फरवरी 2017
अंक - 23 | कुल अंक - 54
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

मूल्यांकन

एक प्रतिवादी तेवर 'पहला कदम': ज्ञान प्रकाश पाण्डेय


ग़ज़ल का हिन्दी में आगमन कोई साधारण घटना नहीं थी। ग़ज़ल एक रिवायती सिन्फ़ है। ग़ज़ल की आमद के साथ-साथ उर्दू की एक पूरी रिवायत हिन्दी से जुड़ी। कालान्तर में यही रिवायत हिन्दी लबो-लहज़े तथा भारतीय मिट्टी से जुड़कर भारतीय संस्कारों में ढली। इसकी अन्तर्वस्तु में भी भारी परिवर्तन आया। अरबी, ईरानी इतिहास की जगह, हिन्दुस्तानी दुख-दर्द नज़र आने लगे। हिन्दी का साहित्यिक फ़लक बड़ी तेज़ी से ग़ज़लोन्मुखी हो रहा है। आज ग़ज़ल को हटाकर हिन्दी साहित्य का आंकलन नहीं किया जा सकता।
हालांकि आज हिन्दी ग़ज़लों में एक सुनामी-सी आई हुई है, किन्तु इस सुनामी में पीने के पानी का अभाव है। बहुत कम ग़ज़लों और शायरों में उनका समय दिखाई देता है। ग़ज़लकारों में ग़ज़ल कहने की तड़प कम, छपास और मकबूलियत की भूख अधिक है। इन तमाम बातों से परे, मुश्किलों के बाद ही सही, चमन को दीदावर तो मिल ही जाता है। 'सुल्तान अहमद' एक ऐसे ही दीदावर हैं।

हिन्दी ग़ज़ल और हिन्दी कविता में सुल्तान अहमद काफ़ी जाना-पहचाना नाम है। 'पहला कदम' सुल्तान जी का एक सार्थक काव्य-संग्रह है। इस संग्रह में काव्य की कई विधाएँ एक साथ आयी हैं। इतना ही नहीं, इसमें कुछ पुराने संग्रहों की रचनाएँ भी नए परिवर्तनों के साथ ग्रहण की गयी हैं।
सुल्तान अहमद की कविताओं में शुरू से अन्त तक एक बेचैनी, एक कशमकश, एक जद्दोज़हद साफ़ नज़र आता है। वे तमाम मसाइलों से टकराते हुए दिखाई देते हैं। कहीं भी कतराकर निकलते से नहीं लगते। संग्रह की कविताएँ सम्मोहित करने की बजाय बेचैन करती हैं। कविताएँ प्रगतिशील कविता का अगला चरण बनकर आई हैं। आज समाज पर अप-संस्कृति का इतना गहरा प्रभाव है कि मनुष्य, भाव-शून्यता की स्थिति में आ गया है। लोग अपनों को भी नहीं पहचान रहे। पूरी तरह से लाभ-हानि की संस्कृति व्याप्त है। एक अजनबीयत दिन-ब-दिन हमारे दरमियान बढ़ रही है। कवि कहने के लिए विवश हो जाता है-


कतरा रहे हैं लोग तो पहचानने से यूँ
बाहर से आके जैसे कि उनके शहर में हूँ


दौरे-हाज़िर की एक बहुत बड़ी विडम्बना यह भी है कि जो मिलता है, रहबर का चोला ओढ़कर ही मिलता है। कोई भी अन्तरंग होकर साथ चलने वाला नहीं मिलता। कवि इस बात को बड़ी सफ़ाई से कह देता है-

इतनी कठिन किसी पे कभी रहगुज़र न हो
रहबर मिलें तमाम; कोई हमसफ़र न हो


रचनाकार को कभी-कभी ऐसा लगता है कि जैसे हम गोल-गोल घूम रहे हैं या फ़िर जॉगिंग मशीन पर खड़े होकर दौड़ रहे हैं। सफ़र ज्यों का त्यों बना हुआ है जबकि गति बढ़ती जा रही है। एक लक्ष्यहीनता की स्थिति पैदा हो जाती है-

कल ये तुम्हारे साथ ही गुज़रे न हादसा
कदमों की रौ हो तेज़ अगरचे सफ़र न हो


सुल्तान की शायरी में तिलस्म न के बराबर है। अपने आप को व्यक्त करने के लिए सुल्तान, तिलस्म की बजाय तंज़ को बेहतर समझते हैं। इंसानी बेदारी के लिए इससे बेहतर तंज़ बहुत मुश्किल है-

कारवाँ की लीक पकड़े चल पड़ेंगे
क्या करेंगे जागकर हम सब अभी से


रचनाकार एक ऐसे संसार का आकांक्षी है, जहाँ किसी भी प्रकार की मज़हबी दखलंदाज़ी न हो। धार्मिक कट्टरता आज कौमी भाईचारे की राह में सबसे अधिक बाधक सिद्ध हो रही है। सुल्तान अहमद ने कौमी दंगों को बड़े नज़दीक से देखा है, शायद उसी का परिणाम ये शे’र है-

कुरान और वेद से हटकर धड़कता है जहाँ जीवन
वहीं सारी ॠचाएँ और पारे देखते हैं हम।


सुल्तान अहमद ने अपने एक शे’र में कहा था कि- 'हमको बना-बनाया कोई रास्ता न दे'। ठीक इसी शे’र को बड़े ही मुख्तलिफ़ अंदाज़ में बड़ी ही शालीनता से कह देते हैं। पूरी तरह भारतीय संस्कार से संस्कारित-

ये कुछ साँसें, ये कुछ सपने ये बेचैनी कयामत की
इन्हीं को ज़िंदगी का दोस्तो! सामान कहते हैं


सच! ज़िंदगी की परिभाषा कुछ इसी तरह की होनी चाहिए। बने-बनाए रास्ते वाकई ज़िंदगी की परिभाषा नहीं बन सकते। सुल्तान अहमद की प्रश्नानुकूलता उनकी कविताओं में एक मारक क्षमता पैदा करती है। इन प्रश्नों के माध्यम से कवि स्वयं को समय के साथ जोड़ता है। कवि मन की बेचैनी कवि को कमज़ोर नहीं करती बल्कि संबल प्रदान करती है, कवि के अंदर एक प्रतिवादी तेवर विकसित करती है-

आप ने भी क्या सुनी है
जो यहाँ पर चीख सी है

आपकी ये ज़्यादती है
क्यों नदी ये रोक दी है


एक दूसरी ग़ज़ल का शे’र देखें-

एक भगदड़-सी है आज चारों तरफ़
किसके साए में है आजकल ज़िंदगी


इन तमाम विषमताओं के बावजूद भी कवि कहीं भी लाचार दिखाई नहीं पड़ता-

छूट लूँ पहले ज़रा मैं इस अनवरत रात से
रोशनी की नींव पर ही हो सकेगी सर्जना


एक अन्य शे’र देखें-

इतना उड़ो कि पाँव तले आसमान हो
पर आदमी के कद से न ऊँची उड़ान हो


इस शे’र में शायर का अदम्य साहस साफ़ परिलक्षित होता है, किन्तु एक सामंजस्य भी है। प्रगतिवादी कविता का बड़बोलापन कहीं नहीं है। शायर को आदमी की हैसियत का ज्ञान है। कवि इस बात का आग्रह करता है कि लोग अपनी हद में रहें।
इस संग्रह में आए एक दोहे के माध्यम से समाज की कई विडम्बनाओं पर प्रहार किया है-


हरे टिकोले तोड़कर, डाल दिया है पाल।
सोच रहे हैं बैठकर, आम पके तत्काल।।


यह दोहा कई ओर इशारा कर रहा है। बाल-विवाह और बाल-मज़दूरी की पीड़द सच्चाई तो साफ़ नज़र आ रही है। एक कवित्त में समाज पर व्यंग्य देखें-

एक दूनी सात कहे, दिन को भी रात कहे,
गधे को भी तात कहे, और  शरमाए  ना।


सुल्तान जी के हायकु भी बड़ी सही चोट करते हैं। सुल्तान जी ने साफ़ कर दिया है कि किस तरह शोहरत की भूख आदमी को अपनी हैसियत, अपनी अना बेचने के लिए मज़बूर कर देती है-

ये सहूलियत
हमने पाई बेचकर
अपनी अहमियत


सुल्तान अहमद की शायरी का अपना एक अलग मिज़ाज है। शुरु से अन्त तक एक मानवतावादी दृष्टिकोण, एक स्पष्टता, एक स्थायित्त्व! कहीं भी कोई हिचकिचाहट नहीं। अपनी शायरी की खुसूसियत की वजह से हिन्दी ग़ज़ल में उन्हें एक मुन्फ़रिद और मुमताज़ मकाम हासिल है। इस बेहतर संकलन के लिए मैं उन्हें मुबारकवाद देता हूँ।





समीक्ष्य पुस्तक- पहला कदम (काव्य-संग्रह)
रचनाकार- सुल्तान अहमद
प्रकाशक- हिन्दी साहित्य अकादमी, अभिलेखागार भवन, सेक्टर-17,गांधीनगर-382017
मूल्य- 90 रू.
संस्करण प्रथम- 2012


- ज्ञान प्रकाश पाण्डेय

रचनाकार परिचय
ज्ञान प्रकाश पाण्डेय

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