फरवरी 2017
अंक - 23 | कुल अंक - 54
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम

लघुकथा- दंगा

उन इंसानों को शहर की फ़िज़ा में आए दिन बिखराया जाने वाला ज़हर बता रहा था कि चुनाव से कुछ महीने पहले वहाँ दंगे ज़रूर होंगे। उन्हें वर्षों पहले ठीक चुनाव से पहले हुए दंगों की पूरी दास्तान याद थी। चुनाँचे उन लोगों ने मिलकर तय किया कि इस बार वे जान हथेली पर रखकर संभावित दंगों को रोकने की पूरी कोशिश करेंगे। खैर, अभी चुनाव होने में कुछ महीने थे कि एक शाम उन इंसानों को ख़बर मिली कि शहर के मंदिरों और मस्जिदों को किसी ने अपने घृणित कार्यों से अपवित्र कर दिया है। वे मुट्ठी भर इंसान समझ गए कि इंसानियत के दुश्मन शहर में आग लगाने का इंतजाम कर चुके हैं और अब उसे बुझाने के लिए उन्हें मैदान में उतरना होगा।
वे सचमुच ही मैदान में उतरे और उन्होंने गला फाड़-फाड़कर आदमियों को समझाने की कोशिश की। दो-तीन दिन बाद जब दंगा रुका तो किसी पत्रकार ने उन इंसानों से मिलने की कोशिश की। घंटों खाक़ छानने के बाद उस पत्रकार को मालूम हुआ कि शहर के सभी इंसान उस दंगे में मारे गए थे।
विचित्र बात यह भी थी कि आदमी सभी जिंदा थे।


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लघुकथा- देह मोह

स्वामी जी का प्रवचन चल रहा था। उनके भक्त उन्हें बड़े गौर और श्रद्धा से सुन रहे थे। स्वामी जी लोगों को समझा रहे थे- "वासांसि
जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।" तथा "शरीराणि विहाय जीर्णा- न्यन्यानि संयाति नवानि देही।" अर्थात जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों
को त्यागकर दूसरे नये वस्त्रों को ग्रहण करता है, वैसे ही जीवात्मा पुराने शरीर को त्यागकर दूसरे नये शरीर को प्राप्त होता है।"
फिर वे भक्तों पर अपनी पैनी निगाहें घुमाते हुए बोले, "यही कारण है कि ज्ञानी मनुष्य अपनी देह से मोह नहीं रखते क्योंकि वे जानते हैं कि इसे तो देर-सबेर
नष्ट होना है।"
बहरहाल, उस दिन देर शाम स्वामी जी को सीने में कुछ तकलीफ महसूस हुई तो चिकित्सकों का एक दल उनका मुआइना करने के लिए बुलाया गया। डॉक्टरों ने उन्हें बताया कि उन्हें अपनी दिल की बीमारी के उपचार के लिए अमेरिका के क्लीवलैंड क्लिनिक या मेयो क्लिनिक जैसे किसी
नामचीन अस्पताल में जाना चाहिए। तुरंत ही स्वामी जी ने अपने प्रबंधक से इन अस्पतालों से संपर्क करने के लिए कहा।

अपनी नश्वर देह को बचाने के लिए स्वामी जी अमेरिका तो क्या, दुनिया में कहीं भी जाने को तैयार थे।


- सुभाष चंद्र लखेड़ा

रचनाकार परिचय
सुभाष चंद्र लखेड़ा

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कथा-कुसुम (1)