फरवरी 2017
अंक - 23 | कुल अंक - 54
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम

कहानी- इंतज़ार में


कमरे में एकदम शांति छाई हुई थी, अगर सुई भी गिरे तो आवाज हो ऐसे कुछ! आनंद बेड पर सोया हुआ था और अर्पिता उसी बेड पर उसके पैरों की तरफ बैठी उसे एकटक देखे जा रही थी। कितने भोले हैं आनंद, एकदम से सच्चे, सरल, किसी मासूम बच्चे की तरह!!!
शहर से बहुत दूर किसी गाँव के पास बने इस घर में वे दोनों ही अकेले हैं। वैसे उनके पीछे पूरा कुनबा है फिर भी यहाँ कोई उनके साथ नहीं, न ही यहाँ किसी की आस। लेकिन वो अकेले होकर भी अकेले नहीं हैं। वे साथ साथ हैं, आज से नहीं हमेशा से। यह कम तो नहीं।


अचानक तेज़ गडगडाहट के साथ बादल घिर आये और बरसात शुरू हो गयी। आनंद को बचपन से बारिश बहुत पसंद है और वे उसका पूरा लुत्फ़ लेते हैं। पहले तो खूब भीगते थे, इतना कि जुकाम तक हो जाता था परन्तु वे अभी थके हुए हैं और गहरी नींद में हैं, कितनी निर्दोष नींद है। उनको जगाना उसने उचित नहीं समझा जबकि उसे पता था कि जब वे जागेंगे तो उससे नाराज़ जरुर होंगे।

वह भी नहीं उठी और यूँ ही बैठी रही, आनंद को निहारते हुए। बारिश तेज़ होती जा रही थी। बीच-बीच में बिजली के चमकने के साथ ही बादलों का खूब जोर से गर्जन, माहौल को थोड़ा डरावना बना रहा था। उसका जी चाहा की सोते हुए आनंद के सीने से लग जाए परन्तु उनकी नींद खुल जाएगी यह सोच कर यूँ ही एक किनारे से सिकुड़ी हुई बैठी रही। सच है कि प्रेम मजबूर और बेबस बना देता है।
तेज होती बारिश और घिर आये घने अँधेरे ने दिन में ही रात का माहौल बना दिया था। नए बने कमरे की सीलिंग तेज बारिश बर्दाश्त नहीं कर सकी और एक जगह से पानी का रिसाव होने लगा। अर्पिता का ध्यान अभी भी आनंद की तरफ ही लगा था, वो उसमें इतना डूबी थी कि एक पल को भी उसका मन इधर-उधर भटक नहीं रहा था, न ही विचलित हो रहा था।
टप-टप टप-टप.......... ये आवाज जब उसके कानों में पड़ी तो उसकी तन्द्रा भंग हुई।


अरे यह तो कमरे से ही आवाज आ रही है। ओह्ह! छत से पानी टपक रहा है। वह जल्दी से उठी और वाशरूम से बाल्टी उठा लाई। अर्पिता ने उसे टपकते हुए पानी के नीचे रख दिया। कहीं आनंद की नींद न खुल जाए, यह ख्याल मात्र ही उसे बाल्टी को जल्दी से उठाने के लिए काफी था। खाली बाल्टी में टप-टप कर गिरता पानी और तेज प्रतिध्वनि पैदा कर रहा था।
अर्पिता ने पीछे मुडकर देखा, आनद अभी भी चैन की नींद सोया हुआ है। कहीं इस टप-टप की आवाज़ से उनकी नींद टूट न जाए, ऐसा सोचकर गिरते हुए पानी के नीचे अपनी हथेली लगा ली। पानी के टपकने का शोर कुछ कम तो हुआ परन्तु उसकी हथेली पर ऊपर से गिरता पानी दर्द पैदा कर रहा था। उसने एक हथेली को पानी के नीचे ही लगाये रखा और दूसरे हाथ को बढ़ाकर आनंद को चादर उढ़ाने का असफल प्रयास किया ताकि वो निर्विघन सोते रहे और ये शोर उनके कानों तक न पहुँचे, पर ऐसा हो न सका। बल्कि उसके चादर उढ़ाने की असफल चेष्ठा ने आनंद की नींद उचाट दी।


अरे बारिश हो रही है! अर्पिता तुमने मुझे जगाया क्यों नहीं? आनंद थोड़ा नाराज़ होता हुआ बोले।
वाकई सच्चे और सरल इन्सान के मन में कोई दुराव या छुपाव नहीं होता, वो तो एकदम सीधी और सच्ची बात कह देते हैं चाहे किसी को बुरी लगे या सही।
अर्पिता बिना कुछ बोले मुस्कुरा भर दी। आनंद कमरे के बाहर बनी गैलरी में आकर खड़ा हो गया। अर्पिता भी उसके पीछे-पीछे आकर किसी साये की तरह खड़ी हो गयी। आनंद बारिश की बूंदों को देखते हुए बोला, "पता है अर्पी, आज ओले भी गिरेंगे।"
"आपको कैसे पता?"
"वो यूँ कि ये बूंदें बता रही हैं कि आज तेज़ बारिश ही नहीं बल्कि ओले भी गिरेंगे ताकि हमारी अर्पी को मौसम का दुगुना आनंद मिले।"
"वो कैसे भला?"
"वो ऐसे कि ओले गिरेंगे तो ठंडक बढ जाएगी और फिर हमारी अर्पिता रानी हमारी बाँहों में सिमट आएँगी!" आनंद ने शरारत से मुस्कुराते हुए कहा।
"हम्म....आपको तो सब पता होता है जी।" अर्पिता मुस्कुराती हुई बोली।
"हाँ, मैं झूठ नहीं बोलता, देख लेना तुम खुद ही।"
"ठीक है बाबा!" अपनी मुस्कान को यूँ ही होठों पर सजाए हुए कहा।


बारिश लगातार बढती जा रही थी और उसका पानी गैलरी में भरने लगा था। आनंद ने अपने भीतर उस बारिश को जैसे जज़्ब करना चाहा। उसके होंठ गुनगुना उठे- 'थोड़ा और तेज बरस बदरा कि डरकर यार मेरी मेरे सीने से लग जाये रे!'
अर्पिता झूम उठी, उसका जी चाहा कि वह अपने पाँव में घुंघरू बांधकर इस बारिश में भीगती हुई नाचती रहे और तब तक नाचे, जब तक गिरकर बेहोश न हो जाए। चहक उठे चिड़ियों-सी और आनंद को कसकर अपने सीने से लगा ले।
कितनी मन्नतों, दुआओं और व्रतों के बाद उसे ये दिन नसीब हुए हैं। इंतजार में अपने बहते आसुओं के साथ रात-रात भर जागते हुए गुजारे हैं। तब जाकर तुम्हें पाया है मैंने। आनंद ने भी तो पूरी वफ़ा निभाई है। दूर रहकर भी हर पल उसके साथ रहा है। हर साँस के साथ साँस लेते हुए। अपनी जवानी दोनों ने तन्हा ही गुजार दी। सच ही तो है, 52 बरस की उमर में कोई जवान थोड़े ही न रह जाता है लेकिन जब प्यार सच्चा होता है तो उसे कोई भी दूर कर ही नहीं सकता।


उन दोनों की एक-दूसरे को पाने की ज़िद बरक़रार रही, घर वालों खासतौर से माँ का अंतरजातीय विवाह के लिए तैयार न होना और आखिर वे मिल ही गए।
कहते हैं न कि अगर हम किसी भी चीज को शिद्दत से पाने की ख्वाहिश करें तो कायनात का ज़र्रा-ज़र्रा उससे मिलाने में हमारी मदद करता है और उन लोगों के साथ यह बात पूरी तरह से फिट बैठ गयी थी।
अर्पिता को करीब 40 साल पहले के वे दिन याद आ गए थे, जब आनंद और वो एक साथ पढते थे। स्कूल और कॉलेज तक की पढाई के दौरान हमेशा साथ रहे थे। न जाने कब उनका बचपन का साथ प्यार में बदल गया, कहाँ पता चल पाया था। हाँ, बस एक-दूसरे के बिना रहना अच्छा नहीं लगता था। दूर होते ही बेचैनी से भर उठते थे। कॉलेज की पढाई के बाद जब आनंद ने आगे की पढाई के लिए दूसरे शहर जाने का निर्णय अर्पिता को बताया तो उसकी आँखों से स्वतः ही आँसू बहने लगे थे।
"क्या हुआ? तुम रो क्यों रही हो?"
"पता नहीं आनंद, ये आंसू अपने आप आ रहे हैं। नहीं जानती क्यों?"
उस वक्त वो भी खुद को संभाल न सका और उसकी आँखें भी गीली हो उठी थीं।
"अरे यार, एक साल की ही तो बात है और फिर यहाँ घर है तो बीच-बीच में आता ही रहूँगा।" उसने अर्पिता को समझाने का असफल प्रयास किया था।
क्योंकि वह स्वयं भी तो भीतर ही भीतर टूट रहा था अर्पिता से दूर जाने के ख्याल मात्र से।


कुछ पाने के लिए कोई त्याग करना ही पड़ता है परन्तु यह नहीं पता था कि यह त्याग इतना दुखद हो जायेगा। आनंद नियत दिन चला गया और अर्पिता दर्द से भर उठी। वे दिन कितने कष्ट भरे होते हैं, जो किसी के इंतजार में पल-पल या लम्हा-लम्हा गिन गिन के निकाले जाते हैं। एक-दूसरे से दूर जाकर उन्हें अहसास हुआ कि वे अलग नहीं रह सकते, वे साथ ही जियेंगे और हो सका तो साथ ही मरेंगे भी। आनन्द ने छुट्टी ली और घर आकर माँ को सब बता दिया था।
"माँ, मैं अर्पिता से शादी करना चाहता हूँ।"
"कौन अर्पिता, जो तेरे साथ पढ़ती थी?"
"हाँ माँ!"
"पर वो तो बनिए की लड़की है और हम ब्राह्मण लोग हैं, उसके साथ शादी कैसे हो सकती है?"
"आप कैसी बातें कर रही हैं माँ?"
"हमारे खानदान वाले किसी दूसरी जाति वाली लड़की को बहु के रूप में स्वीकार नहीं कर पाएंगे।"
"आज के दौर में जांत-पांत! वो किसी नीच खानदान की तो है नहीं, जो ऐसी बातें कर रही हो?
"नहीं हो सकती यह शादी।" माँ ने दोटूक एक-तरफा निर्णय दे दिया था। पिता तक बात भी नहीं पहुँच सकी।


उसकी हर बात मानने वाली माँ आज अपनी ज़िद पर अडिग थी कि मेरे जीते जी यह अंतरजातीय विवाह नहीं होगा। और वो अर्पिता से बिना मिले ही वापस चला गया। फिर अपने शहर में लौटकर नहीं आया था।
उसे बैंक की जॉब मिल गयी और मम्मी-डैडी को भी अपने शहर में बुला लिया था। इकलौता बेटा आनंद, दो बहनों का भी लाडला, सब कुछ ठीक। ज़िंदगी अपनी रफ़्तार से चल रही थी। लेकिन जैसे ही आनंद से उसकी शादी के लिए कोई कहता, वो फ़ौरन बिफर जाता।
"नहीं करनी मुझे शादी, मेरे सामने शादी का नाम मत लिया करो। चिढ है मुझे इस शब्द से।"
"अरे नहीं बेटा, जीवन बहुत लम्बा होता है। अकेले बहुत मुश्किल होगी।"
"क्यों? कितने लोग बिना शादी के जीवन गुजार देते हैं। मैं भी उनमें से ही एक हूँ। आप लोग हैं न!"
"हम लोग हमेशा थोड़े ही न बैठे रहेंगे।"
माँ, पापा, बहन या किसी और के समझाने का कोई भी असर नहीं। माँ बीमार रहने लगी। चलने फिरने में भी तकलीफ। घर के कामों के लिए नौकर रख लिए पर आनंद अपनी ज़िद से नहीं हटा। अब माँ पूरी तरह से बेड से लग गयी।
"बेटा, अब तो तू शादी कर ले। जिससे तेरा जी चाहे।"
"नहीं माँ, अब सब बेकार है।"
"क्या मेरी आखिरी इच्छा भी पूरी नहीं करेगा?"
"इच्छा आखिरी या पहली क्या? इच्छा तो बस इच्छा होती है।"


माँ चल बसी। पापा और आनंद, बस वे दोनों ही अकेले घर में रह गये। इतने नौकर होने के बाद भी घर का सूनापन काटने को दौड़ता। एक-सा सामान्य जीवन चल रहा था। उन्हीं दिनों मिले एक पत्र ने अचानक से जैसे शांत नदी में तरंगे पैदा कर दीं। बरसों से दबी हुई चिंगारी को हवा मिल गयी, सुलग उठी फिर से। अर्पिता का पत्र था।
"मैं इंतजार कर रही हूँ। कब आओगे?"
'अरे इतने बरस बाद भी अर्पिता अभी भी उसका इंतजार कर रही है! तो पत्र डालने में इतनी देरी क्यों की? उसने तो एक साल बाद ही लौटने का बताया था। क्या वो भी उसकी तरह ज़िद किये बैठी है।


वह गया था उससे मिलने। उसका सौन्दर्य अभी भी बरक़रार था। वैसी ही भरी-भरी बड़ी-बड़ी आँखें।
"तुम्हारी तो शादी का सुना था।"
"हाँ!"
"मात्र चार दिन रही थी फिर वापस लौट आई थी। ससुराल में क्या हुआ क्या नहीं? इसने आज तक नहीं बताया।  न इसकी ससुराल से कोई आया, न ही इसने हम लोगों को ही जाने दिया।" अर्पिता की माँ ने उसे बताया।
आनंद ने एक नजर उठा कर अर्पिता को देखा। वह शांत भाव से बैठी हुई थी।
जवान लड़की का घर लौट आना और मुँह से एक शब्द का न निकलना कैसे सहन करते। ज़िंदगी ठहर गयी थी ठहराव के साथ। न आगे बढ रही थी न ही पीछे हट रही थी। जैसे घड़ी की सुई रुक गयी हों। पर ऐसा कहाँ होता है?
बस हमें महसूस होता है कि सब कुछ रुक गया है जबकि ज़िंदगी और समय दोनों ही अपनी रफ़्तार से चल रहे होते हैं। बदलती तारीखों और गुजरते पलों के साथ।  अर्पिता ऐसे ही दिन गुज़ार रही थी। मानों अपने राम के इंतजार में पंचवटी में बैठी सीता। उसने अपने लिये वनवास खुद ही चुन लिया था। हाँ, ये वनवास ही था। लेकिन हर वक्त गुजरता है, इन्तजार का वक्त भी निकल गया था।


दरवाजे की खट-खट के साथ जब वह दरवाजा खोलने आई थी, तो रोशनी की एक किरण भीतर घुसने को बेताब नजर आई थी।
"आनंद, आनंद तुम आ गए? लौट आये तुम?" अनायास ही अर्पिता के मुँह से ये शब्द निकल गए थे।
"अरे, मैं गया ही कब था? अपना मन तो यहीं छोड़ गया था तुम्हारे पास। तुमने ही आवाज लगाने में देर की, कि यह आवाज पहले लगायी होती।" दोनों की ही आँखों में आँसू थे।
"मैं तो आवाज लगा रही थी तुमने ही नहीं सुनी।"
"सही कह रही थी अर्पिता।"
उसने कभी उसके बारे में जानने की कोशिश ही कब की थी। वो तो उसे शादीशुदा माने बैठा था।


उनकी शादी हो गयी थी। वे एक हो गये थे। सबकी रजामंदी से। अब माँ नहीं थी, न उनका साया था। हो सकता है वे ऊपर से देख रही हो और अपने आशीष भरे हाथों से जी भर दुआएं दे रही हों।
परन्तु विदा के समय आनंद अर्पिता को अपने उस घर में नहीं लेकर गया था, जहाँ पर माँ की यादें थीं। माँ की निशानियाँ थीं। वो शहर से दूर बने इस छोटे से घर में लेकर आ गया था, जहाँ चारों तरफ प्रकृति फैली हुई थी। अपने पूरे सौन्दर्य के साथ। हर तरफ फल-फूल के पौधे-पेड़। प्रकृति भी तो माँ ही होती है। यही सोचकर उनके आशीर्वाद तले रहने आ गया था।


दूर से पीहू-पीहू की आवाजें आ रही थीं। आम मंजरियाँ अब फ़लों से लदने को तैयार खड़ी थीं। कोयल के कूकने की मधुर धुन कानों में रस घोल रही थी। अर्पिता आनंद की बाँहों में समाकर एक होने लगी थी। आकाश में तेज गरज के साथ कहीं पर बिजली गिरी। मानों खुश होकर उनके मिलन पर तालियाँ बजा रही हो। टप-टप टप-टप! कमरे में टपकता पानी सुरीले स्वर में कोई राग छेड़ रहा था। लय तान और सुमधुर धुन में पिरो दिए गये दो जीवन अब एक होने जा रहे थे। आत्मा में परमात्मा का विलय होने को आतुर हो गए थे। बरसों से साधी गयी आस पूरी हो रही थी। आखिर जीत विश्वास की हुई थी, उनके प्रेम के विश्वास की। सब कुछ थम-सा गया था, ठहर-सा गया था, मानों प्रकृति भी उनकी ख़ुशी में शामिल हो गयी थी।
सदियों से अतृप्त धरती, तृप्त हो झूम उठी और वे दोनों जी उठे थे!!


- सीमा 'असीम' सक्सेना

रचनाकार परिचय
सीमा 'असीम' सक्सेना

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कथा-कुसुम (1)