प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
नवम्बर 2016
अंक -52

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कविता-कानन

कविता- ट्रैफिक लाइट

कभी लाल और पीली होती
कभी हरी हो जाती है,
प्राण नहीं है इसमें फिर भी
सब पर हुक्म चलाती है।

रुकने का जब करे इशारा
झट से सब रुक जातें हैं,
फिर जब कहती चलने को तो
सब आगे बढ़ जाते हैं।

चौराहों पर अक्सर मिलती
पल-पल रंग बदलती है,
अनदेखी जो करता इसकी
सज़ा भी उसको मिलती है।

गर्मी-सर्दी सबकुछ सहकर
चुप-चुप भी बतियाती है,
दुर्घटना से हमें बचाकर
मंजिल तक पहुँचाती है।


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कविता- कोई तो समझाए

पंछी कैसे नीड़ बनाते
कोयल क्यों मन भाये,
कैसे बन्दर खों-खों करता
कुत्ता क्यों गुर्राए?

कैसे रंग बदलता गिरगिट
जुगनू कैसे चमके टिम-टिम,
सुन्दर फूल कमल का कैसे
कीचड़ में खिल जाए?

कैसे हाथी इतना मोटा
क्यों चूहा है इतना छोटा,
इतनी सुन्दर, प्यारी तितली
रंग कहाँ से लाए?

सांप कहाँ से विष ले आता
कौआ क्यों न हमको भाता,
माथा-पच्ची करके हमको
कोई तो समझाए।।


- ज्योतिकृष्ण वर्मा
 
रचनाकार परिचय
ज्योतिकृष्ण वर्मा

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कविता-कानन (1)