प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
जून 2017
अंक -53

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

आलेख

साहित्य लेखन की परम्परा में उपेक्षित स्त्री स्वर और कृष्ण भक्ति काव्य: डॉ. विमलेश शर्मा


हिन्दी साहित्य के इतिहास लेखन में अगर स्त्री की उपस्थिति को लेकर बात की जाए तो वहाँ निराशा ही हाथ लगती है। हिन्दी साहित्य के आदिकाल में ही अगर स्त्री की खोज एक रचनाकार और विमर्शकार या विमर्श के विषय के रूप में की जाती है तो वहाँ वह लगभग अनुपस्थित है। इस अनुपस्थिति पर बीते कुछ वर्षों से चर्चा होने लगी है। यह एक वर्ग को हाशिए पर रखने की सुनियोजित वैचारिकी थी जिसके तहत अब तक इस विषय पर चर्चा करने के प्रयास भी नही मिलते कि आखिर क्यों वो उपस्थित होकर भी अनुपस्थित है। इतिहास अध्ययन अध्यापन की बात आती है तो हम आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और हजारी प्रसाद द्विवेदी को पढ़कर इति श्री मान लेते है। इन ग्रंथों में स्त्री को लेकर इतिहास पूर्णरूपेण मौन है। अगर गौर करें तो इस क्रम में जहाँ पहलेपहल चर्चा होती है, वह है मध्यकाल। 
जहाँ कबीर  स्त्रियों को माया कह कर संबोधित करतें हैं, वही तुलसीदास ‘कत विधि सिरजी नारी जग माही’ कहकर स्त्री को कुछ जगह देने का प्रयास करते हैं, हालाकि इतिहास में स्त्री की भूमिका यहाँ भी गौण है, और अगर है तो एक असहाय और ह्रास भाव से अटा हुआ अबला स्त्री चरित्र। यहाँ इस भूमिका के पीछे मेरा प्रश्न मात्र इतना-सा है कि दक्षिण भारतीय स्त्री आंदाल , अक्कमहादेवी और हिन्दी की मीरा जैसी कवयित्रियाँ या प्रतिरोध व जागरूकता के स्वर अचानक बिना स्त्री लेखन की पूर्व परम्परा के अकस्मात् कैसे पैदा हो सकते थे?आदिकाल का विस्तृत काव्य फलक है,पाँच तरह की महत्वपूर्ण काव्यधाराएँ है,परन्तु किसी स्त्री स्वर को वहाँ भी प्रमुखता नही मिलती। वहाँ वीरागनाएं है जो विभिन्न कलाओं में रूचि रखती हैं तो क्या यह मान लिया जाए कि वे अभिव्यक्ति के स्तर पर असमर्थ रहीं होंगीं। एक प्रसिद्ध आलोचक इस तर्क को कुछ यूँ रेखांकित करते हैं कि स्त्रियों के लिए यह आवश्यक नही था कि वे वीर काव्य के रणक्षेत्र में आए।


बात अगर मध्यकालीन काव्य की करते हैं तो वहाँ काव्य मे नारी की विरहानुभूति की प्रधानता है। इस विरहानुभूति में गोपियों की असामाजिकता से सामाजिकता में आने का कारण भक्ति दर्शन की यह वह धारणा है कि सभी भक्त स्त्री रूप है और कृष्ण ही एक पुरूष है, लोकरंजक रूप में कृष्ण। नारी विरह की प्रधानता का तीसरा कारण है नारी की मनोदैहिक रचना तथा जीवन के विकास की परिस्थिति। विद्यापति के काव्य, हिन्दी की वीरगाथाकाल के सामंती शौर्य काव्य और भक्तों की आत्मविरहानुभूति की जो परंपरा सूर की मिली उसमें भी नारी विरह की प्रधानता थी। सूर का भ्रमरगीत प्रसंग इस संदर्भ में नारी की आकल अंतरात्मा और तीव्र संवेदनशीलता की शाश्वत कहानी है। पुरूष प्रधान समाज में नारी का निर्माण पुरूष की कामना और अहं की संतुष्टि के लिए है उसका कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है। पुरूष की वासना और भावात्मक रिक्तता की पूर्ति ही नारी का लक्ष्य रहा है। सृष्टि में पुरूष प्रथम है और नारी दूसरी। पुरूष द्वारा निर्मित ईश्वर भी पुरूष है और स्त्री केवल माया, बंधन या अंधकार। वस्तुतः यह बताया गया है कि नारी का अस्तित्व पुरूष सापेक्ष है। सामंती समाज में पुरूष और स्त्री के बीच एक बड़ी सीमा रेखा है, दोनों के लिए प्रेम के भी भिन्न-भिन्न अर्थ है। पुरूष ने अपनी रसलोलुप प्रवृत्ति को प्रेम नाम दिया और इसी स्वार्थी मनोवृति की आड़ में स्त्री के सात्विक भावों और भावुकता का शोषण किया। यही पुरूष ही मधुप प्रवृति है और यही भ्रमरगीत है। पुरूष द्वारा भ्रवत, परित्यक्त स्त्री के पास अलावा और कोई राह नहीं थी। मानव की अन्तः प्रकृति को सहृदयता से समझने वाले कवियों के अन्तःकरण से सहानुभूति स्थापित कर स्त्री की मनोव्यथा और भावजगत की प्रभावशाली रूप से अभिव्यक्त करने का प्रयास किया है।
भ्रमरगीत प्रसंग का प्रेरणा स्त्रोत भागवत है जहाँ सिर्फ इतना बताया गया कि विपत्ति विध्ररा गोपियों और नंद, यशोदा को ज्ञान मार्ग का उपदेश देने के लिए उद्धव का आगमन होता है। इसी प्रसंग में सूर ने अपनी कल्पना से स्त्री अस्मिता के रंग भरे हैं। प्रेम के मार्ग में अड़े रहना और उससे पलायन न करना दिखाकर वे विप्रलम्भ की व्यंजना करते हैं।


कई बार भाव की दार्शनिक व्यंजना किसी प्रतीक विशेष के माध्यम से की जाती है इसी तरह यहां भ्रमर के ब्याज से पुरूष की रसिक स्वभाव के समक्ष स्त्री की विवशता, विकलता एवं उपालंभ की व्यंजना हुई है।
यहाँ एक बात गौर करने लायक है कि जब उद्धव-गोपी संवाद उपस्थित होता है तो राधा पूर्णतः मौन है। वस्तुतः इस मौन का अर्थ राधा का अनुपस्थित होना न होकर यह है कि गोपियों का सम्पूर्ण पक्ष राधा का ही पक्ष है। गोपियों का विरह राधा के ही विरह का विस्तार है, यही कारण है कि सूर कहते हैं कि,
‘‘सोलह सहस पीर तनु कै, राधा जीवन सब देह।‘‘ और सूर यहाँ राधा व गोपियों के माध्यम से प्रेम में पलायन का विलोम सिद्ध करने का प्रयास करते हैं।

कृष्ण का प्रवास गोपियों के लिए न तो कोरा वैयक्तिक है ना ही आध्यात्मिक वह तो विशुद्ध सामाजिक प्रश्न था और इसी सामाजिक सुख-दुख की हर क्रिया - प्रतिक्रिया को सूर समाज के संदर्भ में देखकर उधौ के कहे का जवाब देते हैं कि

‘उधौ मन नाही दस बीस/एक हुतो सो गयो स्याम संग।
कौ आराधै तव ईस।

भ्रमरगीत में विप्रलम्भ श्रृंगार की अभिव्यक्ति तथा वाग्विदग्धता वे पड़ाव है जहां स्त्री अस्मिता पहली मर्तबा मुखर दिखाई देती है। कृष्ण के बिछोह का अगर सर्वाधिक प्रभाव किसी पर पड़ा है तो वे गोपियां है। कृष्ण के मथुरा जाने के पश्चात् उनकी प्रेमिल पगडण्डियों पर व्याप्त वेदना में वे अपनी अस्मिता को लेकर सजग है और सूर पग-पग पर उनके प्रेमाधिकार और स्वाभिमान की रक्षा करते हैं। अगर पहला पड़ाव देखें तो उद्धव के ब्रज आगमन पर सूर उनका प्रथम संवाद गोपियों से करवाते हैं। ऐसा शायद इसलिए कि अगर यूं नहीं होता तो रागात्मक संबंधों की अवहेलना हो जाती। गोपियां यहां जनमानस का प्रतिबिम्ब है। यही कारण है कि वे कहते हैं-
 
‘‘जदपि अहीर यशोदा नंदन तदपि न जात छडे़।‘‘    
 ‘‘वहा बने जदुबंस महाकुल, हमहि न लगत बड़े।‘‘

 उद्धव योग और ज्ञान का उपदेश देते हैं, निर्गुण के समर्थन में अनेक तर्क देते हैं परन्तु उन्हें क्या मालूम कि गोपियां उनसे भी आगे हैं। वे अपने प्रेम और भक्ति की प्रतिष्ठा के लिए विरोध को लेकर उपस्थित होती हैं। गोपियों का यह विरोध भी कृष्ण के संदर्भ और समानान्तर ही विकसित होता है। वे प्रेम के प्रति सजग है और उसी पथ पर पूरी एकनिष्ठता के साथ जुटी रहती हैं। एक ओर वे अपने अश्रृओं से मधुवन के कूप भरती रहती है वहीं दूसरी ओर उद्धव के कड़वे वचनों का प्रतिकार भी बरजते हुए करती हैं-
‘उधौ जाऊ तुम्हें हम जाने
 स्याम तुम्हें यहां नहीं पठाए
 तुम ही बीच भुलाने।
‘‘

साथ ही ऊधौ मन मानै की बात या उधो मन में रझौ नाहिन ठौर कहकर अपनी अनन्यता की रक्षा भी कर लेती हैं। भ्रमरगीत प्रसंग ज्ञान पर भक्ति की श्रेष्ठता बड़ी ही सरलता से कर देता है। गोपियां आयो घोष बडो व्यौपारी कहकर योग को अदूरदर्शी करार देती हैं। वस्तुतः यह प्रतिकार और नकार ही स्त्री अस्मिता का प्रस्थान बिंदु है।

 

भ्रमरगीत प्रसंग में उपालंभ कृष्ण के कपटपूर्ण व्यवहार का प्रतिकार है। उद्धव और अक्रूर मथुरा की सामंती व्यवस्था का प्रतीक है। कपटपूर्ण व्यवहार का प्रतीक है। उन्हें कहीं-कहीं कृष्ण प्रेम की इस निठुरता पर अपराध बोध भी होता है। वे उपालंभ करती हैं कि हमने कृष्ण से कुछ और आशा की ही नहीं थी, तिस पर भी कृष्ण का स्वार्थपूर्ण व्यवहार है इसीलिए वे कहती हैं-

मधुकर प्रीति किए पछितानी।
हम जानी ऐसी निबहैगी, उन कुछ और है ठानी।‘‘

गोपियां प्रेयस के गुणों की कलई खुल जाने पर रोती कलपती नहीं हैं
सतर्क कलाहना देती 
हैं-

देखी माधव की मित्राई
आई उधरि कनक-कलाई ज्यौं दै गए दगाई।
हम जाने हरि हितु हमारे उनके चित्त उगाई।

गोपियां ज्ञान और योग का विरोध करती हुई भक्ति की प्रतिष्ठापना में और अपनी निजता, अस्मिता की पड़ताल करती हुई जो तर्क प्रस्तुत करती हैं उनमें अधिकारी भेद का सिद्धांत भी महत्वपूर्ण है। इस सिद्धांत का अर्थ यह है कि सभी मनुष्यों की रूचियों में समानता नहीं होती। यही कारण है कि हर मन की साधना का ढंग भी अलग-अलग होता है। अवस्था, वय, वर्ग साध्य एक होते हुए भी साधना अलग अलग हो सकती है। यही कारण है कि स्त्री और पुरूष की साधनात्मक पद्धतियों में भी अंतर होता है।
भ्रमरगीत प्रसंग में सूर यही स्थापित करने का प्रयास करते हैं। वे अनेक स्थाओं पर जातीय अस्मिता के सवालों की भी चुनौती देती है-

चेरी है न उधो, ब्रहम के बबा की।
हम तो नंद घोष की वासी।‘

काव्य का संबंध समाज की विविध समस्याओं से संलग्न होता है। श्रेष्ठ कवि केवल कविता के लिए कविता नहीं करता वरन वह अपने युग व समाज की समस्याओं को सुलझाने का प्रयास करता है। समाज में नारी की स्वतंत्रता और निम्न जातियों की समानता (जातीय समानता) को प्रतिष्ठित करके उन्होने तत्कालीन सामाजिक समस्याओं को सुलझाया है। स्त्री हृदय की पीड़ा और स्त्री चेतना का प्रतिकार और उध्वीरोहरण पूर्ण निष्ठाभाव से भ्रमरगीत में पाया जाता है। उतना अन्यत्र मिलना दुर्लभ है।
यथार्थ के धरातल पर गर इतिहास लेखन को देखें तो मध्यकालीन सामंती व्यवस्था और पितृसत्तात्मक विचारधारा के अधीन मीरा के आजीवन संघर्ष को  इतिहासकार जेम्स टॉड ने काटकर पेश किया।


 
आज हम जिस मीरा को पूज्य भाव से और सजल नेत्रों से देखते हैं उसके विपरीत उस समय के समाज ने उसे ‘बावरी’ घोषित कर दिया था क्योंकि उसने धार्मिक और सामाजिक रूढि़यों पर चोट की थी और वह सब बहुत पहले माँग लिया था जिसकी अनुगूँज आज हमें अनेक रूपों में प्रतिरोध के साहित्य में सुनाई देती है। परन्तु मीरा के साहित्य के अनुशीलन से यह बात स्पष्ट है कि मीरा एक आत्मचेतस औऱ स्वतन्त्र निर्णय लेने वाली स्त्री थी। उसकी स्वतंत्रता को कुछ लोग स्वेच्छाचार का नाम देते हैं परन्तु यह ये भी सिद्ध करता है कि उस समय के समाज में ऐसे निर्णयों के लिए स्वीकार्यता और सम्मान भी था। यह सब बातें जनश्रुतियों से ही सिद्ध होती हैं क्योंकि प्रामाणिक स्रोत की जानकारियाँ  नगण्य है। मेवाड़ से सम्बन्धित इतिहास ख्यात और बही में भी मीरा संबधित साक्ष्य अनुपस्थित हैं क्योंकि वे किसी सत्तारूढ़ शासक की पत्नी नहीं थी यही कारण है कि हमें जनश्रुतियों को ही मीरा के जीवन ,तत्कालीन परिस्थितियों औऱ उसके साहित्य को समझने हेतु आधार बनाना पड़ता है। हालांकि जनश्रुतियाँ मिथ्या नहीं होती क्योंकि वह लोक में जीवित रहती है अपने अनूठे व्याकरण और शब्दकोश में। वे परम्पराओं औऱ समय के साथ सतत प्रवाहमान रहती है। मीरा की कविता भी लोक की कविता है और अगर देखा जाए तो जितने खाँचों में इसे बाँटने की कोशिश की गई है और किसी संत कवि को नहीं। यह वर्गीकरण, यह काँट छाँट यूँ भी शायद कि एक स्त्री का छाड़ि दई कुल की कानि कहा करे कोई कहना किसी वर्चस्व वादी समाज को किस तरह गले उतर सकती थी इसलिए शायद भक्ति का पैराहन ही उसके लिए सर्वथा उपयुक्त था। मीरा की कविता को कई आलोचक हाशिए की कविता कहते हैं परन्तु उसका स्वर उस समय की, समाज की गतिशीलता का भी द्योतक है। गतिशील इस संदर्भ में भी कहा जा सकता है  कि ऐरी मैं तो प्रेम दीवानी कहने वाली मीरा अपने निज में लोक को पाती है, प्रश्निल मानसिकता रखती है और उन्हीं के समाधान के लिए स्वंय तुलसी को पाती भी लिख भेजती है। यह सजगता कहीं ना कहीं परिवेश की प्रगतिशीलता की भी उत्तरदायी है।


आज स्त्री विमर्श को लेकर इतनी-इतनी बहसें हैं पर पूर्व में कोई परम्परा नहीं दिखाई देना चौंकाता अवश्य है पर साथ ही समाज की कारगुजारियों से भी अवगत कराता है। जब स्त्री ने विरोध किया उसे भक्ति की चुनर ओढ़ा दिया गया औऱ जब उसने प्रतिरोध किया उसे सतीत्व का दर्जा देकर पूजनीय बना दिया गया। बिहारी की नायिका की तरह कभी उसे भोग्या समझा गया, कभी युद्धों के पीछे का कारण, कमोबेश इसी रणनीति पर समाज चलता रहा है। इतिहास भले ही मौन हो परन्तु भक्तिकाल इस पर दबे स्वर पर ही सही उपस्थिति दर्ज करता है। भक्ति आंदोलन का मूल आधार भगवान विष्णु और उनके अवतारों की भक्ति थी। “किंतु यह विशुद्ध भक्ति आंदोलन नहीं था । वैष्णवों के सिद्धान्त मूलतः उस समय व्याप्त सामाजिक-आर्थिक यथार्थ की आदर्शवादी अभिव्यक्ति थे। संस्कृति के क्षेत्र में उन्होंने नवजागरण का रूप धारण किया। सामाजिक विषयवस्तु में वे जातिप्रथा के आधिपत्य और अन्यायों के विरूद्ध अत्यंत महत्वपूर्ण विद्रोह के द्योतक थे।” के. दामोदरन का यह कथन भक्ति आंदोलन और खासकर मीरां के संदर्भ में सटीक है। मीरा की कविता महज भक्ति राग नहीं है वरन् वह दमनकारी नीतियों के विरूद्ध प्रतिरोध का राग है जिसे उसने धारा के विपरीत चल कर चुना था।
स्त्री समुदाय के लिए प्रतिरोध की परिकल्पना बुर्जुआ मानसिकता के लिए अंतरविरोधी और द्विखण्डित थी। परन्तु फ्रांसीसी क्रांति, मार्क्सवादी क्रांति के पूर्व ही मध्यकाल में हमारे देश में प्रतिरोध के कल्पतरु के दर्शन होते हैं भले ही इतिहास उसे भक्ति में भुनाता रहा हो। गोपियों का प्रतिरोध हो या मीरा का सतर्क प्रतिकार, स्त्री विमर्श की आहटों को लेकर ही कृष्णकाव्य की रसिकता के बीच हमारे समक्ष उपस्थित होता है।  





आधार ग्रंथ-

1.भ्रमरगीत सार
2.मीरा पदावली
3. हिन्दी साहित्य का इतिहास-शुक्ल


- डॉ. विमलेश शर्मा
 
रचनाकार परिचय
डॉ. विमलेश शर्मा

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