दिसम्बर 2019
अंक - 55 | कुल अंक - 60
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

धरोहर
मिर्ज़ा ग़ालिब – 27 दिसंबर जन्मदिन पर विशेष 
 
तुम्ही कहो कि ये अंदाज़े गुफ्तगू क्या है?
 
उर्दू साहित्य ग़ालिब की रचनाओं से ठसाठस भरा है | एक एक रचना छना हुआ पानी है | ग़ालिब हमारी सम्पन्नता के प्रतीक है | इनकी बदौलत हम विश्व के सामने सीना ठोक कर कह सकते है कि अगर तुम्हारे पास शेक्सपियर है ,बर्नाड शाह है, गोर्की है तो हमारे पास भी असदुल्लाह ग़ालिब है | ग़ालिब साहित्य के किसान थे ,जिंदगी भर शेरो सुखन की खेती करते रहे लेकिन उनकी फ़सल को कभी आधार मूल्य नही मिला | ग़ालिब मुफलिसी से जूझते रहे और कहते रहे –
न था कुछ तो खुदा था – कुछ न होता तो खुदा होता 
डुबाया मुझको होने न – न मै होता तो क्या होता ||
हुआ जब ग़म से यों बेहिस , तो ग़म क्या सर के कटने का 
न होता गर जुदा तन से , तो जानू पर धरा होता ||
 
ग़ालिब की खामोश शायरी में ज़बरदस्त गतिशीलता है | एक शांत स्वभाव का पाठक जब ग़ालिब को पढता है तब उसे अहसास होता है कि एकाएक उसके अंदर कितनी हलचल पैदा हो गई है | ग़ालिब का अधिकांश काव्य फ़ारसी में है ,बाद में उन्होंने उर्दू में लिखा ,लेकिन वह बहुत क्लिष्ट भाषा में है | उनसे जब कहा गया कि इतना कठिन न लिखे तो इसका जवाब उन्होंने अपनी गज़ल के एक शेर में देते हुई कहा था जिसका अर्थ था की " कठिन न लिखू तो लिखना कठिन होगा " लेकिन बाद में उन्होंने थोड़ी बहुत शायरी आम बोलचाल की भाषा में भी कि लेकिन ये थोडा भी इतना ज्यादा है कि एक लेख में उसे समेटा नही जा सकता | ग़ालिब के अनेक शेर ऐसे है जो हमारी जिंदगी का हिस्सा बन गए है और हम गाहे बगाहे आपसी बोलचाल में उसका इस्तेमाल करते रहते है जैसे –
इश्क ने ग़ालिब निकम्मा कर दिया 
वरना हम भी आदमी थे काम के ||
 
जी ढूंढता है फिर वही फुर्सत के रात दिन 
बैठे रहे तस्व्वुरे जहां किये हुए ||
 
काबा किस मुंह से जाओगे ग़ालिब 
शर्म तुमको मगर नहीं आती ||
 
रगों में दौड़ने फिरने के हम नहीं कायल 
जो आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है ||
 
इस सादगी पे कौन न मर जाए ए खुदा
लड़ते है और हाथ में तलवार भी नहीं ||
 
ग़ालिब के पास एक व्यापक दृष्टिकोण है यही कारण है कि उनकी शायरी में ज़बरदस्त विस्तार है ,कई कई दशको से विद्वान ग़ालिब को बार बार और बार बार पढ रहे और तय नहीं कर पा रहे है कि इसका वास्तविक अर्थ है क्या ? आप ग़ालिब की कोई भी गज़ल पढिये ,एक बार ग़ज़ल का मज़ा उसके शब्द देगे , फिर यकायक लगेगा इसका मजा इसके लहजे में है , फिर वही गज़ल को पढिये तो लगेगा ये अपने विषय की वजह से इतनी अच्छी लगती है , फिर अचानक आप उसके रदीफ़ और काफ़िये की बात करने लगेगे, तभी आप चौक पड़ेगे कि ये ग़ज़ल तो आपकी अपनी आप बीती है ,फिर आप अपने हर बयान को निरस्त कर देगे और कहेगे यह तो अध्यात्म है , ग़ालिब के कुछ बेहद लोकप्रिय गजलो के शेर का मुआयना किया जाये -
 
चंद तस्वीर ए बुताँ ,चंद हसीनो के खतूत 
बाद मरने के मेरे घर से ये सामाँ निकला ||
 
मेरी किस्मत में गम गर इतना था 
दिल भी या रब कई दिए होते ||
 
इन आबलो से पाँव के घबरा गया था मै 
जी खुश हुआ है राह को पुर – खार देख कर ||
 
बेवजह नही रोता इश्क में कोई ग़ालिब
जिसे खुद से बढ़कर चाहो वो रुलाता ज़रूर है ||
 
इशरत ए कतरा है दरियां में फना हो जाना 
दर्द का हद से गुजरना है दवा हो जाना ||
 
आप ग़ालिब की एक ग़ज़ल पढिये फिर उसे दूसरी और तीसरी बार पढिये अचानक ग़ालिब का शब्द चयन आप पर जादू करने लगेगा , उनके शब्द तितली की तरह उड़ने लगेगे ,उसमे स्पंदन होने लगेगा ,अचानक उसमे संगीत पैदा हो जायेगा ,और और और अरे ये क्या आप तो इसे गाने लगे ,अब आप सोचेगे कि भई ये मिया ग़ालिब शायर होने के साथ साथ क्या गायक और संगीतकार भी थे क्या ? चलिए एक बार जनाब मिर्ज़ा असदुल्ला ग़ालिब की इस गज़ल पर नज़र डालते है _
 
नुक्तह ची है गम ए दिल उस को सुनाये न बने 
क्या बने बात जहां बात बनाये न बने ||
खेल समझा है कही छोड़ न दे भूल न जाए 
काश यूँ भी हो कि बिन मेरे सताए न बने ||
गैर फिरता है लिए यूँ तिरे खत को कि अगर 
कोई पूछे कि यह क्या है तो छुपाये न बने ||
कह सके कौन कि यह जल्वह गरी  किस की है 
परदह छोड़ा है वह उस ने कि उठाये न बने ||
मौत की राह न देखू कि बिन आए न रहे 
तुम को चाहू कि न आओ तो बुलाए न बने ||
इश्क पर जोर नहीं है यह वो आतिश ग़ालिब 
कि लगाए न लगे और बुझाए न बने ||
 
उर्दू साहित्य वह दुल्हन है जो ग़ालिब की शायरी से सजी है ,उसके बदन पर ग़ालिब के अशआर ,कान के झुमके ,पैर की पाज़ेब ,नाक की फुल्ली और गले का हार की मानिंद है | यह समझ सकने वालो की शायरी है ,यदि शेर का मतलब भी समझाना पड़े तो शायरी का सारा मज़ा किरकिरा हो जाता है | ग़ालिब को तभी पढना अगर कुछ अच्छा पढने का इमानदाराना शौक हो ,समझ समझ के पढने का हौसला हो | अगर टाइम पास करने के लिए पढना है ,नींद नहीं आ रही इसलिए पढना है तो खुदा के वास्ते ग़ालिब पर हाथ न धरे | अगर आपके अंदर भी एक छोटा मोटा शायर बसता है तभी इस बड़े शायर को पढिये ,जानिये एक बार मिर्ज़ा ग़ालिब ने यह तक कह दिया था -
या रब वो न समझे है न समझेगे मेरी बात 
दे और दिल उनको जो न दे मुझको जुबां और ||
है और भी दुनिया में सुखनवर बहुत अच्छे 
कहते है कि ग़ालिब का है अंदाज़ ए बयाँ और ||
 
ग़ालिब आपको नये संसार का बोध कराते है | ग़ालिब की रचनाये पाठक का तीसरा नेत्र खोल देती है | ग़ालिब आपको शून्य से अनन्त में पंहुचा देते है | लेखन में मर्यादा और आचरण का कैसे ख्याल रखा जाता है यह जानना है तो ग़ालिब के साहित्य संसार में कदम  रखिये | दीवाने ग़ालिब महज़ काव्य संग्रह नहीं बल्कि एक ग्रन्थ है | इसमें बेहद सलीके से किया गया विवेचन मौजूद है | शायरी में सिर्फ शब्दों का ही श्रंगार नहीं है बल्कि विचारधारा  का मिश्रण गज़ल लेखन की समूची  नियमावली का पालन करते हुए किया गया है | ग़ालिब ने अपनी रचना में जो कहा है उसे पूरी सम्पूर्णता के साथ कहा है , अगर इसमें दर्द है तो बेइन्तहा है ,आंसू है तो आंसुओ का दरिया बहा दिया है , चुनौती दी है तो सीना ठोक कर दी है , तंज़ किया है तो चुभता हुआ किया है , अभाव की शायरी से भी साहित्य को सम्पन्न कर दिया गया है | शायरी में बात कहने की निपुण कारीगरी की वजह से ग़ालिब पिछले कई दशको से हजारो लाखो पढने वालो के प्रिय रहे है | आप ग़ालिब के दीवान को हृदय के पुस्तकालय में सम्भाल कर रखिये इसमें ज्ञान का खजाना है | ग़ालिब को पढ़ कर कई शायर उस्ताद शायर का दर्जा हासिल किये है , ग़ालिब पर अनगिनत शोध किये गये और किये जा रहे है , ग़ालिब की रचनाओ और जीवन पर फिल्मे बनी धारावाहिक बने | इस गरीब शायर ने बहुतो को अमीर  बना दिया |
 
ग़ालिब की लेखनी का जादू देखना है तो उसे रुक रुक कर ,ठहर ठहर कर , घूट घूट , चुस्की चुस्की , पलट पलट कर पढिये , आप आप नहीं रहेगे , आप वो हो जायेगे जो आप नहीं थे पर होना चाहते थे | ग़ालिब आप को रूपांतरित कर देगे | अंत में अपनी सारी एकाग्रता को संग्रहित कर मिर्ज़ा ग़ालिब की ये गज़ल गुनगुना लीजिये –
दिल ए नादाँ तुझे हुआ क्या है 
आखिर इस मर्ज़ की दवा क्या है ||
हम है मुश्ताक और वो बे ज़ार 
या इलाही ये माजरा क्या है ||
मै भी मुंह में ज़बान रखता हूँ 
काश पूछो के मुद्दुआ क्या है ||
जब कि तुझ बिन नही कोई मौजूद 
फिर ये हंगामा ए खुदा क्या है ||
ये परी चेहरा लोग कैसे है 
गम्ज़ा ओ इश्वा ओ अदा क्या है ||
शिकन ए ज़ुल्फ़ ए अंबरी क्यू है 
निगह ए चश्म ए सुरमा सा क्या है ||
सब्ज़ा ओ गुल कहाँ से आए है 
अब्र क्या चीज़ है हवा क्या है ||
हम को उन से वफा की है उम्मीद 
जो नही जानते वफा क्या है ||
हो भला कर तेरा भला होगा 
और दरवेश की दुआ क्या है ||
मैंने माना की कुछ नही ग़ालिब 
मुफ्त हाथ आए तो बुरा क्या है ||
         
 
 
 
 

- अख़तर अली

रचनाकार परिचय
अख़तर अली

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