प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
नवम्बर 2016
अंक -52

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथनी-करनी

अजय और संजय दोनों भाई न केवल पढ़ाई-लिखाई और खेलकूद में ही आगे रहते बल्कि बहुत निडर, साहसी तथा परिश्रमी भी थे। उनके पिताजी एक शासकीय चिकित्सक थे। पिछले दिनों उनका स्थानांतरण शहर से रामपुर गाँव में हो गया था। यह गाँव शहर से बहुत दूर था, इस कारण उनको सपरिवार उस गाँव में ही रहना पड़ा। वहाँ उनको प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के पास ही बना शासकीय मकान रहने को मिल गया। उनके पिताजी सुबह से लेकर देर रात तक मरीजों से घिरे रहते। मम्मी घर के कामों में व्यस्त रहतीं। समय मिलता तो वे दोनों भाईयों को कुछ देर तक पढ़ाती। जब वे लोग शहर में थे तो अजय और संजय का अधिकांश समय स्कूल और टयूशन में ही कट जाता, परंतु यहाँ तो स्कूल के बाद समय कटता ही नहीं था।

 

एक दिन दोनों भाईयों ने आपस में कुछ विचार-विमर्श किया और चल पड़े अस्पताल अपने पिताजी के पास। संयोगवश उस समय वे अकेले खाली बैठे थे। दोनों भाईयों को एक साथ देखकर पूछ बैठे- ‘‘क्या बात है बेटे ? सब खैरियत तो है।’’

‘‘पापा सब ठीक है, परंतु यहाँ गाँव में हमारा समय ही नहीं कट रहा है, इसलिए हम आपके काम में कुछ हाथ बँटाना चाहते हैं। हमारे लायक कोई काम हो तो प्लीज बताइए ?’’ अजय ने कहा।

उनके पिताजी दोनों भाईयों को बड़े ध्यान से देखने लगे।

पिताजी बोले- ‘‘है, पर.... बहुत कठिन काम है। शायद तुम लोग....।’’ वे कुछ कहते इससे पहले संजय बोल पड़ा- ‘‘आप बताइए तो सही पापा। हम कोई भी काम कर लेंगे।’’

 

पिताजी ने समझाया- ‘‘देखो बेटे ! यह एक पिछड़ा हुआ गाँव है। यहाँ के ज्यादातर लोग गरीब और अनपढ़ हैं। वे साफ-सफाई तथा उत्तम स्वास्थ्य के सम्बंध में कुछ भी नहीं जानते। ये अंधविश्वासों, कुरीतियों तथा गलत परम्पराओं का पालन अभी भी करते चले जा रहे हैं। इसलिए तुम लोग इन्हें शिक्षित करने का काम कर सकते हो। इन्हें तुम पढ़ा सकते हो। पढ़-लिखकर ये लोग खुद ही इन बुराइयों को छोड़ देंगे और इनकी आधी समस्याएँ यूँ ही खत्म हो जाएँगी।’’

‘‘हाँ पापाजी ! आप बिलकुल ठीक कह रहे हैं। हम लोग इन्हें पढ़ाएँगे।’’ दोनों भाई एक साथ बोले। 

फिर दोनों बच्चों ने पिताजी से विदा ली और घर की ओर प्रस्थान किया।

 

दोनों भाईयों ने आसपास के लोगों से कहा कि वे शाम को उनके यहाँ पढ़ने के लिए आया करें। वे ग्रामीण ‘‘हाँ‘‘ तो कहते पर कोई भी नहीं आता। अब दोनों भाईयों ने गाँव वालों को स्वच्छता के बारे में बताना शुरु किया। ग्रामीण उनकी बातों को सुनते जरूर, पर पालन नहीं करते। वे लोग यहाँ-वहाँ कहीं भी गंदगी कर देते। नालियों तथा गड्ढों में हमेशा मक्खियाँ भिनभिनातीं रहतीं। 

सारी स्थिति को देखते हुए दोनों भाईयों ने आपस में कुछ विचार-विमर्श किया और एक टोकरी, फावड़ा और गैंती लेकर निकल पड़े गाँव सफाई करने लगे। सुबह-सुबह वे दोनां गाँव के एक कोने से कचरे का ढेर हटाने तथा गड्ढों को पाटने के काम में लग गए। आते-जाते लोग उन्हें देखते, कुछ लोग हँसते तो कुछ व्यंग्य में कुछ कह कर आगे बढ़ जाते। लेकिन दोनां भाई निर्विकार भाव से अपने काम में जुटे रहे।

 

उन्हे काम करता देख कुछ देर बाद गाँव की दो-तीन औरतें भी आकर उनके काम में लग गयी। फिर क्या था...... एक-एक औरतें आती गईं और घंटे भर के भीतर ही पच्चीस-तीस औरतें इस काम में रम गईं। औरतों को काम करते देख पुरुष भी अपने को रोक नहीं पाए। देखते-ही-देखते गाँव भर के स्त्री-पुरूष इस सफाई अभियान में लग गए और कुछ ही घंटों में पूरे गाँव की सफाई हो गई।

इस प्रकार संजय और अजय ने अपनी करनी से वह काम कर दिखाया जो वे अपनी कथनी से नहीं कर पा रहे थे।

 

अब प्रतिदिन शाम को दोनों भाई गाँव के चौपाल में अशिक्षित लोगों को एक-एक पढ़ाते भी हैं। इस कार्य में गाँव के पंच, सरपंच और गुरुजी भी उनका सहयोग करते हैं। 

उम्मीद है बहुत जल्दी रामपुर पूर्ण साक्षर गाँव बन जाएगा।

 


- डॉ. प्रदीप कुमार शर्मा
 
रचनाकार परिचय
डॉ. प्रदीप कुमार शर्मा

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कथा-कुसुम (1)