फरवरी 2017
अंक - 23 | कुल अंक - 54
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

ज़रा सोचिए
क्या ख़ुद को बदलना होगा?
 
एक विचार जो सोचने पर मजबूर कर रहा है, या यूँ कहें एक सवाल, जिसके जवाब की तलाश है मुझे। कई प्रसंगों में देखने में आता है कि कई बार हम जाने-अनजाने में अपनों स्वजनों को अपने व्यवहार से लगातार आहत कर रहे होते हैं, जबकि वे अपना स्नेह लगातार आप पर बिना किसी अपेक्षा के, नदी की मानिंद उड़ेले जा रहे होते हैं, जैसे हमारे स्वजन, माता-पिता या अन्य महत्वपूर्ण रिश्तेदार, आपका प्रेम या आपके मित्र।
जब हमें अहसास हो कि हाँ, हमारे व्यवहार में कुछ बदलाव की ज़रूरत है, तब कौन से, कैसे, कितने बदलाव हों? जिससे रिश्तों में आई दूरियाँ या बेवजह उपजी गलतफ़हमियों को दूर कर एक मजबूत बंधन नाज़ुक रिश्ते की डोर से बांधा जा सके।
 
सबसे पहले सवाल यह कि रिश्ते में एक पक्षीय भावनाओं का प्रवाह क्यों? मुझे लगता है सिर्फ प्रेम ही एक ऐसी अवस्था है ,जब हम किसी के प्रति इतने समर्पित होते हैं कि उसकी गलतियाँ और उपेक्षा भी बर्दाश्त कर लेते हैं। पर क्या यह सही है? एक माँ अजन्मे शिशु पर भी प्रेम लुटाती है, एक पिता अपने उद्दंड बच्चे के भविष्य के लिए भी उतना ही समर्पित होता है जितना काबिल बच्चे के लिए, एक बहन को अपने भाई से अच्छा और एक बेटी को अपने पिता से बेहतर इंसान मिलना नामुमकिन-सा लगता है। एक लड़की के सारे सपने अपने सपनों के राजकुमार पर न्यौछावर होते हैं, एक पत्नी अपने पति पर ही सबसे अधिक अधिकार जता पाती है, एक बेटा हमेशा अपने पिता को ही अपनी हर परिस्थिति का ज़िम्मेदार मानता है, एक पति सारी अच्छाई सिर्फ अपनी पत्नी में देखना चाहता है, एक प्रेमी अपनी प्रेमिका पर एकाधिकार चाहता है। एक भाई अपनी बहन के लिए ही सबसे ज्यादा अनुशासन प्रिय होता है। आखिर क्यों? मेरी सोच कहती है जवाब सिर्फ एक 'प्रेम से उपजी अपेक्षाएं।'
पर क्या ये अपेक्षाएं गलत हैं? क्या इन अपेक्षाओं के कारण रिश्ते प्रभावित होते हैं? क्या बदलाव इन्हीं अपेक्षाओं में होना चाहिए? या फिर प्रेम में?
मुझे लगता है न प्रेम में, न अपेक्षाओं में बल्कि बदलाव की ज़रुरत प्रेम या अपेक्षा को प्रदर्शित करने के तरीके में होनी चाहिए। हमें अपनी एक पक्षीय अपेक्षाओं का इतना भी आदी नहीं होना चाहिए कि दूसरे पक्ष से अपेक्षा का अधिकार ही छिन जाए।
 
हर रिश्ते को अपनी निजता, अपने अस्तित्व और आत्मसम्मान की सुरक्षा का ख्याल होना चाहिए। अत्यधिक जुड़ाव ही टूटने पर तकलीफ़ ज्यादा देता है, मन जब अपने ही बच्चों से उपेक्षित हो, पिता जब अपनी संतान से शिकायत सुने तो तकलीफ होती है यही कारण है कि लाड़ प्यार के साथ डाँट और अनुशासन भी ज़रुरी होता है। भाई का बहन के लिए संवेदनशील होना सही है पर बंधन या निगरानी की बात न हो और ख़ुद भाई भी अन्य लड़कियों का सम्मान करे, प्रेमी का एकाधिकार सही पर भावनाओं का सम्मान भी हो तभी स्वीकार्य, पति-पत्नी में भी एक पक्षीय दबाव न हो क्योंकि एक गाड़ी के दो पहिए समान गति से चलें तो ही वाहन संतुलित चलता है।
 
रूठने मनाने का अधिकार सिर्फ आपका नहीं, आप अपने सामने वाले या साथी को भी वो अधिकार दें। सिर्फ अपनी कहने से बचें और सुनने की आदत डालें। फैसले थोपें नहीं और न कुतर्क करें बल्कि अच्छे तर्कों के साथ अपनी बात रखें। और यदि दूसरे पक्ष की बातें अधिक तार्किक हैं तो सम्मान करें न कि खुद नाराज़ होकर दूरी बढ़ाएँ। किसी के रूठने पर संवादहीनता की स्थिति बिल्कुल न आने दें, क्योंकि ये स्थिति गलतफहमियाँ बढ़ाकर रिश्तों को कमज़ोर करती हैं। इन सब के बावजूद भी कोई अपना रुठ जाए, जिसे आप खोना नहीं चाहते तो जब तनाव अधिक हो तो झुककर माफ़ी माँग लें, और जब स्थिति सामान्य हो जाए तब प्यार से अपनी बात रखकर गलती इंगित करें। सीधे आरोप-प्रत्यारोप से बचते हुए सहजता से अपनी बात रखें। पर याद रहे 'अति सर्वत्र वर्जयेत', प्रेम और समर्पण की एक-तरफा अति भी रिश्तों को कमज़ोर करती है। प्रेम से उपजी अपेक्षाओं के कारण यदि तनाव बढ़ा तो प्रेम नहीं अपेक्षाओं को कम करके एक-दूसरे की भावनाओं का सम्मान करना ही एक मजबूत और परिपूर्ण आधार बनता है।
 
हम नहीं जी सकते अपनों के बिना
या अपनों से बिछड़कर
या अपनों से टूटकर
इसलिए
जब अपने रूठे, अपनों को मना लेना
कभी ख़ुद रूठकर
कभी थोड़ा झुककर।

- प्रीति सुराना