जून 2017
अंक - 27 | कुल अंक - 55
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

आलेख

भक्तिकाल की उपलब्धियाँ: डाॅ. ऋतु वार्ष्णेय गुप्ता


मध्य युगीन हिन्दी साहित्य का पूर्ण मध्य युग भक्तिकाल के नाम से अभिहित किया जाता है। इस भक्तिकालीन साहित्य की आत्मा भक्ति है इसका जीवन स्रोत रस है और इस रस का लक्ष्य सर्वोच्च मानवतावाद की प्रतिष्ठा है। तत्कालीन जन-जीवन समस्त विषाद, नैराश्य तथा कुंठाओं का विगलन इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि है। सदियों पूर्व इस साहित्य में चर्चित समन्वयवादिता भावनात्मक एकता व सांस्कृतिक अभिन्नता अनुकरणीय है। अनुभूतियों की गहनता और उसके निश्छल प्रकाशन तथा भव प्रवणता की दृष्टि भक्तिकालीन साहित्य अत्यंत उत्कृष्ट है। काव्यादर्श विषय वस्तु से उत्कर्ष, काव्य सौष्ठव रूप व शिल्प विधान के प्रकर्ष भारतीय सभ्यता और संस्कृति के स्पष्ट प्रतिफलन तथा श्रेय एवं प्रेय सब दृष्टि से यह साहित्य सर्वोत्तम बन पड़ा है। निर्गुण और सगुण धाराओं में प्रवाहित भक्ति काव्य ने इस काल के साहित्य को भारती के भाल का गौरव बना दिया है।


निर्गुण संत काव्य -
संत कवियों ने एकेश्वरवाद में आस्था व्यक्त करते हुए निर्गुण ब्रह्म की भक्ति का संदेश दिया। संतों ने अनेक सम्प्रदायों- सिद्धों, नाथों, सूफियों तथा अद्वैतवाद, वैष्णवों के प्रभावों को आत्मसातकर निराकार भक्ति का एक समन्वित रूप प्रस्तुत किया तथा जन भाषा में धर्म-साधना के मर्म को व्यक्त किया। सामाजिक स्तर पर संतों ने पाखण्ड एवं अंधविश्वास का पूरी दृढ़ता के साथ खण्डन किया। मिथ्या आडम्बरों के प्रति जैसी अनास्था इन संत कवियों ने व्यक्त की वैसी न तो पहले कभी कोई समाज सुधारक कर सका था और न परवर्ती युग में ही किसी का वैसा साहस हुआ। इन कवियों ने तत्कालीन समाज में एक प्रकार की वैचारिक क्रांति को जन्म दिया। जिसका उच्च तथा निम्न समाज के सभी वर्गों पर व्यापक प्रभाव पड़ा। जाति-पाति का विरोध, अर्धशून्य परम्पराओं, रूढि़यों और आडम्बरों का खण्डन, मानव मात्र की समानता तथा एकता आदि इनकी मान्यताएँ थी। इस प्रकार हिन्दी भाषा-भाषी प्रदेश में सामाजिक धार्मिक कुरीतियों के विरुद्ध यह पहला नवजागरण था, जिसके नायक थे कबीर। संत साधना वैयक्तिक और आध्यात्मिक होते हुए भी समष्टिपरक है। प्रवृत्ति और निवृत्ति दोनों पर समाज बल देते हुए संतों ने एक आदर्श जीवन दृष्टि प्रस्तुत की। धर्म, दर्शन, साधना तथा चरित्र निर्माण के लिए संतों के पास अपनी निजी संदेश और आदर्श है। धर्म के क्षेत्र मंे संकीर्णता के विरोधी थे, दर्शन के क्षेत्र में अद्वैत दृष्टि एकेश्वर वाद के समर्थक थे। भक्ति साधना के क्षेत्र में ये प्रेममूलक कर्मकाण्ड रहित सहज साधना में विश्वास रखते थे और चरित्र निर्माण के लिए आचरित सत्य को जीवन निर्माण की कसौटी मानते हैं।
संतों के पास एक स्वस्थ समन्वय दृष्टि थी। संतों ने जिस रूप में अपने विचार व्यक्त किए है उनका आधार कोई एक विचारधारा या मतवाद नहीं है। अद्वैतवाद, वैष्णवों की भक्ति भावना सिद्धों-नाथों की सहज साधना आदि का जिस रूप में उन्होंने समन्वय किया वह सर्वजन सुलभ और सामाजिक स्तर पर सर्वजन ग्रहण थी। इन संत कवियों की आत्मानुभवयमयी-सत्यव्रती दृढ़वाणी ने मानव को रूढ़ शास्त्र परम्पराओं से मुक्त किया तथा सहज साधन की प्रतिष्ठा की।


यद्यपि संत कवियों ने कवि कर्म का कही विधिवत अध्ययन नहीं किया था, परन्तु उनकी काव्य गगरी में जीवन के अनुभूत सत्यों का जो अमित रस एकत्रित हुआ वह काव्यात्मक दृष्टि से नितांत सराहनीय है। उदात्त अनुभूति की सरल एवं सहृदय स्पर्शी अभिव्यक्ति इस काव्य की अनन्य विशेषता है। तथा अधिकाधिक लोकप्रियता उनकी निश्लंकृत सहजवाणी की काव्यात्मकता का उज्ज्वल प्रमाण है।
‘साई के सब जीव’ का उद्घोष करने वाली संतों की धर्मनिरपेक्ष सत्योन्मुख वाणी का लक्ष्य मानवतावाद है। अपने युग में इन कवियों ने एक व्यापक वैचारिक क्रांति को जन्म देकर भारतीय जनता के समक्ष एकेश्वरवाद, सदाचार, सत्य, समता तथा शाश्वत धर्म का आदर्श प्रस्तुत किया। उनकी अभिव्यक्ति निर्भिक स्पष्ट सरल तथा जन भाषा में है, जिसमें मौलिकता है। संत साहित्य अपनी सरल जीवन दर्शन की गम्भीरता तथा तत्व बोध के कारण अत्यंत प्रभावशाली है तथा आत्मविश्वास, आशावाद और आस्था की भावना संस्थापित करने में सहायक है।


प्रेमाख्यानक काव्य -
भक्तिकाल में संत काव्यधारा के समानांतर प्रेमाख्यानक काव्यधारा प्रवाहित हुई। हिंदी की यही एक ऐसी काव्य परम्परा है जिसका प्राकृत, संस्कृत और अपभ्रंश की कथा-काव्य परम्परा से सीधा सम्बन्ध स्थापित होता है तथा जिसमें भारतीय साहित्य परम्परा की विभिन्न कथानक रूढि़यों व काव्य प्रवृत्तियों का प्रति निधित्व विद्यमान है। यह मध्यकालीन हिन्दी साहित्य की सबसे दीर्घ एवं व्यापक परम्परा कही जा सकती है। धर्माश्रय एवं राजाश्रय से दूर लोकाश्रय में मुक्त रूप से पोषित होने वाली इस परंपरा ने मध्ययुगीन जनता की काव्य-रुचि एवं मनोरंजन की अभिलाषा को रोमांचक आख्यानों द्वारा तुष्ट किया। इसके अतिरिक्त इनके द्वारा जनसाधारण के ज्ञान कोश में भी अभिवृद्धि हुई, क्योंकि अनेक कवियों ने अपनी रचनाओं में विभिन्न शास्त्रीय तत्वों-दार्शनिक, धार्मिक, नैतिक, कामशास्त्रीय, ज्योतिष, वैद्यक संबंधी आदि का भी समन्वय किया है। मध्यकालीन संस्कृति एवं लोक जीवन के नाना पक्षों का इसमें सहज स्वाभाविक रूप में चित्रण हुआ है। अतः पूर्व-परंपरा के निर्वाह एवं युगीन वातावरण के चित्रण की दृष्टि इनका महत्व निर्विवाद रूप में है साथ ही शु0 काव्य की दृष्टि से भी यह परम्परा कम महत्वपूर्ण नहीं है। इस राज शृंगार के तीन प्रमुख पक्षों- सौन्दर्य, प्रणय एवं विरह का चित्रण इसमें अतिशय रोमांच रूप में हुआ, इनकी प्रणय भावना स्वच्छंद है जो साहस त्याग एवं बलिदान की भावना से पुष्ट होकर शुद्ध परिष्कृत एवं उदात्त रूप में परिवर्तन होती है तथा उदात्त प्रेम का आदर्श प्रस्तुत करती है।
यद्यपि यह बात सभी आख्यानों पर नहीं लागू होती है फिर भी समग्र रूप से स्वच्छंद प्रेम की स्वच्छ गम्भीर भव्य एवं उदात्त व्यंजना की दृष्टि से इस काव्य का विशेष महत्व है। हिन्दू कथाओं को लेकर प्रेममार्गी सूफी कवियों ने हिन्दू मुस्लिम दोनों जातियों के सांस्कृतिक समन्वय एवं भावनात्मक एकता का स्तुत्य प्रयास किया। यह प्रयत्न हिन्दी भक्ति की एक विशिष्ट उपलब्धि है। अवधी राजस्थानी एवं ब्रज जैसी लोकभाषाओं के साहित्यिक रूप के विकास में प्रेमाख्यान काव्यों का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है।


राम भक्ति शाखा -
राम भक्ति काव्य का दृष्टिकोण अत्यंत व्यापक है। इसमें समन्वय की विराट भावना लक्षित होती है। निर्गुण-सगुण, ज्ञान-भक्ति, शैव-वैष्णव-शाक्त आदि सम्प्रदायों के आभ्यांतर, वैमनस्य को दूर करने का जैसा स्वस्थ एवं संगत प्रयास किया गया है, वैसा हिन्दी साहित्य के इतिहास में कभी नहीं हुआ। तुलसी का काव्य समन्वय का विराट प्रयास है। रामकाव्य में मनुष्य मात्र की रूप-गुण, शक्ति, शील, सौन्दर्य के प्रति सहज लालसा की पूर्ति राम के आदर्श रूप को प्रस्तुत कर दी। तुलसी ने अपने मानस के द्वारा मध्ययुगीन हिन्दू जनता के मानस में ज्यादा निराशा, अवसाद, कुण्ठा व दीनता को दूर कर उसमें नव जीवन का संचार किया, राम के आदर्श रूप चित्रण में तुलसी ने वैयक्तिक पारिवारिक एवं सामाजिक जीवन में जिस मर्यादावाद की प्रतिष्ठा की, वह नितांत स्पृहणीय है। लोक मर्यादा की स्थापना के लिए इससे उत्तम काव्य न तो हिन्दी में पहले लिखा गया था और न इसके बाद लिखा गया। तुलसी के काव्य में लोक संग्रह, सहज कवित्त और निश्छल भक्ति की त्रिवेणी है। काव्य के क्षेत्र में भी तुलसी का सर्वातिशयी रूप दर्शनीय है। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती युग और अपने युग में हिन्दी काव्य क्षेत्र में प्रचलित काव्य विधाओं और शैलियों- महाकाव्य, मुक्तक, पद शैली, दोहा, कवित्त, सवैया आदि का सफल प्रयोग कर अपनी सार ग्राहिणी प्रतिभा व मेधा का सराहनीय परिचय दिया है। वस्तुतः तुलसी ने काव्य क्षेत्र नवीन कीर्तिमान तथा प्रतिमानों की स्थापना की। यही कारण है कि इनका रामचरित मानस हिन्दी का सर्वश्रेष्ठ काव्य तथा वे हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ कवि माने जाते हैं।


कृष्ण भक्ति काव्य -
कृष्ण भक्ति काव्य में साहित्यिक, सांप्रदायिक, धार्मिक, कलात्मक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक दृष्टियों से अष्टछाप का महत्वपूर्ण स्थान है। अष्टछाप के सूरदास आदि कवियों ने अपनी अद्भुत प्रतिभा से अप्रितम काव्य की सृष्टि कर मनुष्य की सर्वात्मिका वृत्ति के परिष्करण के लिए जो भाव-सम्पदा अपने काव्यों में प्रस्तुत की है वह अनेक दृष्टियों से अतीत सुन्दर और समृद्ध है। निःसंदेश कृष्ण भक्ति काव्य अग्रणी काव्य है। फिर भी इसमें सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक दशायें यत्किंचित रूप में चित्रित है। कृष्ण भक्ति काव्य की सबसे बड़ी देन है कि उसने साम्प्रदायिक स्तर पर कृष्ण भक्ति की विविध रूपों में पल्लवन किया है। कृष्ण भक्ति के अनेक सम्प्रदायों के शताधिक कवियों ने राधा कृष्ण की लीलाआं सम्बंधी जो अतुल भाव शशि दी है साहित्य उससे समृद्ध हुआ और साधक वर्ग को अपरिमित हार्दिक परितोष मिला। कृष्ण भक्ति काव्य का आधार पुष्टि अथवा भागवत कृपा है। इसी कृपा के सहारे मनुष्य अपने दुख दैन्य से मुक्ति प्राप्त कर सकता है। अनुग्रह और प्रपत्ति का यह मार्ग मानव का सबसे बड़ा सम्बल है, जिसे खोज निकालने का श्रेय इन कृष्ण भक्त कवियों को हैं। कृष्ण भक्ति काव्य मुक्तक काव्य के रूप में गीति शैली में है। उसमें नानाविध-राग-रागनियों को संजो दिया गया है। कृष्ण भक्त कवियों द्वारा प्रयुक्त ब्रजभाषा से हिन्दी भाषा की मधुरता अर्थव्यंजना तथा काव्योपयुक्त चित्रण शक्ति की अद्भुत वृद्धि हुई। उन्होंने भाव, भाषा, अलंकार, उक्तिवैचित्र्य, छंद योजना तथा संगीतात्मकता की अनूठी सम्पत्ति हिन्दी साहित्य को प्रदान की। इस काव्य में रीतितत्व के निरूपण की परम्परा का प्रवर्तन हुआ, जिसका आगे चलकर रीतिकाल में विस्तार हुआ। वस्तुतः कृष्ण भक्ति साहित्य आनंद और उल्लास का साहित्य है, विशुद्ध कलात्मक दृष्टि से भी यह साहित्य अनुपम है।


भक्ति भावना को सम्प्रदाय या मत पंतों से असम्प्रक्त रखते हुए काव्य रचना करने वाले श्रेष्ठ कवि भी इस काल में उत्पन्न हुए। मीरा, रहीम, रसखान, सेनापति आदि कवियों का काव्य साम्प्रदायिक नहीं है, किन्तु भक्ति ईश्वर प्रेेम और प्रकृति प्रेम की जो उदात्त भूमि इनकी रचनाओं में मिलती है वह अन्यत्र दुर्लभ है। मीरा का कृष्ण प्रेम समर्पित व्यक्तित्व की सुन्दरतम झाँकी है। रसखान का कृष्ण और ब्रज के प्रति प्रेम हिन्दी साहित्य में अप्रितम है। रहीम की नीति विषयक रचनाएँ व्यवहार के स्तर पर आदर्श है। सेनापति का प्रकृति वर्णन शुद्ध आलम्बन का प्रकृति वर्णन है, जिसमें प्राकृतिक उपादान सजीव हो उठे हैं इस प्रकार के सुन्दर और संश्लिष्ट प्रकृति वर्णन रीतिकाल में भी उपलब्ध नहीं है।


इस प्रकार भक्तिकाव्य आत्मप्रेरणा का पुल है। निस्संदेह इसका सृजन स्वांतः सुखाय हुआ किन्तु सर्वान्त, सुखाय सिद्ध हुआ। विषय वस्तु का औदान्य तथा कलात्मक लावण्य इसमें इतने घुल-मिल गये है कि उन्हें पृथक करना सहज व्यापार नहीं है। काव्य शास्त्रीय दृष्टि से भी सौन्दर्य विधायक सभी सत्व इस काव्य में भरपूर मात्रा में उपलब्ध है। रस, रीति, ध्वनि, वक्रोक्ति, अलंकार, गुण, वृत्ति, अप्रस्तुत विधान आदि का प्रयोग इन कवियों ने जिस सहज कलात्मकता के साथ किया वैसा रीतिकालीन कवि भी नहीं कर सके तुलसी लोकमंगल, लोकमर्यादा के प्रतिष्ठापक भारतीय सभ्यता-संस्कृति के व्यवस्थापक है। सूर के काव्य में भक्ति गीति और कवित्व की त्रिवेणी है। कबीर, जायसी, मीरा, रसखान, हित हरिवंश, नंददास तथा नानक की कृतियों पर हिन्दी जगत विश्व साहित्य के सम्मुख गर्व कर सकता है। रूप विधान तथा शिल्प विधान की दृष्टि से भले ही आधुनिक काव्य का साहित्य इस काल से समृद्ध हो किंतु अनुभूति की गहनता की दृष्टि से भक्ति साहित्य अप्रितम है। जनमानस के संताप को दूर करने वाली भक्त कवियों की पीयूष वर्षा वाणी जीवन रस से ओत-प्रोत, अनुभूति सौष्ठव एवं लोकमंगल के अमर संदेश से युक्त है। इस काव्य मंे हृदय, मन और आत्मा की भूख मिटाने की अपार शक्ति है। श्रेय और प्रेय, आनंद और कल्याण निःश्रेयस और अभ्युदय, प्रवृत्ति-विवृत्ति अनुभूति और अभिव्यकित के अद्भुत समन्वय द्वारा इस युग के कवियों ने जो कीर्तिमान स्थापित किए वे परवर्ती युग में सभी-दृष्टियों से यह वैभव का युग है। तथा स्वर्णयुग कहलाने के सर्वथा योग्य ह। उदात्त प्रतिभाओं का ऐसा समुज्ज्वल उदय तथा अगर विभूतियों का ऐसा समृद्ध उन्मेष हिन्दी के अन्य युगों में प्रायः अप्राप्य रहा है। ‘सत्यम् शिवम् सुन्दरम्’ से सम्पन्न भक्ति साहित्य हिन्दी साहित्य की गौरवपूर्ण उपलब्धि है।
 


- डाॅ. ऋतु वार्ष्णेय गुप्ता

रचनाकार परिचय
डाॅ. ऋतु वार्ष्णेय गुप्ता

पत्रिका में आपका योगदान . . .
विमर्श (1)