सितम्बर 2016
अंक - 18 | कुल अंक - 55
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
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लेख

आज शिक्षक दिवस है, आओ आधुनिक गुरुओं/शिक्षकों का गुणगान करें: कैलाश मंडलोई


एक शिक्षक की महत्ता दुनिया की सारी सभ्यताओं और संस्कृतियों में एक जैसी है। हमारे देश की संस्कृति में शिक्षक को भगवान से ऊपर स्थान दिया गया है। भारत में आदि काल से ही शिक्षकों को मान-सम्मान मिलता रहा है। इसका वर्णन महाभारत, रामायण जैसे धर्म ग्रंथों में भी है। गुरुकुल की व्यवस्था भारत में शिक्षा और शिक्षकों के आदर सम्मान की कहानी बयान करती है। भारत में जब विदेशी शासकों का दौर चला, तब भी शिक्षा की पद्धति में कई सारे बदलाव जरूर आए, लेकिन गुरुओं के मान-सम्मान में कहीं कोई कमी नहीं आई। समय के बदलने के साथ ही परंपराएं बदलीं, भारत आज़ाद हुआ और एक वक़्त आया जब भारत ने 5 सितंबर को शिक्षक दिवस मनाने की नई परंपरा की शुरुआत की।

5 सितंबर यानी शिक्षक दिवस। यह दिन हमें उस महान व्यक्ति की याद दिलाता है, जो एक महान शिक्षक के साथ-साथ राजनीतिज्ञ एवं दार्शनिक भी थे। उस महान व्यक्तित्व को पूरी दुनिया डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के नाम से जानती है। शिक्षक के रूप में उनकी प्रसिद्धि के कारण ही उनका जन्मदिन शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है। कहा जाता है कि एक बार उनके मित्रों और शिष्यों ने उनका जन्मदिन मनाने का आग्रह किया तो उन्होंने उसे शिक्षक दिवस के रूप में मनाने का सुझाव दिया। वे चाहते थे कि इस दिन अच्छे शिक्षकों को सम्मानित किया जाए और शिक्षकों को उनके उत्तरदायित्वों एवं कर्तव्यों के प्रति जागरूक किया जाए, क्योंकि देश के विकास के लिए बेहतर शिक्षा सबसे जरूरी कारक है। तभी से हर 5 सितंबर को शिक्षक दिवस मनाया जाता है। इसी दिन केंद्र सरकार द्वारा देश भर के श्रेष्ठ शिक्षकों को पुरस्कार देकर सम्मानित भी किया जाता है।
इस दिन छात्र अपने सबसे प्रिय शिक्षक को तरह-तरह के उपहार भेंट करते हैं, उनके सम्मान में तारीफ के दो शब्द कहते हैं। छात्र अपना स्नेह व्यक्त करने के लिए विद्यालयों में कई तरह के कार्यक्रमों का भी आयोजन करते हैं।

ईश्वर ने तो सृष्टि बनाई है मगर इसे सजाया है शिक्षकों ने, सभ्यता की नींव रखने वाले जीव को मनुष्य बनाने वाले शिक्षक ही तो हैं। शिक्षक एक दीये की तरह होता है, जो अपनी ज्ञान-दीप्ति से सैकड़ों दीये प्रज्वलित कर सकता है। यदि शिक्षा प्रकाश है तो शिक्षक सूर्य है, जिससे सम्पूर्ण जगत दीप्तिमान होता है।
महर्षि अरविंद ने शिक्षकों के सम्बन्ध में कहा है कि शिक्षक राष्ट्र की संस्कृति के चतुर माली होते हैं। वे संस्कारों की जड़ों में खाद देते हैं और अपने श्रम से सींचकर उन्हें शक्ति में निर्मित करते हैं। महर्षि अरविंद का मानना था कि किसी राष्ट्र के वास्तविक निर्माता उस देश के शिक्षक होते हैं। इस प्रकार एक विकसित, समृद्ध और खुशहाल देश व विश्व के निर्माण में शिक्षकों की भूमिका ही सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण होती है।


कच्चे घड़े की भांति स्कूल में पढ़ने वाले विद्यार्थियों को जिस रूप में ढालो वे ढल जाते हैं। वे स्कूल में जो सीखते हैं या जैसा सिखाया जाता है, वे वैसा ही व्यवहार करते हैं। उनकी मानसिकता भी कुछ वैसी ही बन जाती है, जैसा वह अपने आस-पास देखते हैं। आज कोई भी बालक 2-3 वर्ष की अवस्था में विद्यालय में शिक्षा ग्रहण करने के लिए आता है। इस बचपन की अवस्था में बालक का मन-मस्तिष्क एक कोरे कागज के समान होता है। इस कोरे कागज रूपी मन-मस्तिष्क में विद्यालयों के शिक्षकों के द्वारा शिक्षा के माध्यम से शुरूआत के 5-6 वर्षो में दिये गये संस्कार एवं गुण उनके सम्पूर्ण जीवन को सुन्दर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं।
नन्हे इंसान को अपने चारों ओर की दुनिया को जानना-समझना कैसे सिखाया जाये, कैसे शिक्षा पाने में उसकी मदद की जाये, उसके दिमागी काम को आसान बनाया जाए। कैसे उसमें मानव-गरिमा की चेतना, इंसान की नेकी में विश्वास और मातृभूमि से असीम प्रेम की भावनाएं विकसित की जाए। कैसे बच्चे की सूक्ष्म बुद्धि और संवेदनशील हृदय में उदात्त मानवीय आदर्शों के प्रति आस्था और निष्ठा के पहले बीज बोए जाएँ। यही वह कार्य है, जो एक शिक्षक छात्रों को अपने विषय का ज्ञान देने के साथ-साथ उसके चरित्र-निर्माण के लिए करता है।


शिक्षक समाज के शिल्पकार होते हैं, यूं तो जीवन में माता-पिता का स्थान तो कभी कोई नहीं ले सकता, लेकिन एक व्यक्ति के जीवन को आकार देने में उसके माता-पिता से ज्यादा एक अच्छे शिक्षक का योगदान होता है। किसी भी सुन्दर मूर्ति को तराशने में शिल्पकार की बहुत बड़ी भूमिका होती है। एक अच्छा शिल्पकार किसी भी प्रकार के पत्थर को तराश कर उसे सुन्दर आकृति का रूप दे देता है। यदि शिल्पकार तथा कुम्हार द्वारा तैयार की गयी मूर्ति एवं बर्तन सुन्दर नहीं है तो वह जिस स्थान पर रखे जायेंगे, उस स्थान को और अधिक विकृत स्वरूप ही प्रदान करेंगे। इस प्रकार शिक्षक उस शिल्पकार या कुम्हार की भाँति होता है, जो प्रत्येक बालक को समाज की आवश्यकताओं के अनुरूप, एक सुन्दर आकृति का रूप प्रदान कर, उसे 'समाज का प्रकाश' अथवा उसे विकृत रूप प्रदान कर 'समाज का अंधकार' बना सकता है। स्कूलों एवं उसके शिक्षकों का यह प्रथम दायित्व एवं कर्तव्य है कि वह अपने यहाँ अध्ययनरत् सभी बच्चों को इस प्रकार से संवारे और सजाये कि उनके द्वारा शिक्षित किए गये सभी बच्चे 'विश्व का प्रकाश' बनकर सारे विश्व को अपनी रोशनी से प्रकाशित कर सकें।

आज शिक्षण संस्थान, शिक्षा और शिक्षक का स्वरूप बदल गया है। सरकार की दोषपूर्ण शिक्षा नीति तथा शिक्षा के निजीकरण के कारण स्कूलों व शिक्षकों की गरिमा घट गई है। वेदों के अनुसार शैक्षणिक संस्थाएँ एक देवालय के समान है, जहाँ शिक्षा की सुगंध फैली होती है। किन्तु आज विश्व में अधिकतर शैक्षिक संस्थाएं व्यावसायिक 'दुकानों' में बदल गई हैं, जहाँ शिक्षा 'बेची जाती' है। शिक्षा जिसे अब व्यापार समझकर बेचा जाने लगा है। आज पैसा इस कदर हावी हो चुका है कि शिक्षकों की भी प्राथमिकता ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाना बन चुकी है। अपने लालच को शांत करने के लिए आज शिक्षक अपने ज्ञान की बोली लगाने लगे हैं। श्रेष्ठ स्कूलों में अत्यधिक शुल्क लिया जाता है, जो सामान्य मध्यम वर्गीय परिवार के सामर्थ्य से बाहर है। ये समर्थ और असमर्थ लोगों के बीच एक खाई उत्पन्न करती हैं। शिक्षा के निजीकरण ने समाज के उच्च वर्गो के स्वार्थ के लिए अमीरों और गरीबों के बीच विषमता को बढ़ाने का काम किया है। इसके लिये सरकार और निजी संस्थान दोनों शिक्षा के व्यवसायीकरण के लिए समान रूप से जिम्मेदार है। शैक्षिक संस्थानों के प्रशासकों के लिए समय आ गया है कि शिक्षा की पवित्रता और महत्ता को महसूस करें और इसका व्यवसायीकरण न करें। यह सरकार की जवाबदेही है कि उचित कानून बनाकर शिक्षा के निजीकरण से उत्पन्न समस्याओं को रोके ताकि देश की नींव को सुरक्षित रखा जा सके।

गुरु-शिष्य परंपरा भारत की संस्कृति का अहम और पवित्र हिस्सा है, जिसके कई स्वर्णिम उदाहरण हमारे इतिहास में दर्ज है। लेकिन वर्तमान समय में कई ऐसे लोग भी हैं, जो अपने अनैतिक कारनामों और लालची स्वभाव के कारण इस परंपरा पर गहरा आघात कर रहे हैं। इतना ही नहीं वर्तमान हालात तो इससे भी बदतर हो गए है क्योंकि शिक्षा की आड़ में कई शिक्षक अपने छात्रों की शारीरिक और मानसिक शोषण करने को अपना अधिकार ही मान बैठे हैं। शिक्षकों के बहुत से ऎसे उदाहरण भी हैं जो शिक्षक जैसे सम्मानित पद को शर्मसार कर रहे हैं, ऎसे में इन शिक्षकों को भी नैतिकता का मूल्य पढ़ाने की आवश्यकता है।
माना कि मूल्यों का क्षय हुआ है और यह हर क्षेत्र में हो रहा है, जब माता-पिता का सम्मान नहीं है, शिक्षक की बात क्या करें? लेकिन चाहे जितना क्षय हो जाए, बीज रूप में वो हमेशा रहेगा और फिर बीज से ही तो अंकुर उगेगा और फिर से हमें उसी युग में ले जायेगा। मैं शिक्षक होने के नाते यह मानता हूं कि आज भी कुछ संस्कारी छात्र हैं, जो इस दिन पर अपना आदर भाव शिक्षक को भेजते हैं। दोष सिर्फ छात्रों का या शिक्षकों का नहीं है, दोष है युग का। जब सारे आदर्श और जीवन मूल्य टूट रहे हैं विज्ञान से प्रभावित हो रहे हैं, तब हम कैसे आशा कर सकते हैं कि हर बात पहले जैसी ही हो। फिर मान-सम्मान तो दिल से आता है और अगर नहीं आए तो छोड़ देना चाहिए। हर युग अपने साथ कुछ अच्छाई और कुछ बुराई लेकर आता है और चला जाता है। यह युग भी बीत जाएगा और आने वाले युग के लिए कुछ न कुछ अच्छा अवश्य छोड़ जाएगा।


हालांकि कई बार गलत कारणों से गुरु-शिष्य रिश्ता कलंकित भी हुआ है। लेकिन इसके बावजूद हम समाज के इन शिल्पकारों के योगदान को कभी नहीं भुला सकते है। आज हम बात कर रहे है ऐसे शिक्षकों की जिन्होंने एक अनुकरणीय उदाहरण पेश किया। हो सकता है आपके जीवन में भी कभी एक ऐसा गुरु या शिक्षक का आगमन हुआ है, जिसने आपके जीवन की दिशा बदल दी या फिर आपको जीवन जीने का सही ढंग सिखाया हो। तो आइये इस शिक्षक दिवस पर शिक्षकों से अनुरोध करते हैं कि देश के विकास के लिए वे अपने उत्तरदायित्व एवं कर्तव्यों का निर्वाह पूरी ईमानदारी से करें और डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के सपनों को साकार करें। आओ आज हम सभी उन गुरुओं, आचार्यों, शिक्षकों, अध्यापकों, मास्टरों, टीचरों को बधाइयाँ दे, उन्हें याद करें, जिन्होंने हमारे जीवन-दर्शन को कहीं न कहीं से प्रभावित किया। गुरु का नाम ज़रूर बदला है, लेकिन हर एक के जीवन में कहीं न कहीं गुरु रूपी तत्व का समावेश ज़रूर है।


- कैलाश मंडलोई

रचनाकार परिचय
कैलाश मंडलोई

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