बीते दिनों गुरु घासीदास विश्वविद्यालय में आयोजित एक साहित्यिक कार्यक्रम से जुड़ी घटना बहुत चर्चित रही जिसमें हिन्दी के वरिष्ठ कथाकार (आमंत्रित) को सार्वजनिक रूप से अपमानजनक व्यवहार का सामना करना पड़ा। उन्हें कार्यक्रम से बाहर जाने को भी कहा गया। निश्चित रूप से यह केवल एक व्यक्ति विशेष के साथ किया गया दुर्व्यवहार नहीं है बल्कि यह घटना साहित्य, विश्वविद्यालयी संस्कृति और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तीनों के लिए एक गंभीर चेतावनी के रूप में सामने आती है। अतः इसे किसी क्षणिक “प्रबंधनात्मक चूक” या “अनजाने में हुई भूल” कहकर टाल देना न तो तार्किक है, न ही नैतिक।
विश्वविद्यालय ज्ञान के वे स्थल होते हैं जहाँ विचारों की बहुलता, असहमति और प्रश्न पूछने की स्वतंत्रता को संरक्षित किया जाता है। साहित्यिक...


















