प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
जून 2017
अंक -52

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

आलेख

आधुनिक राजस्थानी ब्रजभाषा काव्य में रस: डॉ. जितेन्द्र कुमार सिंह


ब्रजभाषा साहित्य की श्रेष्ठ परंपरा के अंतर्गत काव्यस्तर को भावपूर्ण बनाने के लिए और काव्य की सार्थकता के लिए रस के द्वारा काव्य में अर्थ की जो अभिव्यक्ति होती है उसके अलग-अलग भाव को सर्वोच्चता प्रदान करने के लिए काव्य के सौंदर्य में भाव और रस की प्रधानता का होना अति अनिवार्य है । यद्यपि सबसे पहले भरत मुनि के नाट्यशास्त्र में भाव और रस की प्रधानता मिलती है किंतु अन्य प्रवर्तकों का कहना है कि महामुनि द्रुहिण के अनुसार रस सिद्धांत को नंदिकेश्वर के काव्य मीमांसा के रूप में देखा जाता है क्योंकि महामुनि द्रुहिण के शोध के कारण ही रस जैसे विषय की उत्पत्ति हुई है।
‘एतो हृष्टो रसाः प्रोक्ता द्रुहिणेन महात्मना।’1
इसके फलस्वरूप यदि देखा जाय तो भरत मुनि ने रस की शास्त्रीय मीमांसा में भाव और रस के विषय में अपने विचार प्रस्तुत किये हैं । भरतमुनि ने भाव और रस के घनिष्ठ संबंध के विषय में कहा है-
न भाव हीनोस्ति रसो न भावो रस वर्जितः।2


रस भावों की संक्षिप्त दशा को सर्वप्रथम व्यक्त करने वाले नाट्यशास्त्र के आचार्य भरतमुनि ने रस का वर्णन साहित्य में तो किया ही लेकिन काव्य के सौंदर्य में भी रस की पराकाष्ठा को विविध आयाम दिये। भरतमुनि ने रति, हास, क्रोध, उत्साह, भय, जुगुप्सा, विस्मय, शोक जैसे आठ स्थाई भाव माना। आचार्य भामह और दण्डी ने अलंकार को ही सर्वस्व माना किंतु रस का साथ नहीं छोड़ा वक्रोक्ति सिद्धांत के आचार्य कुंतक ने भी काव्य में रस को प्रमुख स्थान दिया जिसके कारण कवियों की वाणी में काव्यरस के द्वारा काव्य को सजीव किया जा सके। इस संदर्भ में चिंतामणि कहते हैं-
‘बत कहाऊ रस में जु है, कवित कहावे सोय।’3
अर्थात् काव्य चाहे कितना ही महत्वपूर्ण क्यों न हो जब तक उसमें रस की प्रधानता नहीं होती काव्य का अस्तित्व नश्वर है । आचार्य विश्वनाथ ने काव्य को रसात्मक कहा है-
‘वाक्यं रसात्मकं काव्य’4
रसयुक्त वाक्य ही काव्य है अन्यथा काव्य की स्वरूपता रस के बिना रसहीन है। भरतमुनि ने मुख्य चार रसों शृंगार , वीर, वीभत्स और रौद्र को प्रधानता दी किंतु इंहीं चार में से और चार रसों की उत्पत्ति हुई जैसे शृंगार से हास्य, वीर से अद्भुत, वीभत्स से भयानक और रौद्र से करुण। भरतमुनि के बाद नौवा रस शांति रस जिसका स्थायी भाव निर्वेद फिर आगे चलकर दो अन्य रस भक्ति और वात्सल्य और जुड़ गये।

आधुनिक राजस्थानी ब्रजभाषा काव्य के कवियों ने भी काव्य में रसात्मकता का प्रयोग करते हुए विभिन्न रसों के द्वारा भावों को व्यक्त किया है। प्रस्तुत शोध-प्रपत्र में सोदाहरण कुछ प्रमुख रसों पर प्रकाश डालने का प्रयास किया गया है।

 

शृंगार रस-
शृंगार  रस को रसराज कहा गया है इसका स्थायी भाव ‘रति’ अर्थात प्रेम है। संयोग और वियोग दोनों स्थिति में प्रेम का सुंदर वर्णन ब्रजभाषा के कवियों ने किया है। प्रस्तुत छंद में रामबाबू रघुराय ने राधा के रूप सौंदर्य का सुंदर चित्रण है-
सलिल सुदा सों भरे, अति ही अनूप रूप,
कजरारे अरु नारे सील रस वारे हैं।
तीखन दुधारें मान, मीनन के मारे सवै,
खेजने लजारे जिमि काम के कटारे हैं।
प्रेम मद वारे कारे, रूप वारे छवि वारे,
‘रघुराय’ चित्त चोर वारे जू निहारे हैं।
आरे तम वृंद चंद, ज्योति के पिटारे ये,
राधे के अनंग भरे नैन मतवारे हैं।5
वियोग वर्णन में कवि विरहिणी नायिका के वियोग का मार्मिक चित्रण प्रकृति के माध्यम से प्रस्तुत किया है-
उमडि़-घुमडि़ घिरि, कजरारे बरसाये,
झूमि-झूमि बदरा ये, मन में चुभतु है।
पिउ-पिउ पपिहरा, रटतु निसि बासर
बरखा की झड़ी लगी, बीजुरी दिपतु है।
बहत पवन मंद, दूर देश मेरौ कंत
पल-पल आबै सुधि, जियरा जरतु है।
पावस में मिलै पिय, हुलसत सदा हिय,
जुग सम बीतै पल, मन तड़पतु है।6
इस प्रकार कवियों ने आलंबन, उद्दीपन के द्वारा शृंगार  रस का वर्णन करते हुए जहाँ भक्तिकाल में राधा, कृष्ण गोपियों के मनोभावों का वर्णन करते हुए रचनाएँ की हैं वहीं रीतिकाल में नायक-नायिका के मनोभावों द्वारा संयोग-वियोग का वर्णन किया वहीं आधुनिक काल में भी शृंगार परक रचनाएँ बखूबी रची गयी हैं।


हास्य रस-
इसका स्थायी भाव ‘हास’ होता है। इसमें विचित्र आकृति, विचित्र वेशभूषा चेष्टाएँ देखकर हृदय में विनोदभाव उत्पन्न होता है। कवियों ने काव्य में इसका प्रयोग करते हुए व्यंग्यात्मक रूप से अपने भावों को प्रकट किया है। राजनीति, नेता, भ्रष्टाचार, घूसखोरी, जनसंख्या आदि की समस्याओं पर व्यंग्यात्मक रूप से कटाक्ष करते हुए सत्य को प्रस्तुत किया है । मूल्यहीनता को लेकर लिखी गयी कुंडली द्रष्टव्य है-
पैसा लेकर के नया, घूमा सभी बजार,
दूध दही की कहा चलै, मिलौ न मित्र अचार,
मिलौ न मित्र अचार, बहुत मन में झुँझलायौ,
कौड़ी की दर नांय हाय पैसा कहलायौ ।
इससे तो गिरिराज जमाना आवै ऐसा ।
जिसकी कीमत होय वही कहलावै पैसा ।।7
पश्चिमी सभ्यता से प्रभावित आधुनिक नारी पर श्री किशनवीर यादव द्वारा लिखित व्यंग्यात्मक हास्य कविता की एक झलक द्रष्टव्य है-
आठवीं पढ़ी है बहू पाम धरा धरै नाँय,
बनी डोलै टिपटाँप कऊ कूँ गिदानै ना।
शादी भोजनपारहीन होटल अटैंड करै,
भारत की मूल रीति-नीति कूँ पिचानै ना।
हिंदी बोलबे में याकुँ कैसी लाज आय रही,
तोरै अँगरेजी टाँग ए.बी.सी.डी. जानै ना।
की सभ्यता में एकैं सिहाय रही
कोऊ समझाऔ लाख बू तौ एक मानै ना।।8
इस प्रकार हास्य रचनाओं के माध्यम से आधुनिक समस्याओं को कवियों ने सहज रूप से प्रस्तुत किया है ।


करुण रस-
करुण रस का स्थायी भाव ‘शोक’ है जो हृदय के विकल भाव को प्रकट करता है महाकवि ‘भवभूति’ ने कहा है-
‘एको रसः करुण एव निमित्तभेदात्।’
निर्वेद, मोह, अपस्मार, व्याधि, ग्लानि, स्मृति, श्रम, विषाद, जड़ता, उन्माद और चिंता करुण रस के संचारी भाव है। इन विभाव, अनुभाव, एवं संचारी भावों के योग से करुण रस की निष्पति होती है। प्रभुदास वैरागी विरचित निम्न पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं-
प्रेमीजन के छोंह पर, रोती अँखियाँ धार।
गंगादास ज्यों राम के, बिछुड़न में नरनार।।9
दामोदर लाल तिवारी ने 1996 की बाढ़ का चित्रण द्वारा करुण रस का बड़ा ही मार्मिक चित्र खींचा है-
बहू गए अगवित, मानुस व जीव आदि,
खोजउ करे ते लाश देह की न पाई है।
कछुक तौ मारे गये भूख अरु प्यास तेई,
डूबकैं मरे हैं मदु ऐसैं मौत आई है।।
मच गयौ कोहराम, धीर कौ धरैया नाँय,
बरखा अरू बाढ़ नै, प्रलयं सी दिखाई है।10
इस प्रकार राजस्थान के ब्रजभाषा कवियों ने अपनी भावनाओं को करुण रस के द्वारा व्यक्त करते हुए विभिन्न विषयों जैसे कन्या की वेदना, श्रद्धांजली आदि पर काव्य की रचना की है ।


रौद्र रस-
रौद्र का स्थायी भाव ‘क्रोध’ है । शत्रु पक्ष वाले अथवा दुष्ट व्यक्ति के क्रिया-कलापों अथवा निंदा, अपमान आदि के कारण उत्पन्न हुए क्रोध से रौद्र रस की निष्पति होती है । श्री राधाकृष्ण ने अंग्रेजों के खिलाफ क्रांति के स्वरों में वीर-रौद्र रस के छंद की रचना की जिसका उदाहरण द्रष्टव्य है-
काली आ हरन हेत भार अब भूतल को,
क्रांति के करन हेतकोप के कराली अ।
कृष्ण कवि कृपान सौं कटती आरूंड मुंड,
झुंडन के झुंडन पाट मुंड माल वालीआ।
चाटती आ खप्पर में रूधिर पाटती आ,
खल दल उपाटती रूप विकराली आ।
आज तू भगाजा दुःख द्वंद भय भारत कौ,
सिंह पै सवार सज शृंगार  माँ काली आ ।। 11
इस प्रकार राजस्थान के ब्रजभाषा कवियों ने रौद्र रस में अपने भावों को पिरोकर क्रोध को व्यक्त किया है।


वीर रस-
कविराज विश्वनाथ ने उत्तम प्रकृति वीर लक्षण देकर वीर रस को अन्य रसों से श्रेष्ठ माना है। इसमें आलंबन शत्रु अथवा जिसे जीतना हो वह होता है। उसकी चेष्टाएँ, सेना, रण-वाद्य, सेना का कोलाहल, शत्रु या विपक्षी के प्रताप उत्कर्ष आदि का श्रवण इत्यादि उद्दीपन-विभाव होगा। वीर एवं रौद्र दोनों का आलंबन शत्रु होता है। इस संबंध में साहित्य दर्पणकार कहते हैं कि नेत्र तथा मुख का लाल होना, रौद्र रस में होता है, वीर रस में नहीं क्योंकि वहाँ ‘उत्साह’ ही स्थायी होता है।
श्री पूरणलाल गहलौद जी ने आजादी के वीरों को प्रोत्साहित करते हुए सबको लड़ने के लिए तैयार होने को कहते हुए लिखते हैं-
खून माँगती है आजादी, है जाऔ तुम सब तैयार।
सिर दैकैं आजादी लै लेऔ, कैसौ सुंदर ई व्यापार।
दस्तखत करौ खून सौं आकैं ह्वै जाबैं मोकूँ विश्वास।
आजादी लैकैं मानिंगे चाहै विछै लाश पै लाश।
आजादी के लिए मरिंगे, दीवाने भारत के लाल।
शेर सूरमाओं के आगैं, नहीं गलैगी इनकी दाल।12
इसी प्रकार ‘प्रभुदास बैरागी’ वीरों को संबोधित करते हुए लिखते हैं-
बजा नगारा युद्ध का, सुनी धनुष टंकार।
गंगादास बख्तर पहिन, हुए वीर तैयार।।13
इस प्रकार राजस्थान ब्रजभाषा कवियों ने वीरों का वर्णन करते हुए, युद्ध का वर्णन आदि करते हुए वीर रस में रचनाएँ लिखीं।


भयानक रस-
भयानक रस का स्थायी भाव ‘भय’ है इसमें भयानक वस्तु का वर्णन जिससे व्यक्ति भयभीत हो जाता है। भयानक दृश्य, जीव आदि की चेष्टाएँ एवं उनके कार्य आदि उद्दीपन विभाव होंगे। कंप, स्वेद, रोमाँच, भाजना, भौचक्का होना अनुभाव तथा सभ्रम, आवेश, त्रास, शंका, दैन्य, चिंता आदि संचारी भाव है। श्री निवास ब्रह्मचारी जी ने होली जो कि रंगों का त्यौहार है उसी को अँग्रेजों द्वारा खेली गई खून की होली का दृश्य के रूप में जिसमें बंदूक को पिचकारी खून को रंग आग की लपटों को गुलाल आदि को वर्णित करते हुए भयानक रस के रूप में लिखा है-
उदाहरण द्रष्टव्य है-
बम्बन के कुम कुमा चलै देस मांहि नित्य।
मारी बंदूकन लेकें पिचाकीर छोरी है।
गंधक पुटास लै अबीर की मचाई धूम।
आग की लपटन गुलाल झक झोरी है।
‘श्रीपति’ लूट मार हुश्यार हुर्दंग करै।
जनता के जीवन की दुर्गति न थोरी है।
मौत की धमार गावत पूजा की ठौरी ठग।
संत और महन्त खेलें खूनन की होरी है।14
‘प्रभुदास बैरागी जी’ ने भी भयानक रस को अपनी कविता में इस प्रकार व्यक्त किया है-
चुप रह, गुप चुप काम करै, गुप चुप में संसार।
गंगादास चुप्पी रही, उतर जायगा पार।।15
इसी प्रकार भयानक रस में कवियों ने भय के भावों को व्यक्त किया है। इसके अलावा शांत, वीभत्स और अद्भुत रसों के अतिरिक्त कवियों ने भक्ति और वात्सल्य रसों के द्वारा भी अपने हृदय के विभिन्न मनोभावों को काव्य में व्यक्त किया। भक्ति काल में शांत, वात्सल्य एवं भक्ति रसों की प्रधानता है, जिसमें सूर, तुलसी, मीरा की भाँति आधुनिक ब्रजभाषा के कवियों ने भी अपने भावों को दर्शाया है। रीतिकाल में नायक-नायिका की विभिन्न चेष्टाओं के वर्णन के साथ संयोग-वियोग की स्थितियों को काव्य के द्वारा व्यक्त किया गया जिसमें नख-शिख वर्णन से शिख-नख वर्णन आदि का समावेश किया गया। आधुनिक काल में इन परंपराओं का निर्वाह करते हुए आधुनिक समस्याओं की काव्य में रचना हुई जिनमें कवियों ने करुण, रौद्र एवं वीर रसों का उपयोग करते हुए अपने विचारों को व्यक्त कर सामाजिक चेतना लाने का प्रयास किया है। इस प्रकार काव्य में भाव एवं रस दोनों का महत्व है और भावों की विविधता एवं रस का यत्किंचित निरूपण ही काव्य के महत्व को प्रकट करता है।





संदर्भ-

1.    डॉ. दयाशंकर शुक्ल, (संपादक) ‘हिंदी का समस्यापूर्ति काव्य’, पृ.336
2.    वही, पृ.337
3.    वही, पृ.340
4.    वही, पृ.40
5.    मोहनलाल मधुकर, (संपादक) ‘राजस्थान के अज्ञात ब्रजभाषा साहित्यकार’, भाग-6, पृ.247
6.    गोपाल प्रसाद मुद्गल, (संपादक) राजस्थान के ब्रजभाषा साहित्यकार, भाग-16, पृ. 301
7.    मोहनलाल मधुकर, (संपादक) ‘राजस्थान के अज्ञात ब्रजभाषा साहित्यकार’, भाग-5, पृ.174
8.    गोपाल प्रसाद मुद्गल, (संपादक) राजस्थान के ब्रजभाषा साहित्यकार, भाग-16, पृ. 35
9.    गोपाल प्रसाद मुद्गल, (संपादक) राजस्थान के ब्रजभाषा साहित्यकार, भाग-17, पृ.101
10.    गोपाल प्रसाद मुद्गल, (संपादक) राजस्थान के ब्रजभाषा साहित्यकार, भाग-16, पृ.176
11.    डॉ. विष्णुचंद्र पाठक, (संपादक) राजस्थान के ब्रजभाषा साहित्यकार, भाग-3, पृ.164
12.    गोपाल प्रसाद मुद्गल, (संपादक) राजस्थान के ब्रजभाषा साहित्यकार, भाग-17, पृ.65  
13.    वही, पृ.101
14.    डॉ. विष्णुचंद्र पाठक, (संपादक) राजस्थान के अज्ञात ब्रजभाषा साहित्यकार, भाग-1, पृ.98
15.    गोपाल प्रसाद मुद्गल, (संपादक) राजस्थान के ब्रजभाषा साहित्यकार, भाग-17, पृ.101


- डॉ. जितेन्द्र कुमार सिंह
 
रचनाकार परिचय
डॉ. जितेन्द्र कुमार सिंह

पत्रिका में आपका योगदान . . .
आलेख/विमर्श (1)