भारतीय समाज की संरचना में स्त्री की उपस्थिति उतनी ही प्राचीन है जितनी स्वयं सभ्यता। किंतु विडंबना यह रही कि इतिहास, परंपरा और संस्कृति के अनेक आख्यानों में उसकी भूमिका प्रायः सीमित या परिभाषित रूपों में ही दिखाई देती रही। आधुनिक काल में जब ‘स्त्री विमर्श’ एक सशक्त बौद्धिक धारा के रूप में सामने आया, तब उसने इस परंपरा को प्रश्नांकित किया। उसने यह पूछा कि स्त्री केवल कथा का पात्र क्यों रहे, वह कथा की रचयिता क्यों नहीं हो सकती? उसने यह भी कहा कि स्त्री की स्वतंत्रता केवल सामाजिक अनुग्रह नहीं, बल्कि उसका स्वाभाविक अधिकार है। परंतु इसी बिंदु पर एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है कि आज का स्त्री विमर्श केवल पुस्तकों, सेमिनारों और अकादमिक चर्चाओं तक सीमित है, या वह वास्तव में समाज की भीतरी तहों तक पहुँ...


















