जनवरी 2018
अंक - 34 | कुल अंक - 58
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

उभरते-स्वर

मैं नहीं हूँ अबला नारी

मैं नहीं मानती स्वयं को अबला
हाय! ग़मों की मारी
मैं नहीं कोई बेचारी
मैं तो हूँ ममत्व और स्नेह की
शक्तियों से भरपूर
इक सशक्त नारी

सतरंगी घोड़ों पर रहती हरदम सवार
मेरे स्वप्नों की फुलवारी
जीवन के हर क्षेत्र में जीती मैं
बस प्रेम के शब्दों के आगे मैं हारी
मैं तो हूँ ममत्व और स्नेह की
शक्तियों से भरपूर
इक सशक्त नारी

अष्ट भुजाएं हैं मेरी माँ दुर्गा जैसी
उजागर होती हैं मात्र दो
असीम क्षमताओं से कर लेती हूँ
प्रबंधन मैं हर शय का तभी तो
परिवार मेरा निश्चिन्त होकर जाता है सो
नकारात्मकता को प्रवाहित कर देती है
मेरे अश्रुओं की धार सारी
मैं तो हूँ ममत्व और स्नेह की
शक्तियों  से भरपूर
इक सशक्त नारी

कैसे मान लेती हो तुम, स्वयं को कमज़ोर
जबकि ईश्वर ने सृष्टि-रचना की सौंपी तुम्हें डोर
सह लेती हो इतना दर्द जिसका नहीं है कोई छोर
माँ हो तुम! जिसे माने दुनिया जन्नत संसार की सारी
मैं तो हूँ ममत्व और स्नेह की
शक्तियों से भरपूर
इक सशक्त नारी


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तुम बड़ा काम करती हो

तब सिर्फ पढ़ने का ही काम था
वैसे सारा दिन आराम था
स्कूल से घर, घर से स्कूल, शाम को खेलना
रविवार को जाना बाजार था
मन में मात्र पुस्तकों का ही अंबार था
माँ तब भी कहती थी मुझको
तुम बहुत मेहनत करती हो
थोड़ा खा लो, सुस्ता लो
ज़िद कर-करके परेशान करती हो

आज सबसे पहले उठती हूँ
बच्चों को स्कूल, पतिदेव को ऑफिस
हर रोज़ ख़ुश होकर विदा मैं करती हूँ
सुबह का नाश्ता, दोपहर के लंच की
कश्मकश से रात-दिन मैं गुजरती हूँ
फिर अपने कार्यालय की ओर
दौड़ की जुगत लगाती हूँ
सुबह नौ से साढ़े पॉंच ऑफिस में
काम की कैद में फँस जाती हूँ
ऑफिस की हाजिरी पंचिग मशीन पर लगाकर
अपनी बैचेन अंगुली का निशान
भाग-भाग कर रिक्शा में चढ़ जाती हूँ

पर बहुत ताज्जुब है मुझे
आज कोई नहीं कहता मुझे
तुम बड़ा काम करती हो, थोड़ा आराम कर लो
कुछ खा लो
इतनी क्यों ज़िद करती हो

अभी तो शाम के छ: ही बजे हैं
असली संघर्ष तो अब शुरु होगा दोस्तो
घर में अभी कितने खलेरे पड़े हैं
वो बिस्तर पर लेटे हुए मुचड़े हुए कपड़े
वो नाक चिढ़ाती हुई मुझको, बिखरी हुई किचन
मेरे रास्ते में अचानक ही आते हुए जूते
प्यारे दुलारों की मुझको बुलाती हुई कॉपियाँ
हैल्प कर दो मम्मी मेरी, बच्चों की किलकारियाँ
सब्जियाँ भी मुझे देख कर इतरा रही हैं
हमें भी बना लो अब, ये आवाजें आ रही हैं
सुपरमॉम का मुझको नहीं चाहिए कोई तमगा
इंसान ही समझ लो बस इतनी ही है इल्तिजा
नहीं चाहिए मुझको कोई ईनाम अपने काम का
बस शब्दों की खुराक है, मेरी थकावट के उपचार का
बस कभी तो कोई मुझको भी कह दे
तुम बड़ा काम करती हो, थोड़ा आराम कर लो
कुछ खा लो
इतनी क्यों ज़िद करती हो

ये नौकरी मेरी कोई शौक की चीज़ नहीं अब
मुझ पर कई निर्भर हैं
मात्र मेरी आर्थिक-आत्मनिर्भरता की बात नहीं है अब
तो आस-पास नजदीकी परिवेश में जो साथ-साथ रहते हैं
जिनकी फिक्रों में मेरे दिलो-दिमाग में यूँ ख्वाब से बनते रहते हैं
तुम्हारा थोड़ा तो पूछना बनता है मुझसे
चाहे किसी त्रैमासिक पत्रिका में
छपने वाले किसी लेख की ही तरह
तुम बड़ा काम करती हो, थोड़ा आराम कर लो
कुछ खा लो
इतनी क्यों ज़िद करती हो


- मीनाक्षी भसीन

रचनाकार परिचय
मीनाक्षी भसीन

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उभरते स्वर (1)