महिला ग़ज़ल अंक
अंक - 40 | कुल अंक - 61
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

ग़ज़ल-गाँव

ग़ज़ल-

पूछ बैठी राह भी उकता के आख़िर
और कितना चलना है तुझको मुसाफ़िर

सिर्फ़ इतना ही कहा घर काँच का है
लोग पत्थर आज़माने चल पड़े फिर

आज फिर पर्दे लगाकर सो गया वो
चाँद अब खिड़की पे जाए किसकी ख़ातिर

भूल से भी नाम गर आता लबों पर
उसकी इक आवाज़ पर था क़ल्ब हाज़िर

क़त्ल भी मेरा हुआ क़ातिल भी मैं थी
इश्क़ था मेरा ग़ज़ब का यार शातिर

शाम से पहले तो क्या उतरेगा सूरज
रात ने अपनी ज़रूरत कर दी ज़ाहिर

साँप भी मर जाए लाठी भी न टूटे
है सिवा मेरे सभी इस फ़न में माहिर


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ग़ज़ल-

ऊँची लहरों से भी तो नाव पलट जाती है
भागती ज़िंदगी लम्हों में सिमट जाती है

जब भी मंज़िल के बहुत पास पहुँच जाती हूँ
ठीक उस वक्त नज़र राह से हट जाती है

आख़िरी दाँव भी हो जाता मेरे हक़ में मगर
मेरी तहरीर से हर चाल उलट जाती है

ज़ीस्त के तौर तरीक़ों की ख़बर होने तक
इक पसोपेश में ये उम्र ही कट जाती है

राहे-उल्फ़त में ज़रूरी है संभल कर चलना
बेख़बर पाँव से तन्हाई लिपट जाती है

बाद बारिश के भी हालात कहाँ संभलेंगे
धूप भी अपने कई हिस्सों में बट जाती है

हद में रहकर ज़रा देखा करो ख़्वाबों को 'सुमन'
लज़्ज़ते-इश्क़ मुलाक़ात से घट जाती है


- चित्रा भारद्वाज सुमन

रचनाकार परिचय
चित्रा भारद्वाज सुमन

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ग़ज़ल-गाँव (1)