फरवरी 2017
अंक - 23 | कुल अंक - 54
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कविता-कानन

फ़र्क

तुम मुझे बर्बर कहते हो
असभ्य कहते हो
तुम्हारी नज़र में
मैं इसके सिवा कुछ भी नहीं।

मुझे तुम पर गुस्सा नहीं
तरस आता है
मैं कुछ कहना नहीं चाहता
अपने नंगे सच को
तंगहाली से ढांपकर
अपने ही भीतर कैद कर लेना
मेरी मजबूरी है
वरना तुम जैसे शरीफ लोग
अपनी शराफत से
उसका पोस्टमोर्टम कर डालोगे।

मुझे नहीं कहना कुछ भी
क्योंकि मैं जानता हूँ
तुम नहीं समझ सकते
मेरी वर्जनाओं को,
मेरी यातनाओं को
तुमने अभी देखा नहीं
जिसे मैं झेलता आया हूँ
भूख से तड़पते अपने बच्चों को,
चीथड़ों में लिपटी जवान बहन को,
बीमारी से लाचार माँ-बाप को।

तुम्हारी आँखों पर
खोखली नैतिकता का
चश्मा चढ़ा है, जिससे
दुनिया बड़ी रंगीन दिखाई देती है।
मैंने अपनी इन्हीं आँखों से
तुम्हारे बच्चों को पिस्ता
और बादाम खाते देखा है,
तुम्हारी बीवी को
जो रेशमी कपड़े पहनती है
देखा है,
देखा है
तुम्हारी तमाम अय्याशियों को।

मगर, क्या कभी
तुमने देखा है
मेरे बिलखते बच्चों को
ज़िंदगी का बोझ ढोते-ढोते
भरी जवानी में
हाड़-माँस के उस पुतले को
जो मेरी पत्नी कहलाती है।
नहीं,
तुम्हें फुर्सत नहीं है
देखने की
या फिर
तुम देखना नहीं चाहते
तो फिर मैं कैसे देख सकता हूँ-
मुझसे भी देखा नहीं जाता
तुम्हारी नैतिकता से मुझे विरोध नहीं
लेकिन क्या करूँ
भूखे पेट नैतिकता नहीं सुहाती।
मुझे विरोध है-
तो सिर्फ तुम्हारी
उस घृणित मानसिकता से
जिसमें गरीबी पशुता है
और अमीरी चारुता।
मुझे विरोध है तो सिर्फ
तुम्हारी उन नीतियों से
जिसकी वजह से हम
अपनी जड़ों से विस्थापित हुए
अपने पूर्वजों की धरती को छोड़कर
मजबूर हुए
तुम्हारे शहरों में आने के लिए
और कभी-कभी
मेरा यह विरोध
उग्र हो जाता है
नैतिकता समझ नहीं आती
अनैतिकता ही नैतिकता लगने लगती है
फिर वही होता है
जिसे तुम अनैतिक कहते हो।
लेकिन सवाल नैतिकता का नहीं
सवाल है उस फर्क का
जो तुम्हारे और मेरे बीच है
वो फर्क ही तुम्हें नैतिक
और हमें अनैतिक बनता है।

तुम अब भी नहीं समझ पाओगे
कि फर्क कहाँ है
तुम समझते हो हमें ख़त्म करके
इस समस्या को मिटा सकते हो
तो आओ!
तुम्हारा स्वागत है
आओ हमें ख़त्म कर दो
लेकिन ये याद रखना
हम तब तक
ख़त्म नहीं हो सकते
जब तक कि
तुम्हारे और मेरे बीच का यह फर्क।


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शब्द

जानते हो मेरे यार!
दुनिया में अनमोल क्या है?
शब्द
हाँ, शब्द!
मेरे पास बस यही है
इसके सिवा कुछ नहीं
तुम्हें देने को।

मेरे शब्द ही मेरी पूंजी है
इन्हें मैं तुम्हें सौंपता हूँ
तुम्हारी मूक व्यथा को
मेरे शब्द व्यक्त करेंगे
तुम्हारी जिजीविषा को
ये जिन्दा रखेंगे
जब-जब तुम असमर्थ होंगे
तब-तब तुम्हें सामर्थ्य देंगे

मेरे ये शब्द!
तुम्हारी गाथा कहेंगे
तुम्हारे जज़्बे को जज़्बात देंगे
तुम्हारे पुरखों की सौगात देंगे
मेरे ये शब्द तुम्हें आवाज़ देंगे
मैं रहूँ या न रहूँ
ये सदैव तुम्हारा साथ देंगे।

तुम्हारे एकाकीपन में
तुम्हारे दुःख या सुख में
जब तुम थकन से चूर होंगे
तब ये लोरी बनेंगे
तुम्हारे श्रम के गीत बनेंगे
जब तुम्हें तुम्हारे अधिकारों से
वंचित किया जायेगा
तब ये हथियार बनेंगे
तुम घबराना नहीं
तुम लड़ना
मेरे शब्द
तुम्हे हौसला देंगे।

जब भी तुम आहत होंगे
ये मरहम बनेंगे।
मैं इन शब्दों में ही ज़िन्दा रहूँगा
तुम्हारे साथ हर पल, हर घड़ी
कंधे से कन्धा मिलाकर चलूँगा
वक़्त मुझे छीन सकता है तुमसे
मगर मेरे शब्द नहीं
मैं ये शब्द तुम्हें सौंपता हूँ।


- दीप प्रकाश

रचनाकार परिचय
दीप प्रकाश

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