दिसम्बर 2016
अंक - 21 | कुल अंक - 54
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

गीत-गंगा

गीत- मुंडेर पर झुके-झुके

किसी जगह रुके-रुके, जो दूर तक चले कोई।
तो जान लो कि प्रेम की, डगर पे चल रहा है वो।।

कभी इधर, कभी उधर, फिरे मगर न मन लगे,
हरेक पल विरह लगे, हरेक पल मिलन लगे।
जो आइने के सामने, खड़ा रहे वो देर तक,
अधर से फूल से झरे, नयन में बाँकपन लगे।
मुंडेर पर झुके-झुके, जो दीप-सा जले कोई।
तो जान लो कि मोम की, तरह पिघल रहा है वो।।

कहीं न कोई हो मगर, लगे कि कोई पास है,
भरा-भरा हो मगर, लगे कि शेष प्यास है।
वही हो घर वही मुंडेर, और हों वही छतें,
मगर लगे कि सारा, घर नया-नया निवास है।
हाथ को छिपे-छिपे, जो झाँक कर पढ़े कोई।
तो जान लो मिलन की चाह, में मचल रहा है वो।।

आँख में न नींद हो, मगर लगे की सो रहीं,
याद को कुरेदकर, सपन हृदय में बो रहीं।
इस तरह से रात भर, जो करवटों में ही रहीं,
सोचती नहीं कि चैन, पा रहीं या खो रहीं।
भोर कि पहली किरण पे, मुस्कराये जो कोई।
तो जान लो कि नींद में, है पर सम्भल रहा है वो।।


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गीत- कभी कभी इंसान

कभी कभी इंसान कि
बिल्कुल शांत और सुनसान
कुछ-कुछ परेशान भी है

अंतर में कोलाहल धर
अधरों पर लेकर आहें
जीवन की बस्ती में ये
फैलायी किसने बाँहें
कभी कभी इंसान कि
खाली खंडहर पड़ा मकान
मन से बियाबान भी है

चीजें सब ज्यों की त्यों हैं
पर बदली दृष्टि अकेली
हर उत्तर बन जाता है
चुपके से नई पहेली
कभी कभी इंसान कि
ज्यों विरहिन का रुठा
पीर का इम्तिहान भी है

शब्दों के अधरों पर हैं
ये लाल लाल अंगारे
आँखो के नभ में छाये
आँसू के अनगिन तारे
कभी कभी इंसान कि
उजड़ा हुआ एक उद्यान
सिसकता आसमान भी है


- डॉ. तारा गुप्ता

रचनाकार परिचय
डॉ. तारा गुप्ता

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