प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
अक्टूबर 2016
अंक -53

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

गीत-गंगा

नाव काग़ज़ की लहर पर छोड़ आई हूँ

नाव काग़ज़ की लहर पर छोड़ आई हूँ

बात पहले-सी नहीं है आज रिश्तों में,
बँट रही है ज़िंदगी अनगिनत किश्तों में।
प्राण के बंधन निमिष में तोड़ आई हूँ,
नाव काग़ज़ की लहर पर छोड़ आई हूँ।।

तृप्ति-तृष्णा का सतत संघर्ष है जारी,
रेत से अँजुरी भरी हर साध है क्वाँरी।
प्यास से नाता अधर का जोड़ आई हूँ,
नाव काग़ज़ की लहर पर छोड़ आई हूँ।।

स्व्प्नवंती ज़िंदगी भोगे है छलनाएँ,
उस पे ये साँसों के मेले व्यर्थ उलझाएँ।
पाँव अब अनहद डगर पर मोड़ आई हूँ,
नाव काग़ज़ की लहर पर छोड़ आई हूँ।।


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जीवन-दर्शन कहता है

एक हाथ में मरण, एक में जीवन रहता है
मैं वो ही कहती जो जीवन-दर्शन कहता है

काल के हाथों बिकी ज़िंदगी, समझ नहीं पाये,
आगत-विगत सभी लगते हैं सपनों के साये।
जल में रह कर मीन सरीखा तन-मन दहता है,
मैं वो ही कहती जो जीवन-दर्शन कहता है।।

प्राण चेतना को माया के फंदे कसते हैं,
दर्द अभावों का धन पाकर आँसू हँसते हैं।
टूटन-जुड़न सभी कुछ अपना दरपन सहता है,
मैं वो ही कहती जो जीवन-दर्शन कहता है।।

बीत गया आधा जीवन, अभी आधा बाक़ी है,
पीना है हर जाम लिए जो वक़्त का साकी है।
होना चाहूँ मुक्त मगर इक बंधन गहता है,
मैं वो ही कहती जो जीवन दर्शन कहता है।।

 


- मीरा शलभ
 
रचनाकार परिचय
मीरा शलभ

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गीत-गंगा (1)