वर्तमान समय न केवल घटनाओं का, बल्कि प्रतिक्रियाओं का इतिहास भी लिख रहा है और दुर्भाग्य से मौन हमारी सबसे स्थायी प्रतिक्रिया बनता जा रहा है। कहने को तो चारों ओर सूचनाओं का अंबार है, टीवी पर बहसों का शोर है, सोशल मीडिया में करोड़ों लोगों की डिजिटल सक्रियता का भ्रम है; लेकिन इन सबके मध्य कहीं एक गहरी उदासीनता भी पसरी हुई है। क्या हम एक मृत समाज का हिस्सा बनते जा रहे हैं?
परिदृश्य में दो समानांतर धाराएं चल रही हैं। एक ओर सोनम वांगचुक सरीखे लोग हैं जो शांतिपूर्ण आग्रहों और अनशन के माध्यम से व्यवस्था से संवाद की कोशिश कर रहे हैं। दूसरी ओर देश में हत्या, आगजनी, दुष्कर्म, हिंसा जैसे बढ़ते जघन्य अपराध हैं; जो हमारी सामाजिक संरचना को भीतर से खोखला करते जा रहे हैं। इन दोनों ही परस्पर विपरीत स्थितिय...


















