मई 2015
अंक - 3 | कुल अंक - 55
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कविताएँ
कोशिश
 
हराना गलत नहीं होता,
रूकना गलत नहीं होता,
थक जाता है इंसान
लड़-लड़ कर,
थोड़ा सुस्ता लेना
गलत नहीं होता।
 
जीवन इतना भी छोटा नहीं
कि तुम फिर से लड़ ना सको,
रुकने का मतलब यह कतई नहीं कि,
तुम फिर से चल ना सको।
 
चींटी भी हज़ार बार गिरने के बाद
कोशिश करती है,
तू तो फिर भी इंसान है
तेरी हिम्मत कैसे
जवाब दे सकती है।
 
अब रुक ही गये हो तो सोचो,
क्या गलत हुआ
जो तुम हार गये,
तुम्हारी सोच में
तुम्हें जवाब मिलेगा,
हार को जीत में बदलने का
पैगाम मिलेगा।
 
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वक़्त
 
यह वक़्त चल रहा है,
या मैं बीत रही हूँ,
वह मेरे आगे है
और मैं उसके पीछे पड़ी हूँ।
 
यह कैसी दौड़ है मेरे और उसके बीच में,
ना वह हार रहा है,
ना में थक रही हूँ।
 
जिंदगी की अफरा-तफरी में,
मैं वक़्त से आगे निकलना चाहती हूँ,
वक़्त भी कुछ ऐसा ही मिज़ाज रखता है,
इसलिए अपनी कोशिशों में कभी कमी नहीं करता है।
 
काश वक़्त मेरा दोस्त होता,
हाथों में मेरे उसका हाथ होता,
साथ-साथ चलते दोनों,
अपनी एक ही मंज़िल,एक ही मक़ाम होता।
 
पर ऐसा कहाँ मुमकिन है,
दोस्ती और हम में नामुमकिन है।
पर आदत हमारी एक जैसी है,
वह आराम से बे-परवाह है
और थकना मेरी भी फितरत नहीं है।
 
जब ज़िन्दगी की शब होगी,
तो वक़्त भी ठहर जायेगा,
देखते-देखते हर लम्हा गुजर जायेगा।
 
सच ही तो है,
वक़्त और जिंदगी हमेशा कहाँ साथ देते हैं,
कितना भी सगा बना लो,
अंत में दगा देते हैं।

- मनीषा श्री

रचनाकार परिचय
मनीषा श्री

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