मार्च 2015
अंक - 1 | कुल अंक - 55
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

लघुकथाएँ
स्वतंत्रता
 
 
"पहन घुंघरू!" लीला बाई ने दस साल की नन्हीं उड़ान को कहा। रोते-रोते उड़ान ने घुंघरू पहनने शुरू किये और चतुरी की शरारत के कारण उसके हाथों से घुंघरू का तन्द टूटने से वो गिरकर बिखर गये।
फिर क्या...!!
“थड़ाप...” ज़ोर से एक थप्पड़ उस मासूम के कोमल गालों पर जड़ दिया गया।
“आगामी पंद्रह अगस्त को भारत अपना 61 वाँ स्वतंत्रता दिवस मनाने जा रहा है। कुछ ही दिनों में भारत की आज़ादी का यह महापर्व आने वाला है, जिसमें महान देश भक्तों की आहुति शामिल है। तब जाकर ये हमें प्राप्त हुई। आज़ादी का सही अर्थ वही समझ सकता है जिसने गुलामी के दिन झेलें हों। गुलामी से आज़ादी पाने के उपलक्ष में नेता जी इस शुभ अवसर पर तिरंगा फहराएँगे। सब गोल मैदान में इकट्ठा होंगे। नेता जी स्वतंत्र भारत के स्वतंत्र नागरिकों को शुभकामनाएँ देंगे।”
“मेरा भारत महान। जय भारत।”
मुनियादी वाले ने ज़ोर-ज़ोर से स्पीकर में कहाँ।
ये सुनकर उस नन्हीं उड़ान की आँखों में आँसू छलक आए और भीगी पलकें लिये वो अपने गुलाम होने का सामान इकट्ठा करने लगी।
 
 
 
 
 
करामात
 
 
8 वीं मंज़िल पर जाने के लिए होस्टल के काउंटर के पास खड़ी लिफ्ट का इंतज़ार कर रही थी, पर लिफ्ट तो अभी तीसरी मंज़िल पर थी। लिफ्ट रुक-रुक कर आ रही थी, तो सोचा क्यूँ ना थोड़ी देर कुर्सी पर बैठा जाये। थके हुए शरीर ने कब नींद की झपकी ले ली पता ही नही चला। अचानक आँख खुली तो लिफ्ट को बंद होते देखकर बोल उठी-
‘होल्ड प्लीज़...'
लिफ्ट के दरवाज़े में किसी ने पाँव रखकर लिफ्ट रोक दी। मैं भागी और लिफ्ट में चढ़ गई।
‘थैंक्स...' मैने उस लड़की को कहा।
हल्की-सी मुस्कुराहट के साथ उसने मेरे थैंक्स का जवाब दिया। अभी इससे आगे कुछ और बात होती, उस लड़की ने अपना मोबाइल निकाला और कुछ 'टक-टक' की ध्वनि सुनाई देने लगी। मोबाइल की कीपैड टोन ऑन थी शायद। हम लिफ्ट में कुल तीन लोग थे। मैं, वो लड़की और एक और लड़की भी थी वहाँ। वो तो पहले से ही मोबाइल में व्यस्त थी। लिफ्ट को 8 वीं मंज़िल पर पहुँचने में कुछ 4-5 मिनट लगे होंगे। वे दोनो मोबाइल की ओर और मैं उनकी ओर टकटकी लगाकर देखती रही। किसी प्रकार की कोई बातचीत हम में नहीं हुई। 8 वीं मंज़िल पर लिफ्ट रुकी, दरवाज़ा खुला और दो वाक्य सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ- 
"दी...मम्मी से बात हुई थी क्या?"
"हाँ, हुई थी....."
इतना कह वो फिर से मोबाइल में घुस गई और अपने कमरों के लिए उल्टी दिशाओं में चलने लगीं।
वे दोनो तो चली गई पर लिफ्ट के दरवाज़े में खड़ी मैं ये सोचती रही कि “मोबाइल ने क्या करामात दिखाई है यार... दिलों को जोड़ने का दावा करने वाले... कनेक्ट करने वाले इस यंत्र ने आज.... बहनों के बीच खुद को ला खड़ा किया है।”
 
 
 
 
अंतराल
 
“धर्मपत्नी जी, क्या आप हमारे संग घूमने चलेंगी?” अक्षय जी ने अपनी पत्नी से प्रेम-भाव से मुस्कुराते हुए पूछा।
“ह...म...सोच कर बताएँगे...” दोनों के चेहरों पर प्यार भरी मुस्कुराहट।
“वैसे, आज आपने अचानक से घूमने का प्लान.. कैसे बनाया, इतनी मेहरबानी क्यूँ?”
“हमने आपके लिये एक सप्ताह की छुट्टी ली है, ताकि हम अपनी पत्नी के साथ कुछ प्यार भरे पल बिता सकें। क्यूँ आप नहीं जाना चाहतीं…?”  तिरछी मुस्कुराहट के साथ अक्षय जी ने पूछा।
“शादी के तीस वर्ष बाद हम एक साथ इतना समय एक साथ बिताएँगे, इससे अधिक खुशी की बात हमारे लिए क्या हो सकती है!”
“बस एक आख़िरी काम, एक महोदय अभी हमसे मिलने आएँगे। उनको 20 मिनिट देने हैं। क़ानूनी सलाह के लिए शर्मा जी ने उन्हें हमारे पास भेजा है। आपके इलाक़े के ही है वो महाशय।”
“साहिब, आपसे मिलने कोई राजेंद्र बाबू आए हैं।” नौकर ने बताया।
“हाँ हाँ.. भेज दो।”
दिया उठने लगी तो अक्षय जी बोले “आप बैठी रहिये। बस 15-20 मिनिट का ही काम है हमें।”
“नहीं, मैं तब तक चाय की तैयारी करवाती हूँ।”
“ठीक है।”
“आइये राजेंद्र तिलक बाबू, बैठिये।”
दिया के रसोईघर में कदम रखते ही ये शब्द कानों में पड़े तो उसके कदम आगे बढ़ने की बजाय 30 साल पीछे चले गये।

- शिवानी कोहली

रचनाकार परिचय
शिवानी कोहली

पत्रिका में आपका योगदान . . .
कथा-कुसुम (1)