प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
जून 2017
अंक -52

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

आलेख

कृष्ण काव्य परम्परा का विकास- विविध कालों के संदर्भ में: डाॅ. शालिनी चतुर्वेदी


कृष्ण काव्य परम्परा के विकास का प्रमुख श्रेय आचार्य वल्लभ और उनके पुत्र विठ्ठलदास जी को जाता है। आचार्य वल्लभ द्वारा पृवर्तित ‘पुष्टि मार्ग’ को आधार बनाकर श्री विठ्ठलदास द्वारा स्थापित अष्टछाप के कवियों ने हिन्दी में अमर कृष्ण भक्ति काव्य की पुष्टिमार्ग की अनुभूतिमूलक साधना के कारण इन कवियों ने कृष्ण के व्यक्तित्व में शक्ति के साथ माधुर्य और प्रेम का समन्वय कर दिया। अलौकिक आलम्बन में सहन और मधुर मानव का आरोपण उन्होनें जिस मनोवैज्ञानिक कौषल से किया है उसमें सार्वभौम उपादनों का समावेष हुआ है। सूरदास प्रधान रूप से वात्सल्य और श्रृंगार रस के कवि हैं परमानन्ददास जी के काव्य में वात्सल्य का अनुपात महत्वपूर्ण हैं। अन्य कवियों की रचनाओं में श्रृंगार रस ही प्राधान्य है उसमंे वात्सल्य या तो है ही नहीं या अत्यन्त गौणरूप में प्रयुक्त है। इन सभी के प्रतिपाध में साहित्यिकता, पार्थिव अनुभूतियों और आध्यात्मिकता का सुंदर सामंजय मिलता है। विभिन्न कवियों के वयक्तित्व के अनुसार तीनों तत्वों का अनुपात उनकी, रचनाओं से भिन्न है। साहित्यिक महत्व की दृष्टि से सूरदास के बाद नन्ददास का नाम आता है।


पूर्व मध्यकाल के इन पुष्टिमार्गी कवियों के बाद परिमाण और गुण दोनों ही दृष्टियों से महत्वपूर्ण योगदान राधावल्लभ सम्प्रदाय के आचार्य हितहरिवंष तथा उनके षिष्यों और अनुयायियों ने दिया। राधावल्लभ सम्प्रदाय की उपासना पद्धति अन्य सम्प्रदायों से भिन्न थी। इस मत के सिद्धांतों के अनुसार राधा ही परम इष्ट है तथा कृष्ण की मान्यता इसलिये है कि वे राधा के प्रियतम हैं वे इष्ट नहीं है भक्तजन राधा की सखी रूप मंे होते हैं। वे सखी के रूप में उनके साथ परकीया गोपियों के समान स्वतंत्र रूप से संबंध स्थापित नहीं करते और न राधा के प्रति उनको सपत्नी भाव होता है। इस सम्प्रदाय में हितहरिवंष के अतिरिक्त ध्रवदास की कला का महत्वपूर्ण स्थान है।
किसी विषिष्ट सम्प्रदाय के बंधनों से मुक्त मतवाली मीरा और रसखान की रचनाओं का भी पूर्व मध्यकालीन कृष्ण भक्ति साहित्य मंे बड़ा महत्व है। मीराबाई द्वारा रचित गं्रथ व काव्य की सबसे बड़ी सफलता यही है कि, भावनाओं की निर्बाधता में असंयत और अनियन्त्रित श्रृंगार की स्थूलताओं का समावेष नहीं होने पाया है। उनकी कला का अपूर्व ही सौन्दर्य है जो कला संबंधी परिपक्वताओं से वंचित रहने पर भी पूर्ण है। उनके काव्य में गिरधरगोपाल के प्रति उनकी आकुल भावनायें निर्बाध रूप से व्यक्त हुई है।


मुसलमान कृष्ण भक्त कवि रसखान का नाम इस परम्परा में अमर है। उनके व्यक्तित्व में प्रधान प्रेम तत्व ने लौकिक आलम्बन के अस्थायित्व के कारण अलौकिक कृष्ण का सहारा लिया और उनकी भावनाऐं भक्त हृदय के सुन्दर उद्गारों के रूप में व्यक्त हो उठीं। भावनाओं की तीव्रता और उत्कृष्टता के साथ ही उनके काव्य का कलापक्ष भी प्रौढ़ और सबल है। ‘प्रेम वाटिका’ तथा ‘सुजान रस सागर’ उनके दो छोटे-छोटे ग्रंथ प्रकाषित हुये है।
उत्तर मध्यकाल में भी कृष्ण-काव्य-परम्परा विभिन्न सम्प्रदायों के संरक्षण में पल्लवित और पुष्पित होती रहीं। पूर्व मध्यकाल में कृष्ण भक्ति पद्धति में नैसर्गिक आलम्बन के प्रति मानवीय भावनाओं का जो उन्नयन हुआ उसमें हुआ उसमें राग और साधना का अपूर्व सामजस्य था। इस परम्परा में राजतंत्र के कारण ही 26 वीं सदी तक आते आते भक्ति युग की परिष्कृत माधुर्य भावना लौकिकता में रचित होने लगी। उत्तर मध्यकालीन कृष्ण-काव्य परम्परा में आलम्बन और साधना दोनों पक्षों में आपार्थिव अंश केवल नाममात्र को ही शेष रह गया।

रीतिकालीन कृष्ण भक्ति काव्य में श्रृंगारिक तत्वों का इतना प्राधान्य हो गया कि उनके फलस्वरूप ब्रह्म की असीमता भी मानवीय क्रिया कलापों में लिपट कर रह गई। विविध रूपों का आरोपण किया गया। हिन्दी काव्य-जगत में सत्रहवीं शताब्दी के उपरान्त कृष्ण और गोपिकाओं के नाम पर श्रृंगारपूरक ऐहिक भावनाओं की अभिव्यक्ति प्रधान हो उठी।

 

उत्तर मध्यकाल में वल्लभ सम्प्रदाय का कोई उल्लेखनीय कवि नहीं हुआ। केवल ब्रजवासी दास ने सूरसागर के आधार पर अपने गं्रथ ‘ब्रज विलास’ की रचना की राधावल्लभ सम्प्रदाय के हित वृन्दावनदास ने ‘लाड़-सागर’ और ‘ब्रजप्रेमानंद सागर’ ग्रन्थों की रचना की। इसके अतिरिक्त निम्बार्क सम्प्रदाय के धनानन्द, नागरीदास, हठीजी, भगवत रसिकजी, रूपरसिक जी, सहचरिषरण ने कृष्ण भक्ति संबंधी रचनायें लिखी जिसमें उसे युग की काव्य रचना की समस्त विषेषताओं का समावेष हो गया है।
आधुनिक काल नये संदेषों और नये जीवन दर्षन से युक्त सामने आया मध्यकालीन सामन्तीय व्यवस्था बीत चुकी थी। बौद्धिक जागरण और विज्ञान के रस युग में धार्मिकता और विषेषकर उपास्थ के प्रति रागात्मक वृत्ति के उन्नयन को अंधविष्वास और रूढिवादिता का नाम दिया गया। उत्तर मध्यकाल में कृष्ण भक्ति में निहित श्रंृगार-तत्व ने लौकिक श्रृंगार का रूप धारण कर लिया था। आधुनिक काल में केवल उसका अंधकार पक्ष ही अवषिष्ट रह गया। भक्ति के नाम पर भ्रष्टचार, अंधविष्वास और पाखण्ड ने तत्कालीन सुधारवादी और बौद्धिक प्रवृत्तियांे को अपने विरूद्ध आवाज उठाने की चुनौती दी। सूक्ष्म रागात्मक वृत्तियों पर आश्रित भक्ति बौद्धिक और ऐहिक जीवन दर्षन के भार के नीचे बद गई, उसकी विकृति ही शेष रही गई। पुनरूत्थान के विभिन्न आंदोलनों के कारण जिन नैतिक और बौद्धिक मान्यताओं की स्थापना हुई उनकी प्रबलता में अवतारवाद, बहुदेवनाद आदि सिद्धांतों का खण्डन तो हुआ ही भारतीय युग नायकों ओर महानायकों के व्यक्तित्व के उन अंशों की भी आलोचना हुई जो नये जीवनादर्ष के मापदण्ड पर खरे न उतरते थे। फलस्वरूप भारतीय संस्कृति के उदान्त और महान दृढ़ स्तम्भ भी युगत क प्रबल प्रहारों से हिल उठे। ऐसी स्थिति में कृष्ण भक्ति को संरक्षण कहाँ प्राप्त हो सकता था जिसकी माधुर्योपासन के नाम पर मंदिरों में यौवन और विलास का दौर चलता रहता था तथा रंगीले नवाबजादे ‘कन्हैया’ बनने की साध रखते थे। विलास की प्रतिक्रिया नैतिकता में हुई और तर्क तथा बुद्धि की कसौटी पर कसकर कृष्ण, उनकी लीलाओं तथा उनके प्रति भक्ति की धज्जियाँ उड़ाई जाने लगी। राजनीतिक परानव के साथ ही साथ संास्कृतिक परतंत्रता की बेडि़याँ भी जनता के मन और मस्तिष्क का कसने लगी थी। पाष्चात्य सभ्यता के नये चष्में में से देखने वाले व्यक्तियों को भारतीय संस्कृति के सभी तत्वों में रूढि़वादिता और अंधविष्वास की विकृत्तियाँ ही दृष्टिगोचर होती थीं। उस युग के स्रष्टा और दृष्टा कलाकार ने सब देखा और समझा, सांस्कृतिक बेडि़यों को तोड़ डालने के लिये उसकी लेखनी मुखर हुई और उसने इन सभी अवांछनीय तत्वों के निराकरण का बीड़ा उठाया। राम, कृष्ण, सीता, राधा इत्यादि के व्यक्तित्वों की नये रूप में प्रतिष्ठा हुई जिसमें प्राकृत औा उदात्त तत्वों का प्राधान्य था।  कृष्ण और राम भगवान के पद से उतरकर महामानव के पद प्रतिष्ठित हुये। भक्ति का परम्परागत रूप प्रायः समाप्त हो गया। व्यैक्तिक संस्कारों के फलस्वरूप ही भक्ति समप्रदायों के चिन्ह शेष रह गये।


भारतेन्दु हरिषचन्द्र की कृष्ण भक्ति संबंधी रचनाओं पर रीतिकाल का प्रभाव कम, भक्तिका का प्रभाव अधिक है। यह तथ्य स्मरणीय है भारतेन्दु उस अर्थ में भक्त कवि नहीं थे जिस रूप में सूरदास तथा अन्य भक्त कवि थे। बौद्धिक युवा के चेता कलाकार के रूप में उन्होनें अपने दायित्व काा निर्वाह जिस रूप में किया उससे यह स्पष्ट है कि ‘भक्त’ उनके व्यक्ति को केवल एक अंष मात्र था माधुर्य साधना की परिष्कृति और सूक्ष्मता की पुनः स्थापना का अंतिम प्रयास उनकी रचनाओं में मिलता है। भक्त स्र्वस्व, प्रेम सरोवर, प्रेममालिका, प्रेम माधुरी, प्रेम तंरग इत्यादि में अनुभूति तत्व का प्राधान्य है। कार्तिक स्नान, वैशाख महामात्य आदि में उनका दृष्टिकोण साम्प्रदायिक और व्याख्यात्मक है। चमत्कारपूर्ण तमाषे भी भारतेन्दु जी ने किये हैं लेकिन वे कृष्ण भक्ति काव्य के अंतर्गत नहीं आते हैं। केवल एक प्रसंग मानलीला फूल बूझोवल में ये पूर्ण चमत्कारिक दृष्टिकोण मिलता है जिसके इक्तीस दोहों में किसी न किसी फूल के नाम का उल्लेख हुआ है। रत्नाकार व सत्यनारायण ‘कविरत्न’ ने आख्यात्मक काव्य लिखा है वियोगी हरि जी की रचनाओं में प्रेमजन्य भावातिरेको तो है लेकिन वे बुद्धियुग से प्रभावित थे।
अतः स्पष्ट है कि कृष्ण भक्ति साहित्य व काव्य का इतिहास लगभग साढ़े तीन वर्षों पुराना है विविध कालों में उसके स्वरूप में अनेकानेक परिवर्तन आए है  परन्तु आष्चर्य की बात हे कि इसके प्रवर्तन वे समापन दोनों का ही श्रेय मुख्यरूप से वल्लभाचार्य के ‘पुष्टिमार्ग’ में दीक्षित महानुभावों सूरदास तथा भारतेन्दु हरिषचन्द्र को दिया जाता है।



सन्दर्भ-

  ब्रज भाषा साहित्य का इतिहास- डाॅ. सत्येन्द्र, पृष्ठ 1
  ब्रज भाषा साहित्य कौ इतिहास, डाॅ. प्रभुदयाल मीतल, पृष्ठ 30-42
  वल्लभकुल की बलिहारी- मोहनलाल मधुकर, पृष्ठ 9-12


- डाॅ. शालिनी चतुर्वेदी
 
रचनाकार परिचय
डाॅ. शालिनी चतुर्वेदी

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