अक्टूबर 2016
अंक - 19 | कुल अंक - 54
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

भाषांतर

अमेरिका
(बांग्ला से अनुदित कहानी)


मूल लेखक- शीर्षेन्दु मुखोपाघ्याय
बांग्ला से अनुवाद- शेष अमित



अमेरिका में उतरते समय पहले दाँतों को अच्छी तरह साफ कर लें। कारण आप के दाँतों में पूरब के जीवाणु हो सकते हैं। कलाई घड़ी के समय को भी मिला लें। वजह यह कि अमेरिका में सबकुछ घड़ी के अनुसार चलता है। आपके जूते के तले पूरब के देशों की गंदगी हो सकती है। रूमाल से उन्हें भी साफ कर लें, आप अमेरिका को गंदा नहीं करेगें। अब तैयार हो जाएँ। सीट-बेल्ट बांध लें। सिगरेट बुझा दें। कुछ मिनटों में ही हम केनेडी एअरपोर्ट पर उतरेंगे।
यह सब मुझे पता ही था। बहुत पहले ही मैनें दाँत साफ कर लिये थे, घड़ी मिला ली थी और जूते भी साफ कर लिये थे। मेरे दाहिने ओर बैठी एक खुनखुनिया तिब्बती बूढी ने टूटी-फूटी हिंदी में बुदबुदाते हुये कहा- मेरे दाँत नहीं है, कलाई घड़ी नहीं है, रूमाल भी नहीं है! चलो मुसीबत टली। अच्छा, नीचे जो वो जंगल की तरह दिख रहें हैं, बडे़-बडे़ ऊँचे पेड़ जिनमें टहनियां नहीं है, वो कौन-सी जगह है, बता सकते हो?
चुप.......चुप मैनें दबी आवाज़ में कहा- वही न्यूयार्क है।
न्यूयार्क! बूढ़ी ने अपनी आँखें कपाल की ओर उठाकर कहा- लेकिन वह गलीचा तो कहीं नहीं दिख रहा। मेरे बेटे ने न्यूयार्क से चिठ्ठी में लिखा था कि पूरा अमेरिका एक बहुत बडे़ गलीचे से ढँका है।
- मैनें भी सुना है।
- सुना है, चलो गनीमत है, कहते-कहते बूढ़ी ने अपना झोला-झम्पा समेटना शुरू कर दिया।


जहाज उतर गया। रूका। दरवाजे़ खोलते हुये परिचारिका ने कहा- पूरब के लोगों! तुम लोगों के लिये स्वर्ग के दरवाजे़ खुले हैं। यहाँ हर कुछ अक्षय है। डाॅलर, लड़कियाँ, विदेशी माल, जाओ कुछ दिन झमक कर लूट खाओ। यूरोपवासियों! अमेरिका आप लोगों के लिये स्वर्ग न भी हो पर एक अद्भुत नख़लिस्तान तो है। जाओ अपने इस दूसरे स्वदेश को बार-बार आविष्कृत करो।
अमेरिका वासियों! इस मुल्क़ के बारे में आप लोगों के लिये नया कुछ नहीं कहना है। यह वही है, जहाँ आपको मरने के लिये लौट आना पड़ता है।
मैं उतर गया। उतरते ही आश्चर्य हुआ। अमेरिका में कदम रखते ही जैसे अमेरिका ने अपनी गोद में उठा लिया। दुलार करते हुये कानों में धीरे से कहा- मेरे बच्चे, गरीब के घर में रहते हुए, राहों की धूल-कीचड़ों में चलते हुये बड़े हुये हो, अच्छी चीजें तो आँखों से कभी देखी नहीं, जीभ ने चखा नहीं, भोग किया नहीं। आओ बच्चू कुछ दिन सुख-भोग कर लो।
कृतज्ञता से मेरी आँखें भर आईं। मैनें छुपाकर अपनी आँखें पोंछ लीं।


अमेरिका में रोना मना है। फिर भी अमेरिका के बारे में जो-जो सुना था, वह सब सच निकले। पूरा देश एक विशाल गलीचे से ढँका है। इस गलीचे पर कहीं घास और कहीं कंक्रीट बिछे हैं। एक अति उन्नत तकनीकी कौशल से, यहाँ के आकाश को थोड़ा और नीला कर दिया गया है। पूरब के समाचार-पत्र ठीक ही कहते हैं- अमेरिका में गुरूत्वाकर्षण की शक्ति कुछ कम है। आप फुर-फुराते चल सकते हैं, कोई परेशानी नहीं होती। यहाँ की हवा में आॅक्सीजन अधिक है। पीने का पानी जीवाणुमुक्त और विटामिनयुक्त हैं।
एक सौ अस्सी मंजिली एक होटल के एक सौ सत्तर माले के एक कमरे में प्रवेश करते हुये देखा- एक आदमी हेलिकाॅप्टर पर बैठकर मेरे कमरे की खिड़कियों के शीषे, वेक्यूम क्लीनर से साफ कर रहा है। कमरे के अंदर भी शानदार इंतज़ाम थे। रंगीन टी.वी., फ्रिज, किंग्स-बेड, सुंदर जवान लड़की, सब तैयार- बस उपयोग की प्रतीक्षा करती।
अमेरिका के राष्ट्रपति से टेलीफोन पर बातें करनी थीं, मैंने टेलीफोन उठाया।
कुछ देर बाद ही अमेरिकी राष्ट्रपति की रौबदार और आह्लादित स्वर सुनाई पड़े,


- हाँ मेरे दोस्त..... कहो!
मैं एक भारतीय पर्यटक हूँ, माननीय राष्ट्रपति महोदय।
भारतीय! भारतीय!  याद करने में उन्हें थोड़ा समय लगा। फिर उचकते स्वर में कह पड़े

- ओह, भारत....... !
हाँ-हाँ मैं जानता हूँ। भारत, दुनिया का दूसरा या तीसरा विशालतम गणतंत्र। वहाँ ताज महल है न?
- जी हाँ, माननीय राष्ट्रपति महोदय।
- स्वागतम् भारतीय पर्यटक। हमारा देश भारतीय पर्यटकों को हमेशा श्रद्वा की दृष्टि से देखता है। आम तौर पर हम सभी देशों के लोगों को श्रद्वा की दृष्टि से देखते हैं, पर सभी उस श्रद्वा की दृष्टि के लायक नहीं हैं।
- अमेरिका एक अत्यंत महान राष्ट्र है माननीय राष्ट्रपति महोदय।
- धन्यवाद भारतीय पर्यटक, तुम्हें कोई असुविधा तो नहीं हो रही?
- नहीं, माननीय राष्ट्रपति महोदय। इस कमरे में रंगीन टी.वी. से लेकर सुंदर जवान लड़की तक उपलब्ध हैं।
- शानदार। तुम शायद इनका उपयोग करना जानते हो! मैंने सुना है, भारत में ट्रेन चलते हैं, कहीं-कहीं हवाई जहाज भी उड़ते-उतरते रहते हैं। दिल्ली में टेलीफोन की सुविधायें भी हैं। भारत पिछले कई वर्षों में विकास की लंबी छलांग लगा चुका है, इस संबंध में मुझे कोई संदेह नहीं है।
- धन्यवाद, माननीय राष्ट्रपति महोदय। मैंने सुना है कि पूरा अमेरिका एक गलीचे से ढका हुआ है, माननीय राष्ट्रपति, ऐसी महान कृति दुनिया के किसी मुल्क में नहीं है।
- धन्यवाद भारतीय पर्यटक। हम यथासाध्य इस देश को बस सुंदर बनाने की चेष्टा कर रहे हैं। तुम्हें अच्छा लगने पर, मुझे खुशी होगी।
- माननीय राष्ट्रपति महोदय, मैं सिर्फ पर्यटन के लिये ही नहीं आया हूँ। मैं दो मृत अमेरिकी नागरिकों के बारे में खोज-बीन करने आया हूँ। एक हैं- सोनी लिस्टन और दूसरे हैं विलियम होल्डेन।
- ये कौन हैं?
- दोनों विश्व प्रसिद्व शख्सियतें हैं।
- राष्ट्रपति महोदय ने अत्यंत विनयपूर्वक ही कहा, अधिकतर अमेरिकी नागरिक विश्व-विख्यात लोग ही हैं। उन सबको याद रखना कठिन है। फिर भी तुम किसी भी जीवित या मृत अमेरिकी नागरिक के संबंध में जानकारी ले सकते हो, कोई बाधा नहीं है, संकोच नहीं है।
- धन्यवाद, राष्ट्रपति महोदय।
- तुम्हारी यात्रा आनंददायक हो भारतीय पर्यटक।


फोन रखकर मैं खिड़की की तरफ बढ़ा, हेलिकाॅप्टर पर बैठा आदमी पूरे मनोयोग से शीशे साफ किये जा रहा था। होठों में अधजला सिगरेट लटक रहा था।
मैंने खिड़की के एक शीषे को खोलकर कहा, "शुभ संध्या।"

- शुभ संध्या।
- मैं एक भारतीय पर्यटक हूँ।
- इण्डियन? इंण्डियन को तो हमने खदेड़ दिया था।
- मैं रेड इंण्डियन नहीं हूँ।
- बहुत अच्छा। रेड इंण्डियन होना अच्छी बात नहीं।
- तुम्हारा देश बहुत अच्छा लग रहा है।
- लगने की बात ही है। मैंने भी सुना है अमेरिका बहुत अच्छा देश है।
- इस देश की क्या विशेषता है, बता सकते हो?
- हाँ कह सकता हूँ। यहाँ शीशे के बहुत सारे ब्लाइंड्स हैं, यह ओट है। इतने ओट तुम्हें किसी भी मुल्क में नही मिलेंगे। मैं हर दिन ऐसे दो-तीन हजार ब्लाइंड्स साफ करता हूँ।
- तब तो तुम्हारी आमदनी अच्छी ही होगी?
- क्या बात करते हो, इस देश में मिलिनाॅयर को गरीब ही माना जाता है। इस खिड़की से बिना निशाना साधे तुम यदि नीचे सड़क पर गोलियाॅं चलाओ तो जो कुछ लोग मारे जायेंगे, इनमें अधिकतर अश्वेत, करोड़पति या खरबपति ही होंगे। मेरी आमदनी तो पूरे दिन की दो-तीन सौ डालर हैं, वह भी तब जब मैं सुबह से शाम तक मेहनत करता हूँ। पुराने हेलिकाॅप्टर को बेचकर एक नये माॅडल का हेलिकाॅप्टर लेने का मन है बहुत दिनों से, हो नहीं पा रहा है। पर अच्छी बात यह है कि ब्लाइंड्स की संख्या यहाँ दिनों दिन बढ़ रही है, और बढे़गें।
- अमेरिका में इन शीशे के ब्लाइंड्स के सिवा और क्या है?
- बहुत कुछ है। नियाग्रा-प्रपात, डिजनीलैंण्ड, स्टैचू ऑफ़ लिबर्टी।
- देखा है तुमने?
- देखा है। लेकिन वह सब पर्यटकों के लिये है। असली अमेरिका को जााना चाहते हो तो मेरी तरह का हेलिकाॅप्टर खरीद लो और उसमें बैठ जाओ। शीशे के इन ब्लाइंड्स को साफ करने का काम ले लो। तब देखना अमेरिका के स्तन और नितम्ब अनावृत हो जायेंगे।
- वह कैसे संभव है?
- शीशे साफ होते हैं और हर घर में पर्दे तो लगे नहीं होते, ब्लाइंड्स से नज़र पार करते ही घर घर में अमेरिका के विचित्र रूप देख सकते हो।
धन्यवाद कहते हुये मैंने खिड़की बंद कर ली।


कमरे में बैठी सुंदर जवान लड़की आइने के सामने बैठकर अपने आप मेकअप किये जा रही थी। वह बहुत संदर थी, लंबी, भरी-भरी। गोरे रंग की क्या बात करें, खिड़की बंद करने के बाद, वह मेरी तरफ देखकर कहने लगी- भारतीय पर्यटक, स्त्रियों के बारे में तुम्हारी धारणा क्या है, कोई पूर्व धारणा!
- बहुत स्पष्ट नही है। अच्छा, तुम्हारे देश के नीग्रो के बारे में तुम्हारी धारणा क्या है?
- बहुत स्पष्ट नहीं है, लेकिन सुना है कि वे लोग बहुत दुष्ट होते हैं, मारपीट करते हैं और बलात्कार भी।
- करतें हैं? मैंने त्योरियाँ चढ़ाई
- हाँ, बलात्कार मुझे बिलकुल पंसद नही है। सेक्स अच्छी चीज है पर रेप बहुत बुरा।
मैंने सिर हिलाकर कहा, मेरा भी यही मानना है। मैंने सुना है कि पूरा अमेरिका एक सुंदर गलीचे से ढँका है। क्या यह सच है?
- जी हाँ, अवश्य।
- फिर तुम्हारे यहाँ खेती कहाँ होती है?
- क्यूँ......? यह गलीचा तो बहुत उपजाऊ है, बहुत गहरा भी है। हम गलीचे के ऊपर ही खेती करते हैं।
- वाह! वाह! अमेरिका में तो तकनीक ने बहुत विकास किया है।
- हाँ, बहुत विकसित हो चुका है।
- गलीचे के नीचे क्या है, जानते हो?
- नहीं, हम लोग जन्म से ही इस गलीचे को देख रहे हैं। शायद इस ग़लीचे के नीचे एक प्रिमिटीव अमेरिका है। हाँ, अब जाने दो, बातें बहुत हो गयीं। अब आओ कुछ सेक्स की बातें की जायें।
हाँ, हाँ- होंगी। पर क्या तुम बता सकती हो अमेरिका की विशेषता क्या है?
- हाँ,  कह सकती हूँ। अमेरिका का अर्थ ही है सेज। इतने सुंदर नक्काशीदार और मुलायम सेज तुम्हें और कहीं नहीं मिलेंगे। सुख या दुःख में तुम केवल सेज में डूबे रह सकते हो। रूई, फोम, रबर और पंख़ों का ऐसा समानुपात दुनिया का और कोई मुल्क कर नहीं पाया, आओ सोकर देखो।


मैं एक क़दम पीछे हट गया- होगा..... होगा........मुझे और कुछ जानना है।
नशीली आँखों से उस लड़की ने मुझे देखते हुए कहा- पूरब के कायर पुरूष, इतना संकोच क्यूँ? इतनी दुविधा क्यूँ? देखो वह सब जो सीधी लम्बी गगनचुंबी इमारतें हैं, वह किस के प्रतीक हैं!

- नहीं तो

- अमेरिकन सेक्स को कितना महत्व देतें हैं, यह समझ सकते हो यदि तुम इन्हें ग़ौर से देखो।
तुम्हारे देश में शिवलिंग जैसे सृष्टि का प्रतीक है, अमेरिकन स्काईस्क्रैपर भी ठीक वही हैं। इस देश में शर्म और हया के लिये कोई जगह नहीं। आओ.......  आओ......... क़रीब आओ।
मैनें हल्के चीख़ते हुये कहा- ठहरो मुझे कुछ बातें और जाननी हैं।
लड़की जम्हाई भरते हुए बोली, लेकिन अभी मुझे गर्म बिस्तर की ज़रूरत है या मैं दूसरे कमरे में चली जाऊं।
लड़की के चले जाने के बाद मैं लिफ्ट से नीचे उतर आया। सामने ही एक सुंदर पार्क था। एक खाली बेंच पर, न घर है, न ठिकाना, चेहरे वाला आदमी ऊँघ रहा था। उसने अपनी टोपी को आँखों पर झुका रखी थी।
मैंने उसके कानों में फुसफुसाकर कहा- इस गलीचे को आप क्या थोड़ा उघाड़ कर दिखा सकते हैं।
वह ज़रा भी न हिला। दाहिने हाथ को बढ़ाकर मधुर वाणी में कहा- पाँच डालर। उसके हाथों में पाँच डालर देते ही उस बूढ़े ने अपनी टोपी हटाते हुये मुझे देखा।
एक गहरी साँस निकालते हुए वह उठ खड़ा हुआ, कहा- आईये। पार्क के उस कोने का गलीचा सबसे पतला है।
बहुत ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ी। पार्क के निर्दिष्ट कोने में जाकर घुटने मोड़कर वह ज़मीन पर बैठ गया। जेब से एक चाकू निकालकर घास, मिट्टी के एक हिस्से को खुच-खुच करते हुये- काटने लगा और एक हिस्से के गलीचे को उखाड़ फेंका। कहा......जाओ, अब अंदर जा सकते हो।


नीचे एक गर्भगृह था। डरने की कोई बात नहीं थी। नीचे उतरने के लिये सीढि़याॅं भी बनी थी। मैं उतर गया। इतना बड़ा गर्भगृह मैनें कभी नहीं देखा था। इस किनारे से उस किनारे तक दृष्टि नहीं पहुंच रही थी। एक झुंझका अंधेरा था। टेबल रखा था। एक-एक टेबल पर एक-एक आदमी उदास बैठा था, शब्दहीन। सिर्फ एक दबी हुई हाय......हाय.... वहाँ की क़ैद हवाओं में तैर रही थी। बहुत सारी गहरी साँसें जैसे कोरस में कह रही हों- बहुत अकेला- बहुत अकेला।
ज्यादा खोजने की जरूरत नहीं हुई। एक टेबल पर सोनी लिस्टन बैठे थे। अपने विशाल काया को किसी तरह टेबल से सहारा देते हुए।


- मिस्टर लिस्टन, कुछ कहिये।
- क्या कहूँ .....अकेला....बहुत अकेला।
- मरते समय आप को क्या लगा था?
- ओह! मत कहिये। घर में कोई नहीं था। अकेला, बहुत अकेला।
- अकेला?
- बिलकुल अकेला।
- क्यूँ?
- वह तो मुझे नहीं पता। पत्नी कई दिनों के लिये कहीं बाहर गई थी। बच्चे भी साथ नहीं रहते थे। मैं था। घर मुझे खाने आ रहा था। दिल में बहुत दर्द था। कितनी बार बुलाया, चिल्लाया किसी ने सुना नहीं।
- उसके बाद!
- मैं लुढ़क गया ज़मीन पर, साँस लेने के लिये बेचैन था, किसी इन्सान का चेहरा देखना चाह रहा था।
- आप तो बहुत प्रसिद्व मुक्केबाज़ थे, विश्व चैंपियन। कितने पैसे थे आप के पास, कितने ही लोग पागल थे आपके लिये, फिर भी आप अकेले?
- फिर भी अकेला! और मत कहो।
- उसके बाद क्या हुआ?


तभी एक प्रेत ने अमेरिका के उस प्रसिद्व गलीचे को उठाते हुए कहा- अंदर चलो, अंदर चलो।
मैं चला आया, इसी जगह।
मैं उठ खड़ा हुआ। धीरे-धीरे ख़ोजते हुये विलियम होल्डेन भी मिल गये। यही वह मनोहारी अभिनेता हैं, आँखें मानने को तैयार नहीं थीं। हड्डियाँ बाहर निकल आयी हैं, चेहरे के दोनों चिकबोन बेढँगें बाहर हैं।


- मिस्टर होल्डेन?
- जी हाँ।
- मैं सिर्फ यह जानना चाहता हूँ कि मृत्यु के समय आप अकेले क्यूँ थे?
- मैं भी एक प्रश्न करना चाहता था, मृत्यु के समय अधिकतर अमेरिकन अकेले क्यूँ होते हैं। मुझे बेवकूफ की तरह देखता देखकर उन्होंने एक स्मित मुस्कान के साथ कहा- हर अमेरिकी अकेला होता है, निःसंग या आत्मीयहीन। अमेरिकन का कोई अपना नहीं रह पाता, बता सकते है क्यों?
- आपका कोई नहीं था, इतने पैसे, इतना धन, इतनी प्रसिद्धि और इतनी संतानें?
होल्डेन ने एक गहरी साँस भरी। और कहा- फिर भी क्यूँ विलियम होल्डेन अकेले मरते हैं, क्यूँ उनकी मृत्यु के पांच दिनों के बाद उनकी लाश पुलिस कमरे से बाहर निकालती है।
- यही मेरा सवाल है।
- मेरा भी सही सवाल है। अब जाइये, परेशान मत करिये।
मैं फिर ऊपर लौट आया।


अमेरिकन राष्ट्रपति से फोन पर दुबारा फिर बात हुई।

- माननीय राष्ट्रपति महोदय!
- कहिये भारतीय पर्यटक।
- मैं आपके देश में एक जगह, गलीचे को उठाकर अंदर चला गया था।
- अभिनंदन, भारतीय पर्यटक। क्या देखा आपने?
- बहुत कुछ, मैं जानना चाहता हूँ कि क्यूँ सोनी लिस्टन और विलियम होल्डेन निर्जन कमरे में मरे पाये गये थे।
- क्या?
- हाँ, माननीय राष्ट्रपति महोदय। अखबारों में उसके सबूत भी हैं।
- भारतीय पर्यटक, मैंने अभी-अभी खबर पायी है कि भारत तकनीकी कौशल में बहुत विकसित हो रहा है। वह मोटर और ट्रक बना सकता है। तुमने यह बात हमें नहीं बताई।
- लेकिन, माननीय राष्ट्रपति महोदय- आपने क्या देखा है- अधिकतर अमेरिकी बूढ़े, बुढापे में बिलकुल अकेले हो जाते हैं। उनकी पत्नियाँ बुढ़ापे में साथ नहीं रहतीं। छोड़कर चली जाती हैं। संतान भी बदल जाते हैं। मृत्यु के समय.........।


भारतीय पर्यटक तुमने अभी भी ह्यूस्टन नहीं देखा, अंपायर स्टेट बिल्डिंग पर नहीं चढ़े। लाॅस एंजेलस के जुआ घर में नहीं गये, यहाँ तक कि एक अमेरिकी युवती का चुंबन भी नहीं लिया। ये कैसी बात है!
लेकिन, माननीय राष्ट्रपति महोदय, अकेलेपन की इस बात को मुझे खत्म करने दीजिये, मैं अमेरिका के अंतरतम में प्रवेश कर ................।
गलीचे को हम फिर से बिछायेंगे भारतीय पर्यटक। अब इतना सुंदर होगा कि उसके नीचे क्या है उसे देखने का किसी का दिल भी नहीं करेगा।


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सोनी लिस्टन- यह पिछली सदी के पाँचवें व छठे दशक में अमेरिका के एक प्रसिद्व मुक्केबाज थे। वे 1962 में पैटरसन को पहले ही राउण्ड में धराशायी कर विश्व हेवीवेट चैम्पियन बने थे। मोहम्मद अली ने 1964 में इस दुर्जेय योद्वा को परास्त किया था। एक अवसाद से गुज़रते हुए इनकी मृत्यु अकेलेपन के माहौल में संदेहास्पद स्थिति में हुई।

विलियम होल्डेन-  यह पिछली सदी के पाँचवें से सातवें दशक तक अमेरिका के एक प्रसिद्व अभिनेता रहे। इस अवधि में बॉक्स आॅफिस पर इनकी तूती थी, लोग दीवाने थे, शोहरत बुलंदी पर थी। बेहद अकेलेपन और अवसाद से गुज़रते हुए इनकी मृत्यु सिर पर एक चोट की वजह से अधिक ख़ून बह जाने के कारण हुई। उस समय इनके पास कोई नहीं था और इनका शव मृत्यु के चार दिनों के बाद कमरे से बाहर निकल पाया।


- शेष अमित

रचनाकार परिचय
शेष अमित

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