प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
मई 2017
अंक -52

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

उभरते-स्वर

पागल बाबा

सड़क के किनारे
एक वृद्ध व्यक्ति दिखा
बाल तीतर-बीतर
कपड़े अस्त-व्यस्त
साथ में एक गठरी भी थी
न जाने कौनसा खजाना था उसमें
जिसे वह
अपनी छाती से लगाए बैठा था

ठंड के मारे
उसके पैर ही कम्बल बन गए थे
सिकुड़-सा गया था
मानो 50-55 साल का वृद्ध न हो
बालक हो

बाएं हाथ पर, थोड़ी-सी दूरी पर
था फाइव स्टार होटल
लोग आ रहे थे, जा रहें थे, बेफ़िक्र
किसी की नज़र पड़ी भी
तो गाली बक कर आगे निकल गया
कुछ ज़्यादा दयावान थे
उन्होंने चिल्लर उछाल दी
लेकिन वृद्ध केवल मुस्कुरा रहा था

न जाने क्यों
फिर ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगा
मानो उसकी हँसी, हँसी न हो
समाज के मुँह पर करारा चांटा हो

कुछ दिन बाद ख़बर आई
भुखमरी और शीतलहर के कारण
वह पागल चल बसा!


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मजदूरों की टोली


घड़ी में 8 बजते ही निकल पड़ते हैं परिंदे
रोजी-रोटी की तलाश में
कुछ एक साथ मज़दूर चौक पर जमा हो जाते हैं
कुछ वहीं अपनी चाय की ठेली लगा लेते हैं
सज जाता है चौक अपने फिर भव्य रूप में
सब अपनी अपनी तैयारियों में लगे हैं

पानी वाला अभी बर्फ फोड़ रहा है,
चायवाला बिस्कुट और मट्ठी के पैकेट लगाकर
चाय के लिये पतीला चढ़ा रहा है
चूँकि मौसम गर्मियों का है
आइसक्रीम वाले और लस्सी वाले ने अपनी रेहड़ी लगा दी
दोनों ही छतरी लगाने में व्यस्त हैं अभी

इतने में ही एक गाड़ी आकर रुकी चौराहे पर
सभी दौड़े, मानो ईश्वर ने दर्शन दिये हों
कहने को तो वह ठेकेदार था, लेकिन
जिन्हें 3-4 दिन से मजदूरी न मिली हो
उनके लिये वह भगवान से कम था क्या?

इसी तरह मजदूर छँटते चले गये
और घड़ी में 12 बज गये
जब सबको विश्वास हो गया
कि आज भी ख़ाली हाथ ही लौटना है
तो सभी मजदूरों की टोली जा पहुँची
चाय की गुंटी पर
और एक अंतहीन बातचीत का आरम्भ हो गया

देश के बजट और देश की अर्थव्यवस्था से लेकर
राज्यों में हुए चुनाव के हर परिप्रेक्षय में
वाद-विवाद होने लगा
वे अब मज़दूर का चोला उतार कर
विश्लेषक बन चुके थे
लगा ही नही की वे बेरोज़गार हैं
और आज की दिहाड़ी उन्हें मिलने वाली नहीं है
निश्चिंत और अपनी ही दुनिया में मग्न


- दीपक कुमार
 
रचनाकार परिचय
दीपक कुमार

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