोजक डॉ. राकेश कुमार जी ने मार्गदर्शन एवं सहयोग के लिए सभी
विद्वानों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित किया।






एक दिवसीय राष्ट्रीय ऑनलाइन कवि सम्मेलन का आयोजन




कवि का कर्म ही कविता है। प्राचीन समय में कवि को स्रष्टा, सर्वज्ञ, मन्त्रद्रष्टा आदि अनेक संज्ञाओं से अभिहित किया गया था।

साहित्य, संगीत, कला विहीन: साक्षात्पशु: पुच्छविषाणहीन:
तृणं न खादन्नपि जीवमान: स्तद्‍भागधेयं परमं पशूनाम।।
अर्थात् साहित्य संगीत और कला से रहित मनुष्य पूँछ और सींग से रहित साक्षात् पशु ही है, जो कि वह तिनके-घास आदि को न खाता हुआ भी जीवित रहता है। यह पशु का परम सौभाग्य है। आज की इस कोरोना नामक वैश्विक महामारी में इसी साहित्य और कला को संरक्षित करने का कार्य कर रही हैं कुछ संस्थाएँ, जिसमें एक्सप्रेशंस इन लैंग्वेजेस एंड आर्ट्स फाउंडेशन लखनऊ का नाम अग्रगण्य है। द बी. पी. सी. एस. दादा साहेब देवीदास नामदेव भोले कॉलेज, भुसावल, जलगाँव (महाराष्ट्र) के भाषा विभाग और एक्सप्रेशंस इन लैंग्वेजेस एंड आर्ट्स फाउंडेशन लखनऊ, उत्तरप्रदेश के संयुक्त तत्त्वाधान में एक दिवसीय राष्ट्रीय ऑनलाइन कवि सम्मेलन का आयोजन 18 जून को सम्पन्न हुआ। इस कवि सम्मेलन में 16 कवियों-कवयित्रियों ने भाग लिया।

इस कवि सम्मेलन में तीन सत्र थे। इसका पहला सत्र मराठी भाषा का, जिसमें शिवपुर से डॉ. फुला बागुल, सासवड पुणे से डॉ. बाबन चाखले, लोनार बुलडाणा से डॉ. विशाल इंगोले, सांगली से डॉ. सुनील तोरने और नासिक से डॉ. जयश्री वाघ ने अपनी कविताएँ प्रस्तुत कीं। दूसरा सत्र अंग्रेजी भाषा का, जिसमें लखनऊ से डॉ. नरेन्द्र दानी, उन्नाव से डॉ. बैजनाथ गुप्ता, संभलपुर उडीसा से डॉ. मानसी महाराणा, नासिक से डॉ. किशोर निकम, नंदुरबार से डॉ. जितेन्द्र बागुल और पटना से डॉ. शिवकुमार यादव ने काव्यपाठ किया। तीसरा सत्र हिन्दी भाषा का था, जिसमें लखनऊ से डॉ. बृजेश व अरुण कुमार मिश्र, समस्तीपुर बिहार से डॉ. शम्भूनाथ झा, लखनऊ से सुश्री वसफिया हसन नकवी तथा सुल्तानपुर के युवाकवि और समीक्षक डॉ. अरुण कुमार निषाद ने अपने गीत-ग़ज़ल से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।

डॉ. निषाद ने जून 2020 में कादम्बिनी पत्रिका में प्रकाशित अपनी प्रसिद्ध ग़ज़ल 'दिलों की धड़कनें अब भी तुम्हारा नाम लेती हैं’ सुनाई साथ ही
साथ उन्होंने कविता तत्त्वों-भाव, बुद्धि एवं शैली पर भी प्रकाश डाला। कार्यक्रम का संचालन संस्था के सचिव डॉ. कुलवंत सिंह ने तथा धन्यवाद
ज्ञापन संस्था के अध्यक्ष प्रो. रवीन्द्र प्रताप सिंह ने किया। कार्यक्रम के तकनीकी सहयोग में प्रो. अलका सिंह, डॉ. आर. पी. फ़लक, डॉ. अंजलि
पाटिल, सुश्री सनाविया फरीद, डॉ. संजय विट्ठल बाविस्कर व डॉ. वैदूर्य जैन आदि की अहम भूमिका रही है।


- टीम हस्ताक्षर