प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
जनवरी 2017
अंक -52

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम

कहानी- मिट्टी

"अब ऐसे मुँह फुलाए बैठने से क्या होगा पिताजी? कुछ तो जवाब दीजिए।"
"…"
"वैसे भी उस ज़मीन में रखा ही क्या है? हमारे बचपन में थी उपजाऊ लेकिन अब तो बंजर ही है। उसमें सिवाय मिट्टी के और कुछ नहीं है...और मिट्टी की कोई कीमत नहीं होती, यह आप अच्छी तरह जानते हैं फिर उसे कलेजे से चिपकाए बैठे रहने में कौनसी समझदारी है?"
"पर बेटा..."
"बस यही जो 'पर' है न यही आपको आगे की नहीं सोचने देता है...मैं तो पहले ही कितनी बार कह चुका हूँ कि बेचो यह ज़मीन, घर, खेत और चलो मेरे साथ शहर। मेरा इतना बड़ा बंगला है उसी में चलकर रहो लेकिन आप हैं कि...यहाँ अकेले पड़े हुए हैं...आखिर अब बचा ही क्या है इस गाँव में? अम्मा तो पहले ही..." राजेश का गला भर आया किन्तु खुद को सम्हालते हुए वह आगे बोला, "कल मेरे साथ कुछ अफसर आएँगे मुआयना करने। आपको कुछ बोलने या कहने की ज़रूरत नहीं है," कहकर वह बाहर आया और अपनी जीप में बैठकर शहर की ओर चला गया।


हरदयाल चारपाई पर मुँह मोड़े लेटा रहा। राजेश के मुँह से निकले 'पिताजी', 'आप' जैसे शब्द उसके कलेजे को वेध रहे थे। न जाने कैसे उसके मन में यह बात बैठ गयी थी कि यह 'आप', 'जी', 'बैठिए', 'आइए' जैसे शब्द परायों से कहे जाते हैं। उनसे कहे जाते हैं जिनसे कोई अपनापन नहीं होता... 'तो क्या उसका अपना बेटा भी अब पराया हो गया है। हाँ, शायद हो गया है तभी तो यह घर, गाँव, खेत, अपनी मिट्टी से उसे कोई लगाव नहीं रहा।' हरदयाल की सजल आँखों में आए आँसुओं में उसकी हँसती-खेलती गृहस्थी तिरने लगी।
नन्हा राजेश हरदयाल के पीछे-पीछे खेत में काम करता। अपने नन्हें-नन्हें हाथों से उसे रोपाई, गुड़ाई जैसे काम करता देख हरदयाल और उसकी पत्नी दुलारी फूले नहीं समाते। गीली मिट्टी पर पैर पड़ते ही राजेश का पाँव फिसल जाता। वह मिट्टी में गिर जाता और हँसते-हँसते मिट्टी में लोटने लगता। रोटी खाते हुए राजेश अपनी तोतली भाषा में अक्सर हरदयाल से कहा करता, "पिता! जब मैं बला हो दाऊँगा तो औल बला थेत खलीदूँगा। फिल हम तेत्तर भी खलीदेंगे।" उसकी तोतली भाषा और अपने खेतों के प्रति उसका लगाव देखकर दोनों पति-पत्नी गद्गद हो उठते, उनकी आँखें भर आतीं और मुँह भर-भर अपने लाल के लिए दुआएँ निकलतीं। दोनों ईश्वर को धन्यवाद देते कि उनका बेटा अपने गाँव और खेत से अभी से इतना प्यार करता है, वरना उनकी रिश्तेदारी और गाँव के न जाने कितने परिवारों के लड़कों ने अपने खेत, ज़मीन, घरबार सब बेच दिया और शहर में जाकर बस गए।


उस साल राजेश दसवीं कक्षा में अव्वल आया। गाँव के स्कूल के मास्टर साहब ने घर आकर उसकी पीठ थपथपाई और हरदयाल से राजेश को शहर भेजने की बात कही। हरदयाल मुँह लटकाए बैठा रहा किन्तु बधाई देने आए  गाँव के बुजुर्गों ने भी उसे समझाया कि शहर जाकर ऊँची पढ़ाई करके राजेश गाँव का भला ही करेगा। राजेश की समझदारी के चर्चे पहले से ही गाँव भर में होते रहे थे। सबको यही आशा थी कि राजेश गाँव का नाम अवश्य रोशन करेगा। इसी आशा और विश्वास के साथ भारी मन से हरदयाल राजेश को आगे की पढ़ाई के लिए शहर भेजने के लिए तैयार हो गया।
राजेश शहर चला गया और अपनी पढ़ाई में लग गया। मास्टर साहब के सुझाव के आधार पर ही राजेश ने कृषि विषय लेकर आगे की पढ़ाई शुरु कर दी। इधर हरदयाल और दुलारी उदास और भारी मन से अपने काम में लग गये। राजेश ने इंटर किया और फिर आगे की पढ़ाई करने के लिए राजकीय कृषि विश्वविद्यालय में प्रवेश ले लिया। इस बीच वह गाँव आता और कृषि सम्बन्धी पढ़ी-पढ़ाई बातें करके, फसलों की बातें करके, मिट्टी के गुण-दोष की बातें करके सबको चमत्कृत कर देता। उसकी ऐसी बातें सुनकर न केवल हरदयाल और गाँव के लोगों का भी मुँह खुला का खुला रह जाता। हरदयाल और उसकी पत्नी पूरी तरह आश्वस्त हो चुके थे कि उनका बेटा एक पढ़ा-लिखा किसान बनेगा और अपनी बुद्धि से खेती की नई-नई तकनीकों का प्रयोग करेगा। राजेश ने भी अपनी पढ़ाई में कोई कसर नहीं छोड़ी। एम. एससी. करने के बाद उसने कृषि में ही शोध किया। उसका शोध राष्ट्रीय स्तर पर सराहा गया। पढ़ाई में तो वह अच्छा था ही साथ ही उसे आरक्षण का भी पूरा लाभ मिला और वह उसी विश्वविद्यालय में कृषि वैज्ञानिक बन गया।


'किन्तु इतना पढ़ने-लिखने के बाद वह अपनी ही ज़मीन बेचने की बात कह रहा है', यह सोच-सोच कर हरदयाल का दिल बैठा जा रहा था। हरदयाल ने सपने में भी नहीं सोचा था कि उसका अपना बेटा जो खेत की मिट्टी में लोटा-लोटा फिरता था। खेत को बढ़ाने की बात करता था, वह कृषि वैज्ञानिक बनने के बाद अपनी ही ज़मीन बेचेगा?
हरदयाल के पास कुल दस बीघा जमीन थी, जो उसके बाप-दादा के समय से चलती चली आ रही थी। उसकी जमीन की विशेषता थी कि पूरे गाँव में सबसे ज्यादा उपजाऊ और सड़क के किनारे थी। उसे याद है कि उसके पिता ने आँखें मूँदते हुए कहा था कि 'यह ज़मीन नहीं, माँ है बेटा। इसकी रक्षा अपनी जान से भी ज्यादा करना। किसी भी हालत में इसे न बेचना और न ही इसके टुकड़े होने देना।' अपने पिता की बात को गाँठ बाँधकर हरदयाल ने इसी ज़मीन से न केवल घर का खर्चा चलाया बल्कि अपनी दोनों बहनों और बेटी का विवाह भी किया। दुलारी की बीमारी और राजेश के शहर के खर्चों में भी उसने कुछ न कुछ जोड़-गाँठ करके धन की व्यवस्था की किन्तु ज़मीन को बेचने की बात उसके मन में कभी नहीं आई। दुलारी के गुज़र जाने के बाद खेत, जमीन और घर को बाँधकर रखने वाला वही अकेला धागा था। उसे पूरी उम्मीद थी कि अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद राजेश यहीं गाँव में आकर रहेगा और अपनी खेती सम्हालेगा किन्तु आज राजेश ने जो कहा उससे उसकी उम्मीद की माला टूट गई। उसके सपने टूटी माला के मोती समान बिखर गए।


हरदयाल ने देखा कि अँधेरा हो चुका है और राजेश भी कब का जा चुका है। खाट से उठकर उसने दिया-बत्ती की और जैसे-तैसे भारी कदमों से रसोई की ओर चल दिया। मटके से पानी निकाल कर पिया और वापस आकर अपनी खाट पर बैठ गया। लेकिन उसे चैन नहीं पड़ रहा था। उसे बार-बार आने वाले कल की बात याद करके घबराहट हो रही थी। उसे अपना खेत, अपने पिता, अपने दादा, दुलारी सबकी याद आने लगी, 'उन सबकी राख भी तो इसी खेत की मिट्टी में मिली है। हाय, मेरा खेत सिर्फ मिट्टी...कल मेरा खेत...नहीं नहीं...' वह खाट से उठा और तेज़ कदमों से खेत की ओर चल दिया। रास्ते भर उसके मन-मस्तिष्क में राजेश की बातें बार-बार गूँजती रहीं।
"पिताजी! मैं सरकारी वैज्ञानिक हूँ। शहर में मेरा रुतबा है। मुझे बहुत बड़ा साफ-सुथरा बँगला मिला हुआ है। बड़े-बड़े अफसरों से मेरी पहचान है। उनके साथ उठना बैठना है। आपको क्या लगता है, मैं अपनी सरकारी नौकरी छोड़कर इस पिछड़े और गन्दे गाँव में आकर रहूँगा? जहाँ लोगों को बोलने तक की तमीज़ नहीं है। समय का महत्त्व नहीं जानते। सैकड़ों-हजारों साल पुराने रीति-रिवाजों के अस्थिपंजर अपने ऊपर ढो रहे हैं, जिनका न कोई वैज्ञानिक महत्त्व है न कोई आधार। ऐसे मूर्खों के बीच रहकर मैं अपना जीवन बरबाद नहीं कर सकता। वैसे भी अब रखा ही क्या है यहाँ...मैं तो कहता हूँ मौके का फायदा उठाइए। सरकारी योजना के अन्तर्गत जो बाईपास बन रहा है, वह अपने ही गाँव से होकर गुजरेगा। हमारी ज़मीन तो वैसे भी सड़क के किनारे है। हम बाईपास को अपने खेत की तरफ से गुजार देंगे हालाँकि उसका रास्ता अलग है लेकिन अफसरों से मेरी साठ-गाँठ और आरक्षण का लाभ तो उठाना ही चाहिए। बस पिताजी आप सरकारी काम में बाधा मत डालिएगा। जो भी अफसर जमीन और खेत देखने आएँ, उनके सामने चुपचाप खड़े रहिएगा। बाकी काम मैं करवा लूँगा। अरे! बहुत मोटा मुआवजा मिलेगा पिताजी; आप सोच भी नहीं सकते।"


अगले दिन की बात याद करके हरदयाल का दिल घबराने लगा। अँधेरे में कच्चे-पथरीले रास्ते पर यहाँ-वहाँ पड़ते उसके पैर छिल गए। उनसे खून निकलने लगा लेकिन वह बदहवास-सा अपनी सुध-बुध खोए खेत की ओर बढ़ता जा रहा था। लहुलुहान पैरों से वह अपने खेत में पहुँच गया। मेड़ पर बैठकर बहुत देर तक अपने खेत के कोने-कोने को निहारता रहा। उसका दिल कह रहा था कि 'काश! इस रात की सुबह न हो।' खुली आँखों से वह सपना देखने लगा। उसे लगा कि उसके खेत में बुल्डोजर चल रहा है और खेत से चीखने-चिल्लाने की आवाजें आ रही हैं। खून की धाराएँ बह रही हैं। उसे लगा कि एक क्षत-विक्षत शरीर उसके सामने हाथ जोड़कर अपने प्राणों की भीख माँग रहा है और वह असहाय-सा खड़ा सबकुछ देख रहा है। राजेश चारों ओर खड़े हुए अफसरों के साथ ताली बजा बजाकर हँस रहा है। उसका मन कर रहा था कि वह अपने खेत की मिट्टी से लिपट कर इतना रोए कि उसके आँसुओं की गर्मी से उसका शरीर पिघल जाए और उस मिट्टी में मिलकर एकाकार हो जाए। यह सब उसके दिमाग में चल ही रहा था कि न जाने उसके अन्दर कैसी बिजली दौड़ी कि वह अपने खेत में भागने लगा। खेत के जिन कोनों में अब तक वह अपनी आँखें दौड़ा रहा था, अब वह खुद दौड़ रहा था। हरदयाल पागलों की तरह अपने खेत की मिट्टी में यहाँ से वहाँ तक, इस कोने से उस कोने तक कब तक दौड़ता रहा कुछ नहीं पता।

सुबह जब राजेश अफसरों के साथ खेत में आया तो देखा कि पागलों-सी सूरत और हालत में हरदयाल बेसुध-सा मिट्टी में सना खेत के बीचों-बीच पड़ा है। राजेश ने उसे देखते ही अफसरों को सुनाते हुए कहा, "देख रहे हैं न सर! अब इनसे न तो कोई काम होता है न ही खेती बाड़ी। सुबह आए होंगे खेत पर और कमज़ोरी के कारण गिर पड़े। मैं भी शहर में ही बस चुका हूँ। यहाँ आकर खेत-ज़मीन देखना मेरे बस की बात नहीं। वैसे भी मेरे पास अब इतना वक्त ही कहाँ है...और यहाँ इनकी देखभाल करने वाला भी कोई नहीं है। बस इसीलिए मैं चाहता हूँ कि यह खेत और ज़मीन बाईपास में आ जाए और..." कहकर उसने जो इशारा अफसरों को किया, उससे सब-के-सब ठहाका लगाकर हँसने लगे। ठहाका इतना ज़ोर का था कि उसकी गूँज पूरे खेत में फैल गई लेकिन हरदयाल के कानों तक नहीं पहुँची। उस पर कोई फर्क नहीं पड़ा। वह वैसे ही बेसुध पड़ा रहा। राजेश ने हरदयाल को उठाया और सड़क पर खड़ी अपनी जीप में बैठा लिया। हरदयाल ने उसकी ओर ऐसे देखा जैसे उसकी बलि दी जा रही हो और वह अपने प्राणों की भीख उससे माँग रहा हो। लेकिन भावनाशून्य राजेश ने उसकी आँखों पर ध्यान नहीं दिया और वापस खेत में आकर उन अफसरों से बातचीत करने लगा। हरदयाल का मन हुआ कि वह जीप से कूद जाए और राजेश के पैरों से लिपट जाए और उससे विनती करे कि उसकी माँ को मत उजड़ने दो। उसकी माँ के शरीर पर बुल्डोजर मत चलने दो।

राजेश अफसरों के साथ जीप में बैठ गया। सभी खुश थे। शायद मामला तय हो चुका था। जीप धीरे-धीरे चलने लगी। जीप में पीछे बैठे हरदयाल की आँखें अब भी खेत की ओर लगीं थीं। उसे अब भी लग रहा था कि खेत में खून की धाराएँ बह रही हैं। लहुलुहान खेत हाथ जोड़े उससे विनती कर रहा है। अचानक हरदयाल जीप से कूद पड़ा और लड़खड़ाता हुआ खेत की ओर भागा। ड्राइवर ने जीप रोक दी। राजेश 'पिताजी', 'पिताजी' कहता हुआ हरदयाल को पकड़ने के लिए तेज़ कदमों से चला लेकिन हरदयाल चीते की सी फुर्ती से दौड़ता हुआ अपने खेत की मिट्टी में जाकर गिर गया। जब तक राजेश उसे उठाने पहुँचता तब तक हरदयाल की मिट्टी उसके खेत की मिट्टी में मिल चुकी थी।


- डॉ. लवलेश दत्त
 
रचनाकार परिचय
डॉ. लवलेश दत्त

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