प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
मई 2015
अंक -52

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

डॉ. महेंद्र भटनागर की काव्य-गंगा: दिनेश कुमार माली (भाग-2)
कविता में विचार की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। जीवन में बौद्धिक चेतना जैसे-जैसे बढ़ती जाती है, वैसे-वैसे उनकी कविता की रचनात्मकता खिल उठती है। आज विचारशून्य कविता की संभावना नहीं हो सकती है। कविता मनुष्य के रागात्मक और सौंदर्य-बोधगम्य अस्तित्व की झलक देती है। इंद्रिय-बोध, भाव और विचार तीनों का संतुलन कविता को श्रेष्ठ बनाता है। यही कारण है, कवि महेंद्र की कविताओं की सपाट बयानी नई कविता के लिए महत्त्वपूर्ण प्रतिमान स्थापित करती है। जबकि मुक्तिबोध की कविताएं सीधे-सीधे विचारों से निर्मित होकर अपने अंतस् की गहराई से फूटी ज्वालामुखी जैसे आवेगों के फूटे हुए निष्कर्ष जनित हैं। यथा-
 
कविता में कहने की आदत नहीं है
पर कह दूँ
वर्तमान समाज में चल नहीं सकता
पूंजी से जुड़ा हृदय
बदल नहीं सकता।
 
कवि महेंद्र की ‘अभिप्रेत वंचित’, ‘अप्रभावित’, ‘आत्मनिरीक्षण’, ‘वास्तविकता’, ‘बोध’, ‘सच है’,  ‘घटनाचक्र’, ‘आत्म-संवेदन’, ‘सामना’ आदि कविताएं सीधे विचारों से उत्पन्न होने के बावजूद भी उनमें एक भाव-उद्वेग है, एक अंतस् आवेग है, जो पीड़ा के रूप में कवि को अपने कलम पकड़कर लिखने के लिए बाध्य कर रहा है। कवि महेंद्र की इन कविताओं की एक अन्य विशेषता यह भी रही है कि अपने जनधर्मी, जीवनधर्मी और बदलते परिवेश के प्रति सजगता की चेतना होने के बावजूद भी लक्ष्मण रेखा से बंधी नहीं रही। उस सीमा रेखा को लांघकर कविता के सनातन विषयों की ओर अग्रसर हुई, जैसे प्रेम, प्रकृति, जीवन और मृत्यु आदि। स्वतन्त्रता आंदोलन के शुरूआती दौर में कविताओं से जो आवेग-संवेग था, उनकी कविताओं में इसकी प्रतिध्वनि कहीं भी सुनाई नहीं देती है। कहने का बाहुल्य यह नहीं है कि कवि महेंद्र की कविताएं केवल सतही अथवा सपाट बयानबाजी वाली है। मेरे दृष्टिकोण में भले ही, इनकी कविताओं में बिम्ब, उपमा, अलंकार आदि का प्रयोग कम हुआ हो अर्थात शिल्प, भाषा, काव्य शैली के तौर पर क्लिष्ट न हो मगर अनुभव-जन्य अंतर्वस्तु के कारण कविताओं की सारगर्भिता, प्रांजलता और प्रशान्ति की वजह उन्हें किसी भंगिमा की गरिमा को बनाए रखने के लिए बाह्याडम्बर के प्रयोग की जरूरत नहीं है। उनकी ‘मूरत अधूरी’, ‘मजबूरी’, ‘चाह’, ‘जीने के लिए’, ‘आग्रह’, ‘कामना’, ‘कविता-प्रार्थना’, ‘पहचान’, ‘चरम बिन्दु’ आदि कविताएं जीवन के प्रति अपने सकारात्मक दृष्टिकोण सचेतनता और सहनशीलता को दर्शाती है। हिंदी की महत्त्वपूर्ण समकालीन कविता मानवतावादी विचारधारा की दृष्टि से नागार्जुन-केदार-त्रिलोचन के अलावा जिन कवियों का दृष्टिकोण प्रासंगिक मानती है, उनमें डॉ. महेंद्रभटनागर व रघुवीर सहाय प्रमुख हैं। यहाँ यह स्पष्ट कर देना उचित होगा कि कवि महेंद्र की प्रासंगिकता मुक्तिबोध या नागार्जुन की अपेक्षा सीमित स्तर पर है। कारण यह है की कवि महेंद्र प्रकृति और मनुष्य के आपसी संबंध में ही नहीं, वरन उन संबन्धों में भी विवेक की स्वतन्त्रता और अलगाव के रूप में देखते हैं, वे किसी भी प्रकार के सक्रिय सहयोग को आधिपत्य का पर्याय मानते हैं। ‘मुक्तिबोध’ (freedom spree) पर उनकी कविताओं में इसकी झलक पाएंगे। यथा-
 
शुक्र है-
अब मुक्त हूँ
हवा की तरह
कहीं भी जाऊं
उड़ूँ, नाचूँ, गाऊं!
शुक्र है
उन्मुक्त हूँ
लहर की तरह!
जब चाहूं-
लहराऊँ, बलखाऊँ
चट्टानों पर लोटूँ
पहाड़ियों से कहूं
वनस्पतियों पर बिछलूँ ।  (मुक्ति-बोध)
 
इसी श्रंखला की अन्यतम कविताओं में ‘अतृप्ति भेंट’, ‘इतवार का एक दिन’, ‘विश्लेषण’, ‘निष्कर्ष’, ‘विक्षेप’, ‘गंतव्य-बोध’, ‘विराम है’ जो कवि के भीतरी विवेक को प्रमुखता देती है। यह बात भी सत्य है कि नागार्जुन और धूमिल दोनों प्रखर राजनीतिक चेतना वाले कवि हैं। दोनों राजनीति को सामाजिक हितों के प्रश्न से अलग करके नहीं देखते। उनके कविताओं के विषय जाति-बिरादरी, सामंती उत्पीड़न, पूंजीवादी जनतंत्र शोषण और क्रांतिकारी परिवर्तन हैं। मगर कवि महेंद्र भटनागर इसकी जड़ तक जाते हैं। आदमी को ही राजनीति और सामाजिक क्रान्ति का केंद्र मानते हैं। उनके 'कविताएं:मानव गरिमा के लिए' कविता-संग्रह की कविता 'दो ध्रुव' से इस खाई को सामने रखते है-
 
हैं एक और भ्रष्ट राजनैतिक दल
उनके अनुयायी खल
सुख-सुविधा-साधन-सम्पन्न
प्रसन्न।
धन-स्वर्ण से लबालब
आरामतलब/साहब और मुसाहब!
बँगले हैं/चकले हैं,
तलघर हैं/बंकर हैं,
भोग रहे हैं
जीवन की तरह-तरह की नेमत,
हैरत है, हैरत!
दूसरी तरफ-
जन हैं
भूखे-प्यासे दुर्बल, अभावग्रस्त...... त्रस्त,
अनपढ़, दलित,असंगठित,
खेतों गाँवों/बाजारों – नगरों में
श्रमरत,
शोषित/वंचित/शक्तिहीन!
 
इस खाई को भरने के लिए वे समता का सपना भी देखते हैं-
 
लेकिन विश्व का इतिहास साक्षी है-
परस्पर साम्यवाही भावना इंसान की
निष्क्रिय नहीं होगी,
ना मानेगी पराभव!
लक्ष्य तक पहुंचे बिना
होगी नहीं विचलित,
न भटकेगा / हटेगा
एक क्षण अवरुद्ध हो लाचार
समता-राह से मानव!
('कविताएं:मानव गरिमा के लिए' कविता-संग्रह की कविता 'समता-स्वप्न' से)
 
मगर सब कुछ उपलब्धियां प्राप्त कर लेने के बाद भी आज आदमी अपनी आदमीयत खो बैठा है। विषय-वस्तु और भाषा-गठन के प्रति सचेत रहकर कवि ने आज के साहित्यिक-संस्कार और शब्द-संकोच की सीमाएं तोड़ी हैं। वे इसमें सफल हुए हैं क्योंकि यथार्थ को स्थानीकृत करके देखते समय न वे ‘जड़ों’ में प्रवेश करके भरे-पूरे मानवीय परिवेश से आँख चुराते हैं, न विहंगावलोकन की पर्यटक भाव-भंगिमा अपनाते हैं। वे पूरी सहृदयता और विनम्रता से, रक्त-संबंधों की आत्मीयता से उस जीवन के पास गए हैं। इसलिए वे यह देख सके हैं कि आस्था और विश्वास की सतह के नीचे आदमी का सजीव संसार है। अपनी कविता ‘आदमी’ से-
 
किन्तु अचरज
आदमी है
आदमी से आज
सर्वाधिक आरक्षित
आदमी के मनोविज्ञान से
बिलकुल अपरिचित
आदमी
आदमी से आज
कोसों दूर है
आत्मीयता से हीन
बजता खोखला
हरदम
सिर्फ गरुर है।
 
ऐसे ही संवेदना का संचार युवा ओडिया कवि अनिल दास की कविता ‘बड़ा आदमी’ में भी देखने को मिलता है-
हमारे गाँव का गंवार
आपसे अच्छा
किसी के मरने पर घाट तक तो जाता है
लकड़ी पुआल इकट्ठा करता है
शादी-ब्याह में पानी ढोता है
दरी बिछाने में मदद करता है
मेलों और उत्सवों में
यथाशक्ति चन्दा देता है
आप तो अमावस के तारे की तरह
न बारिश होने देते हो
न एक घड़ी उजियारा करते हो।
 
कवि महेंद्र का ओड़िया कवियों जैसे रमाकांत रथ और अनिल दास के साथ तुलनात्मक अध्ययन करने पर मैंने पाया कि कुछ संवेदनाएँ सार्वभौमिक होती हैं। वे स्थान, भाषा, परिस्थिति, वातावरण, उम्र और काल सभी से अपरिवर्तित रहकर मानव-हृदय में सर्वदा उद्वेलित होती रहती हैं। जहां सारी विश्व-व्यवस्था उत्पीड़क और उत्पीड़ित की ‘दो पंक्तियों’ से निर्मित हुई हो, वहाँ तटस्थ रहकर कवि अपना संसार नहीं बना सकता। संबंधों के दमनकारी रूप को समझाना उनके प्रतिरोध और निषेध की वैकल्पिक चेतना अर्जित करना, जीवन-संग्राम के बीच रोज-रोज ढलती हुई भाषा से दमन, प्रतिरोध और विकल्प की सारी प्रक्रिया को अभिव्यक्त करना एक कवि के लिए काफी चुनौती भरा काम है। यह काम केवल भाषिक युक्तियों से नहीं होता; कवि को सामाजिक संबंधों की जटिलता, अंतर्द्वंद्व और गतिशीलता को आत्मसात करके अपना कर्तव्य निश्चित करना पड़ता है और अपनी पक्षधरता पर दृढ़ता से कायम रहकर पूरे परिदृश्य को समेटना पड़ता है। डॉ. सत्यनारायण व्यास के अनुसार डॉ. महेंद्रभटनागर के काव्य का आधार सामाजिक है और अधिरचना साहित्यिक। उनकी सोच जनवादी है और भाषा स्तरीय। वे अनपढ़-अनगढ़ जन की बात को भी साहित्य की तराजू में तौलकर कहते हैं। इस मामले में वे अन्य जनवादी कवियों से भिन्न है। भाषिक शिल्प की उत्कृष्टता को संभवतः उन्होंने अपनी रचनात्मक अस्मिता से इस कदर जोड़ लिया है कि वे फुटपाथ के संघर्षरत सर्वहारा की तकलीफ को भी असाहित्यिक अंदाज में नहीं कह सकते। डॉ. महेंद्र भटनागर की कविताओं से गुजरते हुए इस बात पर पूर्णतया यकीन हो गया कि वे एक आस्थावान, दायित्व-संपन्न, समय-सजग और साहित्य के क्षेत्र में आवश्यक हस्तक्षेप करने वाले ताकतवर रचनाकार हैं, जो मात्र कवि कहलाने के लिए कविताएं नहीं करते हैं। महेंद्र भटनागर की कविता मात्रा और गुणवत्ता दोनों ही दृष्टियों से भारी और श्रेष्ठ हैं। वे किसी खास किस्म की विचारधारा से ‘प्रतिबद्ध’ या अंधभक्त नहीं हैं। हाँ, प्रभावित जरूर है- समाजवाद हो, मार्क्सवाद हो, प्रयोगशील और प्रगतिशील आंदोलन हो। सावधान और सूक्ष्म अनुशीलन से उनकी कविता सहज भाव से मानवता में ही संपन्न और परिणत होती है, न कि किसी वाद विशेष में। यह किसी भी अच्छे कवि की रचनात्मक स्वाधीनता और स्वायत्तता का प्रशंसनीय पहलू है। यह सारी बातें आप उनकी प्रतिनिधि कविताओं जैसे ‘विपर्यस्त’, ‘आत्मबोध’, ‘विडम्बना’, ‘प्राणदीप’, ‘गंतव्य’, ‘वरदान’, ‘वेदना’, ‘जीवनधारा’, ‘आंसुओं का मोल’ आदि में पा सकते हैं। उनकी 'वैषम्य' कविता में-
 
हर व्यक्ति का जीवन
नहीं है राजपथ-
उपवन सजा, वृक्षों लदा
विस्तृत अबाधित
स्वच्छ समतल स्निग्ध!
 
एक विशेष पहलू महेंद्र भटनागर की कविता में है, वह है मानव-जिजीविषा। जो मरना नहीं जानती अर्थात जीवन के प्रति अकुंठ राग ही उनकी कविताओं को नया वितान प्रदान करता है। अनुभव को कविता बनाने में संघर्ष का एक स्तर भाषा है, दूसरा स्तर सपना। वह हमारे मानवीय स्वरूप और आंतरिक संवेदना पर भी असर डालता है। इसलिए यह पूरे जीवन का नियमन करता है। प्रतिरोध करने का कोई भी प्रयास तभी सार्थक हो सकता है, जब वह भी पूरे जीवन को दृश्य  परिधि में रखे। इसलिए जीवन को आधार बनाकर उन्होंने अनेक कविताएं लिखी हैं-
 
जिंदगी
बदरंग केनवास की तरह
धूल की परतें लपेटे
किचकिचाहट से भरी
स्वप्नवत है
वाटिका पुष्पित हरी!
पर जी रहा हूँ
आग पर शय्या बिछाये!
पर
जी रहा हूँ
कटु हलाहल कंठ का गहना बनाए!
जिंदगी में बस जटिलता ही जटिलता है
सरलता कुछ नहीं।
 
यह सहजता से कहा जा सकता है कि कवि महेंद्र की कविता की संरचना अत्यंत ही सुगठित है। हर चीज संबद्ध है। शिल्प-संवेदना का यह एकीकरण रवींद्रनाथ टैगोर के जीवन-दर्शन की याद दिलाता है, जो उपनिषदों, भागवत और पुराणों के सारगर्भित व सार्वभौमिक उपदेशों का निचोड़ था। मगर विषय-वस्तु में डॉ॰ महेंद्र भटनागर का अपना अलग स्थान है। संबंध और स्वतन्त्रता के अंतर्द्वंद्व को उकेरने में ही जीवन का मर्म छिपा हुआ है। संगठन की ताकत एकरूपता में नहीं है, बल्कि जीवन के विविध पक्षों को सँजोकर आत्मसात करने में है। विशिष्ट ख्याति लब्ध साहित्यकार डॉ. शिव कुमार मिश्रा की महेंद्र भटनागर की कविता पर की गई टिप्पणी इस बात की पुष्टि करती है। "एक लंबे रचनाकाल का साक्ष्य देती इन कविताओं में सामाजिक यथार्थ की बहु-आयामी मनोभाव और मनोभावनाओं की बहुरंगी प्रस्तुति है। इनमें युवा मन की ऊर्जा, उमंग, उल्लास और ताजगी है तो उसका अवसाद, असमंजस और बेचैनी भी। ललकार, चेतावनी, उद्बोधन और आह्वान है तो वयस्क मन के पक्के अनुभव तथा उन अनुभवों की आंच से तपी निखरी सोच भी है। कहीं स्वरों में उद्घोष है तो कहीं वे संयमित है। समय की विरूपता, क्रूरता और विद्रूपता का कथन है तो इस सबके खिलाफ उठे प्रतिरोध के सशक्त स्वर भी समय के दबाव है तो उनका तिरस्कार करते हुए प्रखर होने वाली आस्था भी। परंतु इन कविताओं में मूलवर्ती रूप में सारे दुख-दाह और ताप-त्रास के बीच जीवन के प्रति असीम राग की ही अभिव्यक्ति है। आदमी के भविष्य के प्रति अप्रतिहत आस्था की कविताएं हैं ये, और इस आस्था का स्रोत है कवि का इतिहास-बोध और उससे उपजा उसका ‘विजन’। कवि के उद्बोधनों में आदमी के जीवन को नरक बनाने वाली शक्तियों के प्रति उसकी ललकार में एवं आदमी के उज्जवल भविष्य के प्रति उसकी निष्कम्प आस्था में उसके इस ‘विजन’ को देखा जा सकता है।" इस विजन को अपनी कविता 'प्रतिक्रिया' में इस प्रकार उजागर किया है-
 
अणु-विस्फोट से
जाग्रत महात्मा
बुद्ध की बोली-
सुनिश्चित-
शांति हो,
सर्वत्र
सद्गति-सतग्रह की कान्ति हो!
सुरक्षित-
सभ्यता, संस्कृति, मनुजता हो,
दुनिया से लुप्त दनुजता हो!
 
अंत में, डॉ. महेंद्र भटनागर न केवल कविता के जीवन या जीवन की कविता में, बल्कि उसे पारिवारिक जीवन में अंगीकार करते हुए “वसुधैव कुटुंबकम” की अवधारणा पर समग्र मानवीय रिश्तों को स्वस्थ, हंसमुख और लोकतांत्रिक बनाने का आग्रह करते हैं।

- दिनेश कुमार माली