दिसम्बर 2016
अंक - 21 | कुल अंक - 54
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम

कहानी- आशियाना

शिप्रा ने अपना ट्रांसफर राजस्थान के अलवर शहर में करवा लिया था। पति की अचानक सड़क-दुर्घटना में हुई मृत्यु ने उसको हिलाकर रख दिया था। अभी छह महीने ही तो हुए थे शादी को। एक-दूसरे से पहचान होकर प्यार पनपना शुरु हुआ ही था अभी, और दु:खों का पहाड़ टूट पड़ा था उस पर।
ससुराल वालों ने तो उसकी तबीयत ख़राब होने का बहाना बनाकर भैया-भाभी के पास छोड़ दिया था उसे। कब तक रहती वहाँ। शादी न होने पर भैया-भाभी कितने परेशान थे उसकी बढ़ती उम्र से, और शादी हो जाने पर अपने उत्तरदायित्व से  मुक्त होकर कितने ख़ुश हो गए थे वे। दुबारा बोझ बन जाती क्या उन पर?


अलवर में ऑफिस के पास छोटा-सा घर ले लिया उसने किराए पर। ऑफिस में समय किसी तरह बीत जाता था पर वापिस आकर समय बिताना भारी पड़ जाता था उसे। अक्सर वह बालकनी में आकर खड़ी हो जाती और आते-जाते लोगों और खेलते हुए बच्चों को देखकर जी बहला लिया करती थी अपना।
आज चाय पीते हुए कॉलेज के पुराने दिन याद आ रहे थे उसे। ऑफिस से लौटते समय उसने पालक के पकौड़े खरीदे और घर लौटकर अदरक की चाय बनाई। अपने लिए रात का खाना बनाने का मन ही नहीं करता था उसका। इसलिए शाम की चाय के साथ ही कुछ खा लेती थी। अदरक की चाय से यादें जुड़ी हुईं थीं कॉलेज की।
कॉलेज में सब जब चाय पीने जाते थे तो आकाश चाय वाले से अदरक की चाय ही बनवाता था। नादिर अक्सर उसे छेड़ते हुए कहता, "तेरी पत्नी कुछ और लाए या न लाए,  दहेज़ में अदरक की बोरी ज़रूर लेकर आएगी साथ, नहीं तो तू भगा देगा उसे।" फिर आकाश के गुस्से से भरे चेहरे को देख ठहाका मारकर हँस पढ़ता था। सब जानते थे कि आकाश दहेज़ के नाम से कितना चिढ़ता है।


चाय के घूँट भरते हुए शिप्रा बालकनी में आ गई। नीचे झाँका तो एक ट्रक से घर का सामान उतर रहा था। "लगता है नीचे वाले मकान में कोई आया है। चलो अच्छा हुआ , खाली मकान देखकर डर लगता था।" शिप्रा ने राहत भरी साँस लेकर अपने आप से कहा।
"सामान देखकर लग रहा है कि परिवार बड़ा नहीं होगा, शायद पति-पत्नी और छोटे बच्चे, चलो पता लग ही जाएगा।" होने वाले पड़ोसी के विषय में कल्पना करती हुई वह सोच रही थी।
ट्रक से सामान निकलना शुरू हुआ ही था कि एक सफ़ेद रंग की कार आकर रुकी। पूरी बाज़ू की तांबई रंग की कमीज़ के साथ लाल टाई लगाए एक सज्जन उतरे। उनके चलने के अंदाज़ को देखकर एक बार तो शिप्रा भौंचक्की ही रह गई। "ये क्या....आकाश?....नहीं, नहीं आकाश तो बहुत दुबला-पतला था। मैं भी न....अदरक की चाय पी ली तो क्या हर व्यक्ति आकाश ही नज़र आएगा मुझे।" सोचकर वह हल्का-सा मुस्कुराई फिर गुमसुम-सी हो गई।
कितना प्यारा दोस्त था आकाश! दोस्त से कुछ ज़्यादा ही हो जाता शायद। पर दोनों अपने मन की झिझक के दरवाज़े न खोल सके और दोस्ती के दायरे में ही सिमट कर रह गया उनका रिश्ता।


अनमनी-सी शिप्रा भीतर आकर टी.वी. पर समाचार देखने बैठ गई। तभी डोरबैल बज उठी। "इस समय कौन होगा? काम वाली बाई तो शाम को आने को मना कर गई थी।" सोचते हुए वह दरवाज़ा खोलने चल दी। दरवाज़ा खोलते ही उसका मुँह आश्चर्य से खुला रह गया। "आकाश तुम.... !!" वह ज़ोर से चिल्लाई।
"शिप्रा....!" आकाश उसे देखते ही पहचान गया। उसके चेहरे पर दोस्ती का वैसा ही मीठा-सा अहसास दिख रहा था, जैसा कई सालों पहले तक था।
आकाश के घर में पानी नहीं आ रहा था। वह जानना चाहता था कि यह समस्या उसके घर की है या उस बिल्डिंग में किसी के घर भी पानी नहीं आ रहा। सीढ़ियाँ चढ़ते ही उसे शिप्रा का घर दिखाई दिया तो घंटी बजा दी थी उसने। शिप्रा ने छत पर जाकर आकाश के घर की ओर जा रहा पाइप देखा। उसमें लगा हुआ वॉल्व बंद था, जिसके कारण पानी आकाश के घर नहीं जा पा रहा था। शिप्रा ने वह खोल दिया। दोनों नीचे वापिस शिप्रा के घर आ गए। नीचे आकर शिप्रा ने दो कप अदरक की चाय बनाई। दोनों ने चाय और पकौड़ों का आनंद लिया और आकाश कुछ देर बातें करके वहाँ से चला गया।


शिप्रा ने भाँप लिया कि आकाश चहकने की पूरी कोशिश कर रहा था पर कहीं निराशा पसरी हुई थी उसके अंदर। सुख-दुःख की साथी शिप्रा उसके बारे में जानने को व्याकुल हो उठी।
अगले दिन ही वह ऑफिस से सीधा आकाश के घर पहुँच गई। आकाश भी ऑफिस से लौटा ही था। शिप्रा सोच रही थी कि अभी सामान फैला होगा। किंतु उसे देखकर आश्चर्य हुआ कि घर में लगभग सारा सामान लग चुका था। आकाश ने शिप्रा को बैठने के लिए कहा और नौकर को चाय बनाने का आदेश देकर कपड़े बदलने चल दिया।
"आकाश की पत्नी दिखाई नहीं दे रही। कहीं ऐसा तो नहीं कि वह मुझे मन ही मन इतना चाहता था कि शादी ही न की हो! या फिर मकान बदलते हुए उसे कहीं और छोड़ दिया है?" शिप्रा इसी उधेड़बुन में थी कि नौकर चाय लेकर आ गया और आकाश भी कपड़े बदलकर वहाँ आकर बैठ गया।


शिप्रा ने पहला सवाल बिना किसी झिझक के उसके परिवार के विषय में पूछ लिया। आकाश के बारे में जानकर शिप्रा को बहुत दुःख हुआ। आकाश का विवाह हुए दो वर्ष बीत चुके थे। अपनी पत्नी से बहुत प्रेम करता था वह। पर आकाश के भाग्य में प्रेम था ही नहीं। उसकी पत्नी विदिशा के अपने बॉस के साथ सम्बन्ध थे। बॉस की पत्नी करोड़पति पिता की इकलौती संतान थी। अतः बॉस उसे छोड़ना भी नहीं चाहता था। विदिशा ने अपने घरवालों के दबाव में आकर ही  आकाश से शादी की थी। बाद में आकाश से पीछा छुड़ाने के लिए उसने आकाश पर दहेज़ के लिए प्रताड़ित करने का आरोप लगाकर मुक़दमा दायर कर दिया था। आकाश जैसे भावुक व्यक्ति के लिए यह सब कितना कष्टप्रद रहा होगा, इसका अंदाज़ा शिप्रा आसानी से लगा रही थी। उसने अपना दुःख भी आकाश को बताया। बहुत दिनों के बाद दोनों को अपना दर्द कुछ हल्का लग रहा था।
उस दिन के बाद जब तक वे दोनों कुछ देर एक-दूसरे के साथ न बैठते तसल्ली नहीं होती थी। सच ही तो है कि दर्द बाँटने से घटता है और खुशियाँ बाँटकर दुगनी होती हैं। अपने दर्द को बाँटते-बाँटते दोनों हर दिन की छोटी-मोटी खुशियाँ भी साझा करने लगे। कॉलेज के पुराने साथी एक बार फिर वही दोस्ती अनुभव करने लगे थे आपस में।


उस दिन शिप्रा को अचानक अपने घर दिल्ली जाना पड़ा। ऑफिस में कुछ सर्टिफिकेट जमा कराने थे और उनमे से एक शिप्रा को ढूँढे नहीं मिल रहा था। कॉलेज से उसकी कॉपी बनवाने के उद्देश्य से ही वह चार दिन की छुट्टी लेकर जा रही थी। आकाश ने शिप्रा को कह दिया था कि वह जल्दी से काम करके लौट आए क्योंकि उसके बिना उसे सूना-सूना लगेगा।
कॉलेज आकर पुरानी यादें ताज़ा होने लगीं। सेक्शन-ऑफिसर ने जब उसे 'आशियाना गर्ल' कहकर संबोधित किया तो मन में एक टीस-सी उठ गयी उसके। कितनी उमंग से रखी गई थी 'आशियाना' नामक संस्था की नींव। आकाश, शिप्रा, यामिनी और नादिर के दिमाग की उपज था आशियाना। इन चारों के नाम के पहले अक्षर से मिलकर ही बना था शब्द- आशियाना। काम भी तो संस्था का आशियाना बनाना ही था। वे सब मिलकर जगह-जगह विभिन्न प्रकार के कार्यक्रमों  का आयोजन करते तथा पैसा एकत्र कर कॉलेज के गरीब कर्मचारियों की बेटियों का विवाह करवाते। लड़के के घरवालों को पहले ही बता दिया जाता था कि दहेज़ जैसी कुरीति से दूरी कितनी आवश्यक है। घर की ज़रूरत भर का सामान देकर छोटे से आयोजन के साथ सम्पन्न हो जाता था विवोहत्सव। संस्था से अन्य विद्यार्थी भी जुड़ने शुरू हो गए थे कि यामिनी की अचानक हवाई-दुर्घटना में हुई मृत्यु ने तोड़कर रख दिया था उन सबको। उनकी संस्था भी इसी निराशा की भेंट चढ़ गई और कॉलेज से दूर होकर सबके रास्ते भी अलग-अलग हो गए।


कॉलेज से सर्टिफिकेट लेकर वह निकल ही रही थी कि रहमान चाचा मिल गए। वे कॉलेज के एक पुराने कर्मचारी थे। वे भी शिप्रा को तुरंत पहचान गए। आशियाना के ऋणी थे वे। उनकी तीनों बेटियाँ 'आशियाना' की बदौलत ही सुखी जीवन-यापन कर रही थीं, वरना बिन माँ की बच्चियों के लिए क्या-क्या करते अकेले रहमान चाचा। शिप्रा को वे अपने घर चलने के लिए कह रहे थे। शिप्रा को भैया-भाभी के पास जाने की जल्दी थी, पर उनके आग्रह को वह टाल न सकी।
चाचा के घर पहुँचते ही उसकी आँखें आश्चर्य से फटी रह गईं। घर के बाहर ‘आशियाना’ लिखा हुआ बोर्ड लगा था, जिस पर चारों साथियों के नाम अंकित थे। एक बड़े से कमरे में कई लोग बैठे थे और कुछ महिलाएँ अपनी समस्याएँ उनको बता रहीं थीं। रहमान चाचा ने शिप्रा की सबसे पहचान करवा दी फिर उसे लेकर दूसरे कमरे में आ गए।


शिप्रा को यह जानकर बेहद प्रसन्नता हुई कि रहमान चाचा के दामाद और सबसे छोटी बेटी सामाजिक कार्यकर्ता हैं। उन्होनें एक सामाजिक संस्था के साथ जुड़कर 'आशियाना' को भी पुनर्जीवित कर दिया है। रहमान चाचा भी सेवानिवृत्त होकर अब उनका साथ दे रहे हैं। उन्होनें यह भी बताया कि नादिर विदेश में बहुत अच्छी नौकरी कर रहा है और समय-समय पर संस्था के लिए पैसे भी भेजता रहता है। रहमान चाचा शिप्रा व आकाश के विषय में जानना चाहते थे। शिप्रा ने अपना दुःख उनके साथ बाँटा और फिर आकाश के बारे में बता दिया उन्हें। आकाश पर दहेज़ माँगने का आरोप लगा है, यह जानकर उन्हें अत्यंत कष्ट हुआ। उन्होनें शिप्रा को सुझाव दिया कि क्यों न उन लोगों से  मिला जाए, जिनका विवाह 'आशियाना' की मदद से हुआ था। वे सब जानते हैं कि आकाश दहेज़ का पुरज़ोर विरोधी था तथा उसने कितने ही दहेज़-मुक्त विवाह करवाए थे। यदि वे सब आकाश के पक्ष में गवाही दें तो शायद वह मुक़दमा जीत जाए।
सुझाव शिप्रा को पसंद आ गया। उसने भाभी को देर से आने के लिए फ़ोन कर दिया और रहमान चाचा के साथ सबसे मिलने चल दी।


सब शिप्रा से यूँ अचानक मिलकर बहुत खुश हुए। सभी ने शिप्रा से आकाश के विषय में जानकर, आकाश का साथ देने का वादा किया। वह उनके फ़ोन नंबर ले आई ताकि समय-समय पर उनसे संपर्क किया जा सके। वापिस अलवर लौटेते समय उसने रहमान चाचा का शुक्रिया अदा किया। उन्होनें भी पूरा सहयोग करने का आश्वासन दिया उसे।
अलवर वापिस आकर शिप्रा ने जब आकाश को सब बताया तो खुशी से उसकी आँखें नम हो गईं। आशियाना का फिर से अपनी सेवाएँ शुरू कर देना और रहमान चाचा का पुराने लोगों से शिप्रा को मिलवाना सब सुखद लग रहा था आकाश को। "सबका साथ मिलने से क्या वह सचमुच दहेज़ के कलंक से मुक्त कर पाएगा स्वयं को?" सोचकर ही उसका हृदय अभिभूत हो रहा था। शिप्रा को इस समय वह एक भोले-भाले बच्चे जैसा लग रहा था।


सचमुच ही सबकी मेहनत रंग लाई। नहीं चली विदिशा की। झूठ की हार हुई और आकाश बरी हो गया सब आरोपों से। रहमान चाचा का वह धन्यवाद करते नहीं थक रहा था।  'आशियाना' ने इस जीत पर एक समारोह का आयोजन किया। शिप्रा और आकाश समारोह के मुख्य अतिथि थे। दोनों को सम्मानित करने के लिए आकाश के माता-पिता को बुलाया गया मंच पर। आकाश के पिता ने मंच पर आकर शिप्रा के भैया-भाभी को कुर्सियों से उठकर मंच पर आने को कहा और घोषणा की कि यह समारोह एक नए जीवन के आरंभ होने की खुशी में है। इसमें चार चाँद लग सकते हैं यदि शिप्रा और आकाश सबकी अनुमति से नए बंधन में बंध जाएँ। शिप्रा के भैया ने यह सुनकर आकाश के पिता को गले से लगा लिया। तालियों की गड़गड़ाहट के साथ शिप्रा और आकाश ने रहमान चाचा द्वारा लाई गईं फूलमालाएँ एक-दूसरे को पहना दीं। जिस 'आशियाना' की नींव उन्होनें रखी थी, वह उनके जीवन में छत बना छाया दे रहा था। "आशियाना अमर रहे" के नारों से सारा वातावरण गूँज उठा।


- मधु शर्मा कटिहा

रचनाकार परिचय
मधु शर्मा कटिहा

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