प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
दिसम्बर 2016
अंक -53

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम

कहानी- ऑफिस वाला प्यार

कम्प्यूटर पर टिकी निगाहें, तल्लीनता से काम करते हाथ, मल्टीनेशनल कम्पनी के एक ऑफिस में है हम।
कॉर्नर सीट पर बैठे एक युवक की निगाहें कहीं और ही हैं, वो सामने वाली सीट पर।
सारिका नाम है उसका, पूरे ऑफिस में वही हिंदुस्तानी नारी दिखेगी, सलवार सूट, लंबी चोटी, झुकी नज़रें।
आज के दौर में इसे सीधापन कहा जाता है। यही बात उसे सबसे अलग करती थी। और फिर बेस्ट एम्प्लॉयी की लिस्ट में उसका नाम सबसे ऊपर। समझदार पर खामोश लड़की। कई राज़ ख़ामोशी में छुपाए रहती थी। बस इसीलिए तो पसंद आ गई हमारी कहानी के हीरो को।
हीरो, हाँ हीरो ही है वो। सुन्दर कद काठी, लड़कियो में चर्चित, पर मस्तमौला- विशाल।
विशाल अपने हमउम्र बॉस से सेटिंग करके हमेशा सारिका और उसका नाम एक ही प्रोजेक्ट में लिखवाता ताकि उसे ज्यादा से ज्यादा वक्त मिले सारिका को देखने का, परखने का, जानने का और उसकी खामोश निगाहों को पढ़ने का।


ऐसा ही एक दिन ऑफिस में, सारिका  प्रोजेक्ट के कुछ काम से विशाल के पास आती है और हिंदी फिल्मों के जैसे विशाल के चारों तरफ मानो वायलिन बजने लगते हैं। सारिका को आता देख कंप्यूटर पर ऐसे बिजी हो जाता है, जैसे उसने देखा ही न हो।
सारिका- "सर सुनिए"
विशाल- "ओह! सारिका जी, आप कब आई? बैठिए।"
"जी मुझे बैठना नहीं है, आपसे बस कुछ पूछना है।"
"हाँ, वो हम करते हैं न बात, बैठिये तो सही।"
विशाल के इतना कहने पर सारिका ने बैठकर डिस्कस किया। विशाल का दिल चाहता ही नहीं था कि सारिका वहाँ से जाए, पर लंच ब्रेक हो गया।
ओके, आफ्टर लन्च, कंटिन्यू करते हैं कह कर विशाल का मन डिंग-डाँग करने लगा कि आज तो कुछ और बात करके रहूंगा। लंच के बाद सारिका आई ही नहीं, विशाल के पूछने पर पता चला कि वो हाफ-डे लेकर चली गयी। उसका कोई रिलेटिव एडमिट हुआ था इसलिए।


अगले दिन भी सारिका नहीं आई। तब विशाल से सब्र न हुआ और उसने कॉल कर लिया। लेकिन कॉल लगते ही दिल की धक-धक बढ़ गयी कि क्या बोलूँगा, और कॉल काट दिया। ना कोई कॉल बेक आया, ना कोई कॉल किया गया, बस सस्पेंस में चली गयी स्टोरी।
लगभग दस दिन बाद सारिका आई ऑफिस, वो दिन कोई साधारण दिन नही था। उस दिन विशाल तो हाफ आवर पहले ही ऑफिस आ गया था। बन-ठन के, ख़बर जो थी कि वो आएगी आज, पर बेख़बर था एक बात से कि आज सारिका का बर्थडे है। जब सबने विश किया तो पता चला। सारिका बड़ी सादगी के साथ बर्थडे मनाती है, ना कोई पार्टी, ना दिखावा।
अगले दिन ऑफिस में कोई पार्टी थी। सब बिजी रहे। सारिका को बस विश कर पाया विशाल। मलाल रह गया कि काश कुछ कर पाता स्पेशल।
पार्टी वाला दिन, रौनक ही रौनक और ये क्या वो आ गयी। आज भी उसी सादगी से, येलो सूट में शर्माती हुई। न मेकअप, ना हाई हील, हाँ, खुले बाल में उड़ती तितली लग रही थी। सबसे हेल्लो करती हुई, विशाल की तो नज़रें ही थम गयी हैं।
पार्टी में एक सरप्राईज था, विशाल का गिटार के साथ गाना, ये वाला "सावंली-सी एक लड़की...धड़कन हो जैसे दिल की...।"


सारिका बेखबर थी उसके प्यार से। बस इम्प्रेसड थी सिंगिंग से। शाम को पार्टी के बाद सारिका को उसकी ऑफिस दोस्त वंदना का फोन आया, उसने आखिर कह ही दिया, "सारिका, तुम्हारे लिए ही तो था वो गाना। सब समझ गए, बस तुम ही नहीं समझी।"
इतना सुनते ही सारिका को गुस्सा आ गया। कॉल किया विशाल को और बोल दिया, "देखिये मिस्टर विशाल, मुझे इस तरह का मज़ाक बिल्कुल पसंद नहीं है। आपकी हिम्मत कैसे हुई मेरे लिए ऐसा गाना गाने की, मुझे लगता था आप एक अच्छे इंसान है पर आप भी वैसे ही हैं और लड़कों जैसे फ्लर्टी। मैं कोई इस टाइप की लड़की नहीं हूँ समझे! आज के बाद ऐसी कोई हरकत मत करना वरना मुझसे बुरा कोई नहीं होगा।"
बेचारा विशाल चुपचाप सुनता रहा फिर अंत में ओके बोलने का वक्त भी नहीं मिला, सारिका ने कॉल काट दिया था।
अगले दिन, सारिका को लग रहा था कुछ ज्यादा ही बोल दिया और विशाल ढेर सारे पेज पर सॉरी लिख के लाया था। अब आते जाते कोई न कोई सॉरी वाला पेज सारिका के सामने भेज रहा था।
आखिर सारिका से रहा नहीं गया और बोलने आयी विशाल की सीट पे, "क्या है ये, एक तो ग़लती करते हो फिर नया ड्रामा...।"
विशाल ने सोच लिया था कि आज बोल के रहेगा। बस, बैठ गया घुटनों के बल, रोमेंन्टिक अंदाज में, और बोल ही दिया...ना वो तीन शब्द नहीं..ये बोला-


"गुनहगार हैं हम तो सज़ा दे दीजिए
यूँ बेरुखी करके जान न लीजिए
माफ़ी दे के बन जाइए ख़ुदा आप
बंदे को अपना ग़ुलाम रख लीजिए"

फिर क्या था, सबने तालियां बजा दीं और सारिका निस्तब्ध-सी होकर हल्की-सी मुस्कान लिए चली गयी अपनी सीट पर। जो आज हुआ उससे सारिका समझ गयी कि विशाल उसे पसंद करता है और उधर सारिका की दोस्त ने शाम को दोनों की मीटिंग रखवा दी...न नाश्ते वाली नहीं...प्रोजेक्ट वाली।
क्योंकि वो जानती थी सारिका नाश्ते वाली मीटिंग में आएगी ही नहीं।


शाम को दोनों आ गए राईट टाइम, पर वंदना नहीं आई। कॉल किया तो बोली, "तुम दोनों बना लो रिपोर्ट।"
वो समझ गए, वंदना क्या चाहती है। मुस्कुरा के कॉफी आर्डर की और काम में लग गए। हाँ, बैकग्राउंड मे सांग चल रहा था।
"प्यार हुआ, चुपके से। ये क्या हुआ, चुपके से।"


- डॉ. शिल्पा कुमरावत
 
रचनाकार परिचय
डॉ. शिल्पा कुमरावत

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कथा-कुसुम (1)