प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
सितम्बर 2016
अंक -53

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम

लघुकथा- हाजी साहब

धीमे-धीमे क़दमों से चलते हुए नमाज़ी मस्जिद से बाहर आ रहे थे। कुछ अपने घरों को जा चुके थे तो कुछ सड़क के किनारे बातचीत में व्यस्त थे।
रहमान साहब अपने एक नमाज़ी दोस्त से कह रहे थे, "देखिए! अहमद साहब जा रहे हैं। दो-चार दिनों पहले हज करके लौटे हैं। अल्लाह ने उनको किस तरह नवाज़ा है कि ऑफिस में तो बड़े ओहदे पर बने ही हुए हैं साथ ही साथ सोसाइटी के सचिव बनकर भी लाखों बनाने में जुटे हैं। अपनी-अपनी क़िस्मत है भाई और क्या?" रहमान साहब ने बेहद दुःखी लहज़े में अपनी बात कही।

तब जमाल साहब ने उनके चेहरे की ओर गौर से देखा, फिर कुछ पल ख़ामोश रहने के बाद कहा, "फिर एक आम आदमी और हाजी में फ़र्क ही क्या रहा रहमान भाई? जबकि वह हज से वापसी के बाद भी हराम की कमाई को जायज़ समझता है। मैं तो बस इतना जानता हूँ कि अल्लाह की नज़र में सच्चा और नेक बंदा वही होता है, जो जायज़ कमाई से अपने और अपने परिवार का पालन पोषण करता है। यह तो भटके हुए इंसान हैं, कोई हाजी साहब नहीं।
अल्लाह इन्हें दोजख (नरक) की आग और क़ब्र के आज़ाब (दंड) से बचाए।

 

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लघुकथा- सीढ़ियाँ


बड़े भाई ने जब छोटे भाई से कहा, "मेरी फॅमिली भी तुम्हारे ख़ूबसूरत शहर से छुट्टियों में घूम-फिर कर वापिस आ गयी तो अब क्यों नहीं, एक बार अब्बू को भी अपने शहर ले जाकर सैर करा दो।"
यह सुनना था कि छोटे भाई ने नाक-भौं सिकुड़ते हुए कहना शुरू किया, भाईजान! आप भी कैसी बातें करते हैं। वह फ्लैट की सीढ़ियाँ तो उतर नहीं सकते। उनके भारी-भरकम शरीर को संभालने के लिए दो-दो लोगों का सहारा लेना पड़ता है और आप कह रहे हैं कि उन्हें कश्मीर की वादियों में घुमा दूँ। ज़रा बताइए तो सही यह पटना जंक्शन की ऊँची सीढ़ियाँ चढ़ सकेंगे?"
बड़े भाई ने बड़े ध्यान से उसकी बातें सुनीं, फिर बोला, बात तो ठीक ही कर रहे हो तुम। मगर यह कैसे भूल गये कि अब्बू की ही उँगलियाँ पकड़कर तुमने चलना-फिरना और उठना-बैठना सीखा है। आज वह बिना सहारे के चलने फिरने से लाचार हैं, तो फिर हम क्यों नहीं उनका सहारा बन सकते?"
अब वह सिर झुकाये ख़ामोश खड़ा था।


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लघुकथा- सवाल


वर्षा की तेज़ फुहारों से जब कबूतर और कबूतरी का जोड़ा भीगने लगा तो वे तेज़ी से उड़ते हुए झरोखे के रास्ते से एक भवन में जा घुसे, जहाँ कमरे में कोई नहीं था।
कबूतरी ने सतर्कतावश अपनी नज़रें इधर-उधर घुमायीं तो उसे कमरे की छत से पानी टपकते हुए दिखा और कमरे की दीवारें कई जगह से फटी दिखीं। वह चुप नहीं रही।
"बाहर से तो यह भवन बिलकुल नया दिखता है किंतु भीतर से इतनी बुरी हालत क्यों है? इससे अच्छा तो वह पुराना भवन ही था, जहाँ पहले ऑफिस चलते थे।"
ठीक कह रही हो तुम। इसीलिए तो पुराने भवन को नेस्तनाबूद कर दिया गया ताकि लोग सवाल नहीं कर सकें।


- डॉ. तारिक असलम तस्नीन
 
रचनाकार परिचय
डॉ. तारिक असलम तस्नीन

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