दिसम्बर 2016
अंक - 21 | कुल अंक - 54
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

ऊपरी चक्कर

मैं जब भी प्यार लिखती हूँ,न हीर याद आती है न सोहनी याद आती है। याद आती भी है तो पंजाबन अमृता। समय से आगे की सोच वाली, उन्मुक्त विचारों की अमृता। सालों से किताबों में तलाशती रही हूँ उसे। बहुत बार बुक फेयर में चक्कर लगाये और हर बार ढूंढकर लायी मैं अमृता को । आज न तो कोई बुक फेयर की चकाचौंध है, न किसी बुक स्टाल से वापिस आई ....रोजाना की तरह कॉलेज से थककर लौटी थी। सोफे पर लेटी गूगल पर तलाश रही थी उसी अमृता को, जिसने उस दौर में प्यार के शाश्वत रूप को जिया।कितने पात्रों को अपने चश्मे से देखती होगी अमृता, फिर अपनी कल्पनाओ की स्याही में रंग कर ढाल देती होगी कोई कहानी।

 

'जंगली बूटी', हाँ यही नाम था अमृता की प्रेमकथा का .....क्या कल्पना कि नायिका के कोरे मन में बसाई उसकी माँ की बात, कि वो औरत ही प्यार कर बैठती है, जिसे कोई मर्द पान या बर्फी में जंगली बूटी खिला देता है .....बावरी हो जाती है बावरी ....इसीलिए नायिका ने कभी किसी के हाथ से पान नहीं खाया और बर्फी भी ...मगर उस चौकीदार के साथ चाय पी थी .....जिसे पी कर ही प्रेम रोग लग गया .....उस गाँव की गोरी ब्याहता को .....अमृता की नायिका को पढ़कर मुझे भी याद आ गयी सुनीता की। साँवली मगर तीखे नैन-नक्श वाली वो दुबलचि लड़की मेरे घर काम करने आती थी। मैं ये लड़की वड़की को काम पर रखती नही थी, मगर मजबूरी पड़ गयी। मेरी मेड पन्द्रह दिन की छुट्टी पर गयी थी, सो पड़ोस की ठकुराइन आंटी से कहा। उन्होंने अपनी कामवाली इसी सुनीता को मेरे पास भेज दिया। साथ में बता भी दिया, लड़की ईमानदार है मगर कुछ ऊपरी चक्कर से परेशान है।

 

सुनीता रोज समय से काम पर आती, मुस्कुराती, खूब बातें करती मुझसे। मुझे बहुत पसन्द आ रहा था उसका काम। पन्द्रह दिन बीते होंगे, मेरी पुरानी मेड वापिस आ गयी मगर मैंने सुनीता को हटाया नहीं। उसकी सुघड़ता देख के मैंने उसे अपने और कामो में लगा लिया कपड़ों की तह लगाना, कपड़े धोना वगैरह शाम की चाय वो मेरे साथ पीती थी। एक रोज सुनीता घर आई तो कुछ उदास-सी थी।मैनें पूछ लिया, "क्यों री क्या हो गया?" "कुछ नहीं भाभी जी, आज कुछ तबियत ठीक न है", सुनीता बोली। मैंने कहा, अच्छा काम को रहने दो, चलो चाय बना लो। बस अभी वो चाय बना के लायी ही थी, अचानक उसकी माँ आ गयी। सुनीता से बोली "चलो जल्दी, नहीं बाबा का टाइम हो जाएगा।" मैंनें जिज्ञासा में पूछा "बाबा, कौन बाबा?" उसकी माँ ने बताया, "कच्ची गली में मजार है, वहां एक बाबा बैठते हैं वो जब इसको दुआ पढ़ के दे देते हैं, तब ये सही रहती है वरना इसको हमारे मोहल्ले के एक लड़का है मुशीर, उसने जाने का खवाय दिया है तबसे बौराई है उसके पीछे।" सुनीता माँ के साथ चली गयी।

 

दूसरे दिन बिलकुल चैतन्य हो के घर आई, फुर्ती से काम निपटाया। उसे देख मैं भी सोचूँ, "वारे बाबा जी, बड़ा बढ़िया मन्तर मारा।"...मुझे सुनीता में इंट्रेस्ट-सा होने लगा। मैं उससे खूब बातें करती थी। बातों-बातों में उसकी राम कथा जो पता चली वो ये थी कि सुनीता का काफी अरसे से मुशीर से प्रेम प्रसंग चल रहा था। मगर विधर्मी होने के कारण उसके घरवालो को स्वीकार्य न था। आनन- फानन सुनीता की शादी एक अपनी जाति के लड़के से उसके घर वाले तय कर देते हैं, मगर वो ससुराल में रहना नही चाहती थी। ऐसे में मायके रहने के लिए वो क्या करती। एक दिन उसने तरह-तरह की नाटकबाजी की। पति और उसके घरवाले इत्ता घबरा गए कि इस पर कोई जिन्नात का साया है और बस चौपाल लगा के सुनीता को उसके दान दहेज के साथ उसके मायके भेजने का आर्डर निकलवा लिया। अब सुनीता मायके में अपने ऊपरी चक्कर को लिए अपने पूर्व प्रेमी से मुलाकातें करती है। इश्क के रंग में रंगी घूमती, अनपढ़ सुनीता का यूँ प्यार के लिए बावरा होना और उस प्यार को पाने के लिए उपाय तलाश लेना.....मुझे जब याद आता है तब तब मुस्कुरा जाती हूँ।


- वत्सला पाण्डेय

रचनाकार परिचय
वत्सला पाण्डेय

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