दिसम्बर 2016
अंक - 21 | कुल अंक - 54
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

ग़ज़ल-गाँव

ग़ज़ल-

आदमी ज़िन्दा रहे किस आस पर
छा रहा हो जब तमस विश्वास पर

भर न पाये गर्मजोशी से ख़याल
इस क़दर पाला पड़ा एहसास पर

वेदनाएँ दस्तकें देने लगें
इतना मत इतराइये उल्लास पर

जो हो ख़ुद फैला रहा घर-घर इसे
पायेगा क़ाबू वो क्या संत्रास पर

नासमझ था, देखा सागर की तरफ़
जब न संयम रख सका वो प्यास पर

सत्य का पंछी भरेगा क्या उड़ान
पहरुआ हो झूठ जब आवास पर

दुख को भारी पड़ते देखा है कभी
आपने 'दरवेश' हास-उपहास पर


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ग़ज़ल-

जब महब्बत का किसी शय पे असर हो जाए
एक वीरान मकां बोलता घर हो जाए

मैं हूँ सूरजमुखी तू मेरा है दिलबर सूरज
तू जिधर जाए मेरा रुख़ भी उधर हो जाए

रंजो-ग़म, ऐशो-खुशी जिसके लिए एक ही हों
उम्र उस शख़्स की शाहों-सी बसर हो जाए

जो भी दुख, दर्द, मुसीबत का पिये विष हँसकर
क्यों न सुक़रात की सूरत वो अमर हो जाए

लौट आओ जो कभी राम की सूरत तुम, तो
मन का सुनसान अवध दीप-नगर हो जाए

खा के पत्थर भी जो मुस्कान बिखेरे हर-सू
बाग़े-आलम का वो फलदार शजर हो जाए

हमने जाना है यही आ के जहां में 'दरवेश'
आदमी चाहे न जो होना मगर हो जाए



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ग़ज़ल-

सामने जो कहा नहीं होता
तुमसे कोई गिला नहीं होता

जो ख़फ़ा है, ख़फ़ा नहीं होता
हमने गर सच कहा नहीं होता

इसमें जो एकता नहीं होती
घर ये हरगिज़ बचा नहीं होता

जानता किस तरह कि क्या है ग़ुरूर
वो जो उठकर गिरा नहीं होता

नाव क्यों उसके हाथों सौंपी थी
नाखुदा तो ख़ुदा नहीं होता

तप नहीं सकता दुख की आँच में जो
खुद से वो आश्ना नहीं होता

प्रेम ख़ुद-सा करे न जो सबसे
फिर वो 'दरवेश'-सा नहीं होता


- दरवेश भारती

रचनाकार परिचय
दरवेश भारती

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ग़ज़ल-गाँव (2)