अप्रैल 2017
अंक - 25 | कुल अंक - 55
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

संस्मरण

विश्वनाथ

 

“चालो दोस्तो, दही-मिसळ खरावोंचू तमैन सबनेन!!” (चलो यारों, तुम सबको दही-मिसल खिलाता हूँ!!)

 

हम लोग उन दिनों ट्रेज़री शाखा में थे। जब भी किसी कार्यवश ट्रेज़री में जाने का योग बनता, ये भाई बिना खिलाये-पिलाये न आने देते। हम लोगों की गम्मत करने के लिए कभी-कभी अपनी मातृभाषा, लबानी में बोलने लगते।

लगभग पाँच फीट एक इंच की ऊंचाई और सांवला वर्ण. अत्यंत वाचाल, आज की भाषा में कहें तो बोलबच्चन!! विश्वनाथ, स्थानीय कोषागार (ट्रेज़री) के कर्मचारी थे। बंजारा समाज के विश्वनाथ राठोड़, अत्यंत प्रामाणिक, मित्रवत्सल और ईमानदार मनुष्य थे। इनकी ईमानदारी की कसमें खाई जाती थी विभाग में। पान टपरी पर पान खाने जाते हुए भी, मित्रों का साथ चाहिए होता था इनको! इनकी ईमानदारी व सच्चरित्रता के चलते, स्थानीय भ्रष्ट्राचार निर्मूलन शाखा (ACB) व कभी-कभार स्थानीय अपराध अन्वेषण इकाई (LCB) भी, इनकी सेवाएं ले लिया करते अपने अभियानों में। किसी दरिद्र किसान अथवा मजदूर के गेट-अप में कोई पहचान न पाता। गावठी एक्सेंट में बात करने में, मास्टरी थी इनकी।

मित्रों संग शराब पीने का शौक था तो तम्बाकू चबाने की लत। मैं और दिलीप दो एक बार गए थे इनके साथ। कभी भी बिल न देने देते थे किसी को। कदाचित, उनकी सर्वप्रियता का यह भी एक कारण रहा हो। एक और दुर्गुण था, हाँ आप चाहें तो दुर्गुण कह सकते हैं इसे, मुँह के बड़े कड़वे थे। कोई बात नापसंद आने पर, वहीं जवाब दे देते. पर इन सबके बावजूद शानदार मनुष्य थे। सारे उनके स्वभाव से परिचित थे, पसंद करते उन्हें।

 

लगभग तीन वर्षों के साथ में, हममें मैत्री हो गयी थी बड़ी. मेरी मुख्य शाखा व दिलीप की जूने शहर शाखा में बदली के उपरांत, फिर कम ही होने लगी मुलाकातें!

एक शाम, साढ़े आठ के करीब, स्थानीय लेडी-हार्डिंग के समीप, उन्हें शराब के नशे में धुत्त, सड़क पर पड़े देखा तो विस्मय से ऑंखें फट पड़ीं हम दोनों की। हाथ-पैरों में खरोंचे आयी हुई थीं उनके। शायद किसी ने उड़ा दिया है, हमने सोचा.....

“चल यार, घर पहुंचा देते हैं इसे.....इसकी पत्नी परेशान हो जाएगी। ऐसा करते हैं, पहले किसी डॉक्टर को दिखा देते हैं, फिर छोड़ आएंगे घर!!”

दिलीप बोला और हम अपने एक मित्र डॉक्टर के पास ले गए इन्हें उठाकर। वे अब भी बेसुध थे। उसके ज़ख्मों को साफ़ कर, दवा लिख दी मित्र ने। दवा लेकर हमने ऑटो में बिठाया, और घर पहुंचे उनके....

 

“यह इनका रोज का हो गया है दादा! जबसे इनका वाशिम ट्रांसफर हुआ है, बेतहाशा पीने लगे हैं। गांव में सब परिचित हैं, रोज कोई न कोई छोड़ जाता है घर! इन्हें इस हाल में छोड़ भी नहीं सकती और बच्चियों का ध्यान कर सह भी रहीं हूँ!!”

भाभी, हम दोनों (मैं और दिलीप) से भली-भांति परिचित थीं, कहकर रोने लग पड़ीं.....

“चिंता नका करू वहिनी, आम्ही समजावतो त्याला....” (चिंता न कीजिये भाभी, हम समझाते हैं उसे....)

दिलीप ने धीरज बंधाने का प्रयत्न किया तो कहने लगीं;

“वे अब समझने की सीमा पार कर चुके हैं दादा.....नहीं समझेंगे! पता है? भ्रष्टाचार के आरोप में सस्पेंड भी हो चुके हैं....छह महीने घर बैठने के पश्चात फिर रुजू होने के बाद, बेतहाशा पीने लगे हैं.....क्या कहूं? मेरे भाग्य की विडंबना है यह.....”

विश्वनाथ का भ्रष्टाचार के आरोप में निलंबन, न्यूज़ थी हम दोनों के लिए! हम विस्मय से देखते भर रहे, एक-दूजे को.....

 

“यार, इस रविवार बात करते हैं इससे.....शायद  बात समझ जाये!”

घर से निकलने के बाद दिलीप बोला तो सहमती में गरदन हिला दी मैंने.....

शनिवार को हमने फ़ोन किया उन्हें.....

“कल कोई अन्य कार्यक्रम न हो तो मिलते हैं....”

“अरे, मैं भी सोच ही रहा था तुम दोनों से बात करने की....काफी दिन हो गए न? मिले ही नहीं.....फिर आ जाओ कल आशीष में....पत्नी भी मायके गयीं हुई हैं!”

आशीष स्थानीय बार का नाम था। हम थोड़ा झिझक गए बार में मिलने की बात पर.....

“यार, बार जाने दे न....फिर कभी! कल घर पर मिलते हैं न....”

दिलीप बोला तो उधर से कहने लगे;

“ठीक है, आ जाओ. पर आठ के पहले आना....”

उनकी आवाज से मायूसी झलक रही थी....दिलीप ने बताया! खैर, हम लोग पहुँच गए दुसरे दिन!

 

“यह क्या लगाया है तूने? पीने क्यों लगा है इतनी? जान देने का इरादा कर लिया है क्या?  सब करते हुए अपनी निर्दोष पत्नी और मासूम बेटियों का खयाल नहीं आता तुझे? आखिर ऐसा क्या हो गया कि ख़ुद को बरबाद कर देने पर तुले हो? और करप्शन का क्या मामला है? तुम तो कभी ऐसे न थे, पर जब इतना सब कुछ कर ही रहे हो तो क्या भरोसा कि ये न किया हो तुमने?’

सारे प्रश्नों को निर्विकार बैठे सुना विश्वनाथ ने पर आखिरी बात पर तमक पड़े....

“जाने दे यार, तुम्हें कुछ भी पता नहीं है. कुछ बताने का समय भी बीत गया है....और जानकर भी क्या करोगे? कोई किसी की नियति थोड़े न बदल सकता है? जो भी है, अच्छा-बुरा, सामना करूँगा मैं!”

अपने क्रोध पर काबू करने का प्रयास करते हुए अत्यंत दुखी स्वर में बोले विश्वनाथ! चेहरे की तमतमाहट, वेदना में तबदील हो गई। हँसते-खिलखिलाते विश्वनाथ को ऐसे देखकर दुःख हो रहा था हमें! ऑंखें भर आयीं थीं उनकी. हमने विषय बदल दिया। थोड़ी देर इधर उधर की बातें करने के पश्चात, उन्हें असहज देख कर पूछ लिया मैंने; “कहीं जाना है?”

“हाँ मैंने कहा था न आठ के बाद.....”

 

दिलीप चिढ़ गया;

“हमारे कहे का कोई असर नहीं तुम पर.....कुछ तो बता, फिर चले जायेंगे हम...”

“क्या जानना है तुम्हें? मेरे सस्पेंशन की कहानी या व्यभिचार की....”

हम दोनों फिर चौंक पड़े....विश्वनाथ हमें धक्के पे धक्का दिए जा रहे थे!

“अब ये क्या है नया....जो भी हो बताओ. मुझे जानना ही है!”

अबतक विश्वनाथ की ऑंखें बहने लग गयीं थीं. किसी तरह स्वयं को संयत कर कहने लगे विश्वनाथ;

 

“मेरी स्पष्टवादिता ने मेरा हाल कर दिया है दोस्तों.....यहाँ तो सब जानते थे, वाशिम में कौन जानता था मुझे? मेरी बोल देने की आदत और ईमानदारी से वैसे ही त्रस्त थे सब. मेरे कारण कईयों की कमाई पर संकट आ गया, तो दुश्मन हो गए सारे. सदा मुझे फंसाने की जुगत किया करते. मैंने कभी मौका नहीं दिया उन्हें तो रिश्वत और व्यभिचार के झूठे आरोप में फंसा दिया। मेरा बाल भी बांका नहीं कर सकते थे, यह जानता था मैं। छह महीने सस्पेंशन के बाद पूरी तनखाह और इज्जत के साथ फिर रुजू तो हुआ, पर इस चक्कर में बदनामी बड़ी हुई। वहां कौन परिचित था मेरा, जो फ़िक्र करता मैं? सच पूछो तो वहां के लोगों से शिकायत भी नहीं है मुझे! मुझे गिला है यहाँ के अपने मित्रों-साथियों से। ये तो सारे जानते थे विश्वनाथ राठोड़ को। उसकी ईमानदारी को। तुम लोग बैंक में हो, इसलिए नहीं जानते। कभी किसी मेरे विभाग के पुराने साथी से बात करो....देखो क्या कहता है वह मेरे लिए? किसीने साथ तो नहीं निभाया, उल्टा बदनाम कर दिया। मेरे घनिष्ठ मित्र मेरे संग बैठना तो दूर, बात करने से तक कतराते। तुम दोनों तो जानते हो, मित्रों का संग कितना प्रिय है मुझे? अकाल से कहीं अधिक, अकेलापन डराता है मुझको। मेरे प्राण अवरूद्ध होने लगते हैं। यह सब जानते हुए भी, अकेला कर दिया गया मैं। निर्दोष.....!! मेरी पत्नी, ससुराल के सम्बन्धी, यहाँ तक कि मेरी बेटियों के मन में भी जहर भर दिया है परिस्थितियों ने। बेटियां पहले ही ननिहाल जा चुकी हैं। वे नहीं चाहते, मेरा साया भी पड़े मेरी बेटियों पर। पता है, मेरी पत्नी भी जा चुकी है छोड़कर मुझे....दूसरे ही दिन, जिस दिन तुम लोग उठाकर लाये थे मुझे....आजकल कोई साथ न मिलने पर अकेला ही चला जाता हूँ दारू पीने। तो क्या करूँ घुट घुटकर जान दे दूं ऐसे मित्रों-संबधियों के लिए? कोई नहीं पूछता तो मैं भी नहीं पूछता किसी को!”

 

“तुम प्रतिशोध में ख़ुद को जला रहे हो! मेरी मानो, देर अब भी नहीं हुई है। लौट आओ। हम दोनों मदद करते हैं न तुम्हारी! जो तुम कहो, जैसे तुम कहो....”

तय यह हुआ कि वह शहर से बाहर शराब का सेवन नहीं करेगा। गांव में जब इच्छा होगी, हमें आवाज़ लगाएगा। पंद्रह दिनों में केवल एक बार छूट होगी पीने की। इसके एवज में हमें उसकी पत्नी-बेटियों को लौटा लाने का प्रयास करना होगा! दिलीप के दिमाग में तय था, क्या करना है। दो ही दिनों में, विश्वनाथ के डॉक्टर भाई की मदद से हमने हमारा काम कर दिया। अब उसकी जिम्मेदारी थी अपने कहे पर सही साबित होने की। उस समय तक मुझे नहीं पता था कि इम्तिहान हमारा होनेवाला था इसमें......

विश्वनाथ ने भी अपना वचन पाला। वे अब बुला लेते हमें. हम चले जाते दोनों पर एकाध बार ही पीने बैठे उसके संग। उसकी बातें सुनते. उसे उसकी गलतियाँ समझाते। वह धीरे धीरे सामान्य होने लगा था कि एक दिन.....

“अबे, तुम लोग उस बेवड़े के साथ बड़े रहते हो आजकल.....जरा बचके, नहीं तो पता चले कि तुम भी....”

ये भले मानस कभी विश्वनाथ के बड़े करीबी मित्र हुआ करते थे। एक दिन हमें भी जली-कटी सुना गए। असली परेशानी तब हुई जब एक दिन मेरे एक करीबी रिश्तेदार मेरे घर आए। मुझे ध्यान आया, ये विश्वनाथ के घर से करीब ही रहा करते थे। बातों ही बातों में कहने लगे;

“तुम आजकल उस दारुबाज राठोड़ के इधर कई बार दिख चुके हो....क्या बात  है? लोग नाम रखने लगे हैं अब! संभल जाओ....वैसे उसके साथ अवांछित जगहों पर भी देखा है मैंने तुम्हें.....”

मेरे लिए यह नई मुसीबत थी। दिलीप से कैसे कहता कि मैं नहीं आऊंगा....

 

इस बात को लेकर घर के लोग भी काफी रुष्ठ थे। फिर पता चला, दिलीप भी उन्हीं परेशानियों का सामना कर रहा है तो साहस कर बोल ही दिया एक दिन;

“दिलीप, यार लोग नाम रखने लगे हैं अब....मन तो मेरा भी नहीं मानता पर आखिर कब तक चलता रहेगा यह? कहीं तो रुकना पड़ेगा कि नहीं?”

“यार बात तो सही है, पर अब जब वह लगभग सुधरने की कगार पर है उसे फिर अकेले छोड़ने का दिल नहीं करता.....क्या करें, तू ही बता?”

“अब तक तो मुझे भी परेशानी नहीं थी कोई.....पर अब संबंधों पर आंच आने लगी है यार! अब उसके लिए अपने सबंधों को कैसे दांव पर लगाया जा सकता है भला?”

दिलीप थोड़ी देर तो कुछ नहीं बोला फिर कहने लगा;

“हो सकता है तुझे बुरा लगे, पर मेरी निजी राय तो यह है कि, दोस्ती सम्बन्ध थोड़ा ही होती है। यह कुछ अलग बात नहीं लगती तुझे? संबंध तो बनाये-बिगाड़े जा सकते हैं। मन का क्या करूँ? दोस्ती, मेरे लिए संबंध से अधिक भावना है। इस पर मेरा कोई नियंत्रण नहीं। मैं बदल नहीं सकता इसे, केवल इसलिए कि कुछ तथाकथित संबंध बिगड़ रहे हैं....यही तो दूसरों ने किया उसके साथ, हम भी करेंगे तो फ़र्क ही न रहेगा उनमें और हममें! मित्र की बुरी आदतों के लिए मैत्री पर कैसे आंच आने दी जा सकती है भला? यह तो ऐसा ही हुआ कि अपने गुणों के लिए तो मित्र मानें और अवगुणों के लिए शत्रु! ऐसा होता है कभी?”

मैं कोई उत्तर न दे सका। मेरे पास था ही नहीं कहने को कुछ....

 

हमने उसका साथ न छोड़ा। कुछ ही महीनों में विश्वनाथ उबर चूका था अपनी परेशानियों से। उसका पूरा परिवार अब भी अहसान मानता है हम दोनों का। विश्वनाथ, इसे अपना अधिकार समझता है अपना.....

फिर जिस दिन इसी विषय पर ओशो का कुछ पंक्तियाँ पढ़ी तो असल बात समझ आई मेरी। ओशो कहतें हैं;

"तुम कुछ लोगों के साथ संबंध बना सकते हो। मैत्री गुणवत्ता है न कि संबंध। इसका किसी दूसरे से कुछ लेना-देना नहीं है; मौलिक रूप से यह तुम्हारी आंतरिक योग्यता है। जब तुम अकेले हो तब भी तुम मैत्रीपूर्ण हो सकते हो। जब तुम अकेले हो तब तुम संबंध नहीं बना सकते--दूसरे की जरूरत होती है--पर मैत्री एक तरह की खुशबू है।“

दिलीप और मेरे लिए, मैत्री संबंध न थी....हो भी नहीं सकती थी। यह हम दोनों की भीतरी गुणवत्ता थी। इसे संबंध समझते ही नहीं थे हम, तोड़ कैसे देते?

दिलीप तो अब इस दुनिया में नहीं है पर मैं जब कभी शहर में होता हूँ, विश्वनाथ से अवश्य मिलता हूँ। उसे अपने परिवार के साथ खुश देख, दिलीप के साथ होने की तसल्ली मिल जाती है मुझे।  लोग अब भी नाम रखते हैं, आलोचना करते हैं मेरी। मुझे बड़ा आश्चर्य होता है.....

 

कल अपनी facebook प्रोफाइल पर मैंने अपने मित्रों से जानना चाहा;

“क्या किसी नजदीकी मित्र की कोई बुरी आदत, मित्रता को बुरी तरह प्रभावित कर सकती है? करनी चाहिए?

अधिकतर लोगों का जवाब विपक्ष में था इसके। मैं तसल्ली कर लेना चाहता था कि अन्य लोग क्या सोचते हैं इस बारे में?

समझ यही आया कि अधिकांश लोग एक जैसे ही सोचते हैं. ओशो का लेख तो बहुत बाद में पढ़ा मैंने, पर मैत्री के लिए सोच पहले से ऐसी ही थी। शायद इसीलिए, उक्त पोस्ट पर आयीं अत्यंत युक्तिपूर्ण प्रतिक्रियाएं भी, डिगा न सकी मुझे अपनी सोच से.....

 

- सत्येन भंडारी

रचनाकार परिचय
सत्येन भंडारी

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