जून 2017
अंक - 27 | कुल अंक - 55
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

गीत-गंगा

गीत- बेटियाँ

यही बेरंग जीवन में हमेशा रंग भरती हैं
सदा ही बेटियाँ घर के अँधेरे दूर करती हैं

है इनकी वीरता को ये ज़माना जानता सारा
ये शीतल-सी नदी भी हैं, ये बन जाती हैं अंगारा
ये तूफानों से लड़ती हैं, नहीं से लहरों डरती हैं
सदा ही बेटियाँ घर के अँधेरे दूर करती हैं

हमेशा खून से ये सींचती सारी ही फुलवारी
छुपा लेती हैं ये मन में ही अपनी वेदना सारी
ये सौ-सौ बार जीती हैं, ये सौ-सौ बार मरतीं हैं
सदा ही बेटियाँ घर के अँधेरे दूर करती हैं

हवाएँ राह में इनके सदा काँटे बिछाती हैं
मगर जो ठान लेती ये वही करके दिखाती हैं
ये मोती खोज लाती हैं जो सागर में उतरती हैं
सदा ही बेटियाँ घर के अँधेरे दूर करती हैं


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गीत- बैठूँगी नज़दीक तुम्हारे

बैठूँगी नज़दीक तुम्हारे
और तुम्हारा मौन सुनूँगी

छूट गए जो इन हाथों से
ढूँढ रही हूँ उन लम्हों को
बनकर मैं चंचल-सी नदिया
हर पल तेरे साथ चलूँगी
बैठूँगी नज़दीक तुम्हारे
और तुम्हारा मौन सुनूँगी

साँसों की लय बतलाएगी
मन की पीड़ा बह जाएगी
धड़कन का संगीत बजेगा
उर के सब जज़्बात पढूँगी
बैठूँगी नज़दीक तुम्हारे
और तुम्हारा मौन सुनूँगी

आँखों के प्याले छलकेंगे
निर्मल से मोती ढलकेंगे
तुम हिम्मत बन जाओ मेरी
टूटे सारे ख़्वाब बुनूँगी
बैठूँगी नज़दीक तुम्हारे
और तुम्हारा मौन सुनूँगी


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गीत- ढूँढ रही हूँ

खोया बचपन ढूँढ रही हूँ
वो घर आँगन ढूँढ रही हूँ

अम्मा के चूल्हे की रोटी
वो इच्छाएँ छोटी-छोटी
पेड़ नीम का घना-घना सा
फिर वो सावन ढूँढ रही हूँ
खोया बचपन ढूँढ रही हूँ

बेपरवाही वो मनमानी
दादा –दादी, नाना-नानी
चक्की का संगीत वो मीठा
छन-छन कंगन ढूँढ रही हूँ
खोया बचपन ढूँढ रही हूँ

वो दर्पण का टूटा टुकड़ा
आज है मुझसे रूठा टुकड़ा
वो मिटटी में लिपटे कपड़े
वो अपनापन ढूँढ रही हूँ
खोया बचपन ढूँढ रही हूँ

सर पर वो तारों की छत भी
वो हल्के नीले-से खत भी
प्यार की खुशबू पावन-पावन
वो पागलपन ढूँढ रही हूँ
खोया बचपन ढूँढ रही हूँ

तीज सुहानी, सुन्दर होली
आटे की चौरस रंगोली
माखन से चुपड़ी-सी रोटी
तितली चंचल ढूँढ रही हूँ
खोया बचपन ढूँढ रही हूँ

 


- सुनीता काम्बोज

रचनाकार परिचय
सुनीता काम्बोज

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