अगस्त 2017
अंक - 29 | कुल अंक - 53
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कहानी

कहानी- कब्र का अजाब


"नहीं, मदरसे में रूही नहीं जायेगी।"
"पर क्यों अम्मी?"
"कहा ना अब वो नहीं जायेगी मदरसे में बस..!
"तो क्या रूही आपा अपना कुरआन पूरा नहीं कर पाएंगी?"
"मैंने यह तो नहीं कहा कि रूही अपना कुरआन पूरा नहीं करेगी। मैंने तो इतना ही कहा कि वो अब मदरसे में पढ़ने नहीं जायेगी।"
"पर ऐसा क्या हो गया?" ज़ोया ने सवालिया नज़रों से अम्मी को देखते हुए कहा।
"अभी तुम छोटी हो। रूही आपा बड़ी हो गयी है, बड़ी लड़कियाँ मदरसे में पढ़ने नहीं जाया करतीं।" अम्मी जोया को समझाती हुई बोलीं।
"तो क्या अम्मी, जब हम बड़े होंगे, हम भी मदरसे में पढ़ने नहीं जायेंगे।" ज़ोया ने ख़ुशी ज़ाहिर करते हुए सवाल किया।
"हाँ, वो पाँच नम्बर गली वाली नसरीन आपा हैं ना, उन्हीं के यहाँ जाना, कल से रूही वहीं जाया करेगी और घर के कुछ काम भी सीखेगी।" अम्मी ने ज़ोया के सवालों का जवाब दिया।
अब अम्मी ज़ोया को क्या समझाती कि एक ख़ास उम्र के बाद लड़कियों में जिस्मानी बदलाव होता है जिसकी वजह से लड़कियाँ मस्जिद-मदरसों में नहीं जाया करतीं। औरतें तो वैसे भी नापाक होती हैं और नापाक चीज़ ख़ुदा को भी पसंद नहीं। वो तो फिर भी ख़ुदा का घर होता है। अम्मी इसी उधेड़बुन में नमाज की तैयारी करने जा रही थी।


रूही ख़ुश थी कि अब उसे मदरसे में जाना नहीं होगा। उसे भी अपने जिस्मानी बदलाव की वजह से शर्म और झिझक महसूस होने लगी थी। मौलाना के सामने जाते उसे बहुत शर्म आती थी। वो भी सोच रही थी कि नसरीन आपा के यहाँ है ही कौन? उनके मियां अक्सर बाहर ही रहते हैं काम के सिलसिले में और लड़का भी साथ ही चला जाता है। आपा पढ़ी-लिखी और ज़हीन हैं, यही सोचते-सोचते रूही आपा के घर पहुंच जाती है। सलाम दुआ होती है।
"कहाँ तक पढ़ा है कुरआन?" नसरीन आपा पूछती हैं।
"जी अभी कुरआन लगा ही है।" रूही जवाब देती है।
"ठीक है, अभी पढ़ो, एक घंटे बाद पिछला कहीं से भी सुनेंगे।" नसरीन आपा सबक देकर चली जाती हैं। नसरीन आपा के यहाँ पाँच-छः लड़कियाँ और आती थीं जो कि रूही से बड़ी थीं। वो उन्हीं के साथ बैठ पढ़ने लगी।
वैसे आपा बहुत ही पर्दानशीं थीं। ज़रा भी सिर से दुपट्टा ढलकने नहीं देती थीं। ना तो अपना और ना ही पढ़ने वाली लड़कियों का। उनका कहना था कि सिर से दुपट्टा उतरते ही शैतान सवार हो जाता है।


एक दिन रूही ने देखा कि आपा के भाई आये हुए हैं। सब उन्हें मामू कह रहे थे। मामू उसी कमरे में बैठते थे, जहाँ लड़कियाँ पढाई करती थीं। वो भी क्या करें कमरा भी तो एक ही था। हाँ, आपा तो सबक देकर दुकान पर बैठ जाया करती थी, जो बाहर दरवाज़े पर थी।
रूही ने देखा कि मामू सब लड़कियों से कह रहे थे कि आओ हमें अपना सबक सुनाओ।
सब हंस कर कमरे से बाहर आ जातीं। बाहर धूप में ही तो सब पढ़ रहे थे। पर उनके हंसने की वजह रूही को समझ नहीं आई।
उन्होंने रूही से कहा, "तुम सुनाओ अपना सबक।"
सब हंस रही थीं। रूही चली गयी। उन्होंने थोड़ा सबक सुनने के बाद कहा, ठीक से याद करके फिर सुनाओ ऑके।"
अगली बार रूही से फिर से गयी। जैसे ही रूही गयी और सुनाने बैठी तो मामू ने रूही को छूने की कोशिश की। और दो दिन ऐसे जगह हाथ लगाया कि रूही झिझक गयी। उस चीज़ को याद करके रूही तो काँप ही गयी। छुट्टी होने पर घर वापस आ गयी। लेकिन रह-रह के उसे सब याद आ रहा था, जिससे उसे घिन पैदा हो रही थी।


"रूही, रूही, जाओ पढ़ने जाओ।" रूही की अम्मी उसे आवाज़ दे रही थीं।
"नहीं अम्मी, हम नहीं जायेंगे।"
"क्यों नहीं जाओगी? कुरआन भी तो पूरा करना है। कुरआन पूरा ना किया तो पता हम पर कितना अजाब होगा।" अम्मी उसे समझा रही थीं।
रूही को उस गुनाह की फ़िक्र नहीं थी। लेकिन जो गुनाह उसके साथ हुआ उसकी उसे फ़िक्र थी। पर यह बात वह बताये तो किसे बताये।
"अब कोई भी तो नहीं है जिसे मैं बताऊं. किससे पूंछू? मरजाना मरता भी नहीं है वो मामू!" रूही बुदबुदा रही थी।
"अब क्या बुदबुदा रही है?" अम्मी ने सवाल किया।
"कुछ नहीं अम्मी।"
"तो जाओ तैयार होकर नसरीन आपा के यहाँ पढ़ने।" अम्मी ने डाँटते हुए कहा।


किसी और चीज़ का खौफ़ हो या न हो लेकिन ख़ुदा का खौफ़ था अम्मी को। यही तो सीखा था अम्मी ने बचपन से। उनका कहना था कि कुरआन की तिलावत करना बहुत ज़रुरी है। घर में किसी एक के पढ़ लेने भर से उसके खानदान की सात पुश्तों के गुनाह माफ़ होते हैं। अब अगर पढ़ाई न की तो मरने के बाद कब्र में बहुत अजाब होगा और दोज़ख में तो उल्टा लटकाया जाएगा। माँ-बाप की नाफ़रमानियाँ करने पर कोड़े मारे जायेंगे और भी न जाने क्या-क्या!! रूही की तो यह सब सुनकर रूह काँप जाती थी। इसी सोच में रूही आपा के घर पहुँच जाती है।

"शुक्र है कि आज मामू नहीं है।" रूही बुदबुदाई।
आज कई लड़कियाँ छुट्टी पर थीं। तो रूही ने हीना से पूछा, "क्यों हीना आज मामू नहीं है?"
"अच्छा है, जो नहीं है। बहुत दिक्कत होती है उसके होने पर। कमबख्त आ जाता है।" हीना गुस्से में बोली।
"क्यों क्या हुआ?" रूही ने कुरेदने की कोशिश की।
"आपा से मत बताना, नहीं तो डांट लगेगी। अरे वो आदमी तो बहुत ही ख़राब है। बहुत ही बेहूदा हरकतें करता है। किसी से बताना नहीं। न घर, न आपा से। हीना ने गुपचुप तरीके से कहा।
बातों ही बातों में रूही को पता चला कि इन पर्दानशीं घरों में सब बेपर्दा होता है। वो अक्सर लड़कियों से अजीब हरकतें किया करते थे। जिनका पता आपा को न चलता था।
"तो चलो आपा से कहते हैं।" रूही ने कहा।
"आपा से कहोगी तो हमारी डांट पड़ेगी। उनके घर की इज़्ज़त का मामला है।" हीना समझाते हुए बोली।
"हाँ, घर में भी नहीं कह सकते। क्या बतायेंगे, कैसे बतायेंगे?" रूही थोड़ा घबराते हुए से बोली।
"पता है एक दिन तो उन्होंने मेरा जारबंद तक खोल दिया था। वो तो किसी तरह मैं भागी।" हीना ने रूही को बताया।
"तुमने आपा से शिकायत नहीं की..?" रूही बोली।
"कहा था एक बार जैनब ने। आपा कह रही थी हमारी इज़्ज़त है इस मोहल्ले में। तुम हमारे भाई पर इल्ज़ाम लगाकर हमें बदनाम करना चाहती हो। हम तुम्हें बदनाम कर देंगे। ख़बरदार! कल से जो यहाँ आयीं।" हिना रूही को बता रही थी।
"तो क्या अगले दिन जैनब आई?"
"नहीं, आपा ने बाकी लड़कियों को बताया कि जैनब बहुत ही बदतमीज़ लड़की थी। बड़ों से ज़ुबान लड़ाती है। ऐसी बदतमीज़ लड़कियों को मैं नहीं पढ़ाती।" हीना बोली।


अगले दिन आपा दूसरी लड़कियों से बोली, "हीना और रूही बहुत ही बदतमीज़ और बेहया लड़कियां थीं। वो बड़ों से ज़ुबान लड़ाती थीं। ऐसे बदतमीज़ बच्चों को मैं नहीं पढ़ाती। हमारी भी मोहल्ले में इज़्ज़त है कि नहीं! अब कोई ऐसा करेगा तो यहाँ मत आना।"

हीना, रूही और जैनब तो वहाँ से बच निकलीं। लेकिन कब्र के अजाब का डर बाकी लड़कियों की दिमाग में अभी भी था।


- आरिफा एविस

रचनाकार परिचय
आरिफा एविस

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