दिसम्बर 2016
अंक - 21 | कुल अंक - 54
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कविता-कानन

विद्रोह

मैंने काले घनघोर मेघों से
कभी रास्तों का पता नहीं पूछा
मैंने रेबीज़ से ग्रस्त कुत्तों से
कभी यारी नहीं गांठी
मैंने किसी भगवान के आगे
कभी नहीं किया कोई मन्त्र पाठ
और न ही मांगी
किसी अंधविश्वास के देवता से
कोई जीवनदान की दुआ
मैं धर्म के दलालों को
सदैव जज़िया* देने से इनकारी हुआ
अपनी उम्र के सूर्योदय से लेकर
आज तक
मैं समेटता रहा
रौशनी की एक-एक किरन
अपने विवेक का आहार
मैं दर्ज करना चाहता हूँ
रात के गहरे अँधेरे के ख़िलाफ़
एक मशाल भर विद्रोह

*जज़िया:- इस्लामी शासन में ग़ैर-मुस्लिमों से लिया जाने वाला टेक्स


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एहतिजाज का पोस्टर
(दुनिया भर के शरणार्थियों के नाम)

तुम्हारे घरों पर बोल दिया है
पागल कुत्तों ने धावा
कहीं तानाशाहों के रूप में
तो कहीं आईएसआईएस के
क्रूर आतंकियों के रूप में
जिनकी पीठ थपथपा रहें हैं
साम्राज्यवाद के सफ़ेद भेड़िये
और कट्टरवाद के कायर कौए

एक नाटकीय षड्यंत्र
कुत्तों, कौओं और भेड़ियों के बीच
मानवता को लहुलुहान करने का
प्रागैतिहासिक पाखंडी गुफाओं में
मानव को वापस धकेलने का
अंधविश्वास के गहरे अँधेरे में
फैंक देने का

तुम सब निकल पड़े हो
अपने बचे-खुचे परिवारों सहित
सांस भर जीवन
और आँख भर सपनों को तलाशते
अपने सिरों और कांधों पर
बच्चों भर भविष्य
और आशा-भर पोटलियाँ लिए
सफ़र-भर शंकाएं और सागर-भर डर के साथ,
अतीत-वसंत और वर्तमान-पतझड़ की
यादों के कारवाँ को हाँकते
छाँव-भर आकाश
और बैठने-भर ज़मीन की तलाश में
तुम्हारे साथ ही निकला था ऐलान कुर्दी भी
अपने अब्बू.अम्मी और बड़े भाई के साथ
अपने नन्हे पांव से फलांगता
सीरिया और तुर्की की कंटीली सीमाएँ

तीन वर्षीय ऐलान कुर्दी
जो बीच सागर में डूब कर मर गया
अपनी अम्मी और बड़े भाई के साथ
लाखों अनाम शरणार्थियों के साथ
मानवता के चेहरे पर एक नासूर बनकर
जिसका ओंधे मुंह पड़ा मृत शरीर
और नन्हें जूतों के घिसे तलवे
अल्हड़ लहरों और रेतीले साहिल पर
हम सब के ख़िलाफ़ दर्ज कर गये
एहतिजाज का एक मुखर पोस्टर


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बौखलाहट

उनके डराने का हथियार वही है
पुराना,क्रूर और विष-भरा
इतना ज़रुर है कि वे
डराने के तरीक़े बदलते गये
उन्होंने अंधविश्वास का जाल बुना
और आम लोगों को उसी में क़ैद कर लिया
उन्होंने डर के हथियार से तराश ली
धर्म की काल्पनिक शक्तियों के सैंकड़ों प्रतीक
और असंख्य रचनाओं की पाखण्डी पुस्तकें
आम लोगों को डराने का अंतहीन सिलसिला
डर मांसपेशियों में उभरे गुस्से का दुश्मन है
और गुस्सा ही हर क्रांति का आधार
हर विद्रोह की ऊर्जा
क्रांति पूंजीवाद और साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़
समानता और आज़ादी के हक़ में
क्रांति ब्राह्मणवाद और सादातवाद* के ख़िलाफ़
जातिमुक्त, धर्म-मुक्त-समाज के हक़ में
विद्रोह असहिष्णुता के ख़िलाफ़
हर कलबुर्गी, पानसरे, दाभोलकर
इख़लाक़ और रोहित के हक़ में
विद्रोह हर धार्मिक कट्टरवाद के ख़िलाफ़
विश्व-प्रेम और देश-प्रेम के हक़ में
विद्रोह हर तरह के आतंकवाद के ख़िलाफ़
शान्ति और सौहार्द  के हक़ में
और डर जहाँ समाप्त होता है
वहाँ से ही आरम्भ होता है गुस्सा
वहाँ से ही आरम्भ होता है
हर विद्रोह, हर क्रांति
धर्म के निर्माण से आरम्भ हुआ डर
आम लोगों को मूर्ख बनाने का कुकर्म
और उन्हें सदैव ग़ुलाम बनाने का भी
मुट्ठी-भर लोगों के इशारों पर उन्हें नचवाने का
ख़ुद को राजा और उन्हें प्रजा बनाने का
उन्होंने सभी संसाधनों पर और पूरी पूंजी पर
अपने साम्राज्य का ठप्पा लगा दिया
अपने झंडे गाढ़ दिए
केवल आम लोगों को वंचित करने की ख़ातिर
उन्होंने आम लोगों की बेबसी को
भाग्य का कायर नाम दिया
रंग, जाति, क्षेत्र, धर्म की जंज़ीरों में उन्हें जकड़ कर
ईश्वर-इच्छा का शोषण-भरा नाम दिया
अपनी पापी व्यवस्थाओं की स्थापना के लिए
और उन व्यवस्थाओं की सुरक्षा के लिए भी
उन्होंने अपने झूठे भगवानों के समक्ष
आम लोगों की बलि तक चढ़ा दी
उनके डराने का हथियार वही है
पुराना, क्रूर और विष-भरा
इतना ज़रुर है कि वे
डराने के तरीक़े बदलते गये
वे आज लोकतंत्र का चोला पहनकर
तानाशाही के सिंहासन पर बैठे
आम लोगों को जागरूक होता देख
बौखलाहट के शिकार हो चुके हैं


*सादातवाद:- मध्य-एशिया से पूरी दुनिया, विशेषकर उपमहाद्वीप में आये वे मुस्लिम-धार्मिक प्रचारक,
 जिन्होंने विभिन्न देशों में इस्लाम की यह कहकर स्थापना की कि इस धर्म में कोई जातिवाद नहीं है लेकिन सैयद,
जीलानी, हाशमी, क़ुरैशी, बुख़ारी, मसूदी, अंद्राबी, गीलानी, रज़वी आदि जातियों के वर्चस्व तले यह लोग अपने को
पैगम्बर मोहम्मद के वंशज मानते और सादात कहते हैं और अपने पर नर्क की अग्नि को हराम क़रार देते हैं।
यह इस्लामी तर्ज का ब्राह्मणवाद है। मैंने इसको सादातवाद की संज्ञा दी है।


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आदमख़ोर कानून
(इरोम शर्मिला के नाम)

ओ मेरे देश की लौह स्त्री
हम सब जानते हैं
जानते हैं, जब चीते और चील करने लगते हैं सांठ-गांठ
होती है तब किसी देह की ही चीर-फाड़
जब संविधान के हाशिये पर होने लगती है दलाली
जब कोई ज़ालिम, साधू या मौलवी
तानाशाह का रूप करने लगता है धारण
आरम्भ हो जाता है मृत्यु का तांडव
चौराहों पर लग ही जाता है नफ़रत का पर्व

हम जानते हैं इरोम शर्मिला!
जब धर्म और राजनीति में होने लगती है यारी
इतिहास के पन्नों पर
बिखर ही जातीं हैं लाल तरल की छींटें
आँखों में उमड़ ही आती हैं दुखों की बूंदें
कुछ लोग अपने घरों, रिश्तों और जड़ों को समेटे
निकल ही जाते हैं अपनी मातृभूमि को छोड़कर
फ़ज़ाओं पर फैल ही जाता है
टियर-गैस या मर्चि-गैस का ज़हरीला धुँआ
जनसंख्या होने लगती है कम
और सैनिकों की बढ़ने लगती है तादाद
अफ्स्पा* की आदमख़ोर आड़ में
आरंभ हो जाता है फ़र्जी झड़पों का मृत्यु-काल
कहीं सजने लगते हैं निर्दोषों के कब्रिस्तान
तो कहीं मज़लूमों की असंख्य चिताएँ
चाहे वे तुर्की और इराक़ के कुरूद क्षेत्र हों
या हों अफ़्रीका के एलबिनोज़ बाशिंदे
जकारताई या पाकिस्तानी अल्पसंख्यक हों
या हों फ़लस्तीन के आम लोग
वे बर्मा के मुसलमान हों
या हों इस्लामी देशों की औरतें
वह कश्मीर की बर्फ़ीली घाटी हो
या हो पूर्वोत्तर राज्यों के आदिवासी गाँव
वह कुन्नि-पोषपोरा* की सहमी औरतें हों
या हों मणिपुर की मसली गईं महिलाएँ
या हो इरोम शर्मिला तुम्हारा
अपना क्रन्तिकारी निडर मन
उन्होंने अपने साम्राज्य को
लोकतन्त्र का मन भावन पोशाक पहना दिया
और दुनिया भर में ढंढोरा पीटने लगे
अपने साम्राज्य की महानता का
कितने मुर्ख हैं वे इरोम शर्मिला!
जो अपनी आँखों पर कट्टरवाद की पट्टियां बांधें
पूरी दुनिया को अँधा समझने लगे हैं
उन्होंने अपने तन्त्र को ढाल दिया
जनरल डायर के ही सांचे में
वे हमारे देश को ही बदलने लगे हैं
एक विशाल जलियांवाला बाग़ में
आम लोगों को नाममात्र जिन्दा रखकर
वही साम्राज्यवाद की मक्कार-मानसिकता
और वही क्रूर इरादे
वही इंसानी ख़ून के प्यासे क़ानून
और वही हिटलर मसालोनी का फ़ौजी नशा
लेकिन इरोम शर्मिला, हम सब जानते हैं
कि आम लोग मिट्टी से जुड़े होते हैं
जुड़े होते हैं साहस से और संघर्ष से
जुड़े होते हैं क्रांति से और प्रतिरोध से
उनकी प्रवृति में होते हैं लौह-मनुष्य बनने के सारे गुण
उनकी सांसों में होती है विद्रोह की सारी महक
उनकी पलकों में बस्ते हैं शांति के सपने
जिसका सुंदर उदाहरण स्वयं तुम हो इरोम शर्मिला!
जिसने लोगों के जीवन के पूरे अधिकार-प्राप्ति की ख़ातिर
अपने लिए नाममात्र जीवन चुन लिया
तुम्हारी 'अमन की खुशबू
फैल जायेगी
सारी दुनिया में'*
पराजित हो जाएंगे चीते और चील
इनका यह आदमख़ोर क़ानून
बह जायेगा किसी गटर के रास्ते से
हम सब दुनिया के शांतिप्रिय लोग
नमन करते हैं तुम्हें इरोम शर्मिला!
और नमन करते हैं तुम्हारे ऐहतिजाज को भी।


*अफ्सपा- (आर्म्ड फोर्सिज़ स्पेशल पावर एक्ट)- सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून, 1958 में संसद द्वारा
पारित किया गया था और तब से यह कानून के रूप में काम कर रहा है। आरंभ में अरुणाचल प्रदेश, असम,
मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नगालैंड और त्रिपुरा में भी यह कानून लागू किया गया। जम्‍मू-कश्‍मीर में सशस्त्र बल
विशेषाधिकार कानून (अफ्सपा) 1990 में लागू किया गया। इस क़ानून के तहत संदेह के आधार पर जबरन किसी घर
या व्यक्ति की तलाशी और किसी भी व्यक्ति को गोली मारने का अधिकार प्राप्‍त है और कोई भी निर्दोष मरे तो फ़ौजियों को
कोई जवाबदेही नहीं। इस आदमख़ोर क़ानून के चलते कश्मीर घाटी और उत्तर पूर्वी राज्यों में फ़ौज द्वारा फ़र्जी झड़पों की आड़ में
लाखों निर्दोष लोगों की हत्याएँ की गईं। इरोम शर्मिला पिछले लगभग 16 वर्षों से इस क़ानून के ख़िलाफ़ भूख हड़ताल पर हैं।

*कुन्नि पोशपोरा- कश्मीर घाटी के कपवारा ज़िले के दो जुड़वाँ गाँव, जहाँ 23 और 24 फ़रवरी 1991 की मध्य-रात्र को
68 ब्रिगेड से संबंधित 4-राजपुताना राइफल्स की एक टुकड़ी द्वारा लगभग एक सौ कश्मीरी लड़कियों/औरतों के साथ
सामूहिक बलात्कार किया गया। इनमें 80 साल की एक बूढ़ी औरत और 7 वर्ष की एक छोटी बच्ची भी थी।



 


- निदा नवाज़

रचनाकार परिचय
निदा नवाज़

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