प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
मार्च 2017
अंक -53

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

मूल्यांकन

पृथ्वी के छोर पर: अंटार्कटिका का सर्द एवं रोमांचक अहसास

 


"अंटार्कटिका के वैज्ञानिक तथ्यों से इसे बोझिल बनाना मैंने उचित नहीं समझा। उसके लिए पाठक को बहुतेरे प्रामाणिक और उत्कृष्ट ग्रंथ उपलब्ध कराए जा सकते हैं।"
- शरदिंदु मुखर्जी


कदाचित् उस हिमक्षेत्र के वैज्ञानिक तथ्य हमें उतना रोमांचित न करे जितना कि लेखक द्वारा उस परिवेश में बिताए गए वक्त की गाथा करती है जो उन्होंने “पृथ्वी के छोर पर” के नाम से प्रकाशित में लिखा है। यह किताब भूवैज्ञानिक श्री शरदिंदु मुखर्जी की अंटार्कटिका यात्राओं के दौरान हुए उनके रोमांचक अनुभवों का संग्रह है; यह संस्मरण श्री मुखर्जी के उन अनुभवों को अपने में समाहित किये हुए है जो शायद वे कभी भूलना न चाहें शायद इसलिए उन्होंने अपनी किताब “पृथ्वी के छोर पर” के रूप में उन्हें सहेज लिया और अपने पाठकों के साथ साझा किया है। इस किताब में उनकी यात्राओं की तस्वीर इस किताब में वर्णित उनकी बातों को समझने में भी मदद करती है हालाँकि उन्होंने किताब में इस्तेमाल किये कठिन तकनीकी शब्दों के अर्थ भी स्पष्ट किये हैं।

किसी भी संस्मरण की रोचकता लेखक द्वारा प्रयुक्त भाषा, शब्द एवं प्रस्तुतिकरण पर बहुत कुछ निर्भर करती है। किसी भी बात को बताने के लिए शब्दों का संतुलन इस किताब को विशिष्टता प्रदान करता है। इस किताब के अनुसार लेखक को कुल चार दफा अंटार्कटिका के अभियान दल का हिस्सा बनने का मौका मिला, उन्होंने तीसरे अभियान दल की अगुवाई भी की थी।
रोमांच की शुरूआत पहले अध्याय “पहली पुकार” से ही शुरू हो गई थी। जब उन्हें अंटार्कटिका अभियान में चयन की खबर मिली वो दूनागिरि के आगे हिमालय की चोटियों पर थे। दूनागिरि की पहाड़ियों से वापस उतरते समय लेखक दुर्गम रास्ते को बोल्डरों की बारिश के बीच अपनी जान बचाते हुए पार करते हैं।
इक्वेटर क्रॉसिंग सेरेमनी (Equator crossing ceremony) के बारे में जानकर बड़ी हैरत हुई और अच्छा भी लगा, तमाम संघर्षों एवं उतार चढ़ाव के बीच, अपने करीबी साथ हों या न हों ज़िन्दगी हमें सेलिब्रेशन का मौका ज़रूर देती है। मेरा यह विश्वास पुख्ता हुआ कि जीवन के तकलीफदेह सफर में किसी भी मोड़ पर छोटी सी छोटी बातों में खुशियाँ ढूँढी जा सकती है।
विश्वबंधुत्व, इस शब्द का मतलब अलग-अलग लोगों के लिए अलग हो सकता है। अंटार्कटिका में तफरीह कर रहे भू-वैज्ञानिक इस शब्द के नए अर्थ से रू-ब-रू हुए। इस किताब में विश्वबंधुत्व का जिक्र अंटार्कटिका जैसे वीरान परिवेश के सापेक्ष पढ़कर मन श्रद्धा व आदर से भर गया। एक ऐसी जगह जहाँ प्राकृतिक रूप से इंसान के होने की कल्पना भी नहीं की जा सकती वहाँ शायद पिछले किसी अभियान दल द्वारा एक हट बनाया गया था और कदाचित् उन्हीं के द्वारा हट में साजो सामान, खाने-पीने की वस्तुएँ रखी गईं थी; जिसका उपभोग बाद में आने वाले दल कर सकते थे। जाते-जाते शरदिंदु सर और उनके साथियों ने भी खाने के कुछ सामान उस हट में रख दिए। राष्ट्र की सीमाओं से परे भटके हुए लोगों के बारे में सोचना यह विश्वबंधुत्व का अनूठा उदाहरण है; हमारे जैसे आम इंसान इसकी सिर्फ कल्पना ही कर सकते हैं।


“जब गैस जलाने गए तो जली ही नहीं, वास्तव में द्रवीय गैस सिलेण्डर के अंदर जम गई थी”
यह पढ़ते हुए ही बदन में सिहरन सी दौड़ गई थी न जाने उस स्थान पर वातावरण कैसा रहा होगा। किताब पढ़ते-पढ़ते जब मैंने भाग-5 “तनाव से भरे हुए कुछ घंटे” पढ़ना शुरू किया मुझे महसूस मैं हर एक वाकिए के बाद रोमांचित हुआ जा रहा था। समंदर का वो लंबा सफर, अशांत समुद्र का जहाज पर असर, साथियों पर सी-सिकनेस का प्रभाव और इन तमाम तकलीफों को झेलने के बाद आइस पैक पर जहाज का लंगर डालना और लेखक समेत अभियान दल के अन्य सदस्यों का अंटार्कटिका पर कदम रखना, बर्फीली आँधी, मतिभ्रम फिर हादसों से सकुशल बाहर आने के बाद निर्जलीकरण(Dehydration) से बचने के लिए बर्फ को गलाकर उस पानी से चाय बनाकर पीना, ये तमाम वाकियात पढ़कर एक अद्भुत अनुभूति हुई।
इस अभियान दल के एक सदस्य पर अंटार्कटिका के हाइजीनिक वातावरण में भी 103 डिग्री फारेहाइट बुखार होना आश्चर्यजनक लगा और इसका इलाज उससे ज़्यादा हैरान करने वाला था।


“चौबीस घंटे के कमरतोड़ परिश्रम के बाद 6 घंटे सोने के लिए मिलते थे। जब नींद खुलती और हम खाने की मेज पर पहुँचते, प्रायः इस बात का ज्ञान नहीं होता था कि हम दोपहर का भोजन ले रहे हैं या रात का खाना।“

जब चौबीसों घंटे अँधेरा सर पर सवार हो तो यह अनुमान लगा पाना लगभग नामुमकिन ही होगा। लेखक अंटार्कटिका जिस भाग में थे वहाँ लगातार 2 महीने की रात होती है; दक्षिणी ध्रुव के अंतिम छोर पर दिन-रात का चक्र 6 महीने का होता है।


अध्याय “आकाश में आग की लपटें” में  वर्णित घटना एक हैरत भरी परिस्थितिजन्य घटना थी, जिससे लेखक पहली बार गुज़रे थे; कुछ-कुछ उसी तरह की आश्चर्यजनक खगोलीय घटना का वर्णन लेखक ने अध्याय “वह अलौकिक हेडलाइट” में किया है। मेरा दावा है, इस अविश्वसनीय घटना के बारे में पढ़कर पाठक हैरान हो जाएँगे; क्योंकि, शायद ऐसी अलौकिक घटनाएँ वे तभी देख पाएँगे जब अंटार्कटिका में होंगे, वो भी कुछ खास परिस्थितियों में; या फिर आप तभी महसूस कर सकते हैं जब यह किताब पढ़ रहे होंगे। “पृथ्वी के छोर पर” इस तरह की कई घटनाओं का संकलन है जिनसे लेखक अपनी चारों अंटार्कटिका यात्राओं के दौरान रू-ब-रू हुए थे; कुछ ऐसी घटनाएँ जो अंटार्कटिका जैसी बीहड़ जगह में किसी चमत्कार से कम नहीं और कुछ ऐसी घटनाएँ जिससे दल के सदस्यों की जान तक खतरे में पड़ गई थी। ऑरोरा ऑस्ट्रेलिस(#Aurora Australis) एक और अंटार्कटिका से जुड़ी हुई दिव्य खगोलीय घटना है, लेखक अपने दूसरे अभियान के दौरान जिसके साक्षी बने।
तमाम रोमांच से भरी घटनाओं का प्रस्तुतिकरण लेखक के कुशल लेखन के कारण जीवंत बन पड़ा है। मूलतः श्री शरदिंदु मुखर्जी एक कवि हैं उन्होंने कई अतुकांत रचनाओं का सृजन किया है। इस किताब में भी कहीं-कहीं गद्य कविता वाले अंदाज़ में लिखा प्रतीत होता है और इस दौरान उनके दिल से निकली कविताएँ भी दिख जाती हैं।
अंटार्कटिका वो सुदूर क्षेत्र हैं जो मानव आबादी से हज़ारों किलोमीटर दूर है। संभवतः वहाँ बर्फ के नीचे प्राकृतिक संपदा का अकूत भंडार होगा। वह ऐसा क्षेत्र है जहाँ किसी भी देश का आधिपत्य नहीं है।
रोमांच के शौकीन पाठकों को, विशेषकर जिनकी अभिरूचि पर्यटन में है उन्हें यह किताब ज़रूर पसंद आएगी।
 






समीक्ष्य पुस्तक- पृथ्वी के छोर पर
विधा- संस्मरण
रचनाकार- शरदिंदु मुखर्जी
प्रकाशक- अंजुमन प्रकाशन, इलाहाबाद


- शिज्जू शकूर
 
रचनाकार परिचय
शिज्जू शकूर

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