प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
सितम्बर 2016
अंक -52

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

गीत-गंगा

साँझ बनकर तुम ढ़लो

भोर प्यारी तुम सुहानी, मैं प्रखर दिनमान हूँ।
साँझ बनकर तुम ढ़लो जब, दीप का प्रतिमान हूँ।।

कनक कंचन तन तुम्हारा, हृदय गंगा धार है।
मन महकता बन कसूरी, प्रेम का अभिसार है।
आभ हीरक तुम प्रिये मैं, कोयले की खान हूँ।
साँझ बनकर तुम ढ़लो जब, दीप का प्रतिमान हूँ।।

लालिमा ललना तुम्हारी, शोभती बन कर किरण।
नयन चंचल लग रहे हैं, भागते वन में हिरण।
तुम नदी की सजल धारा, मैं जलधि अभिमान हूँ।
साँझ बनकर तुम ढ़लो जब, दीप का प्रतिमान हूँ।।

देख कर तेरी हँसी को, झूमते हैं बाग़ वन।
मधु छलकता है अधर से, देह चन्दन का सदन।।
राग सरगम से सजी तुम, मैं प्रकृति का गान हूँ।
साँझ बनकर तुम ढ़लो जब, दीप का प्रतिमान हूँ।।


*******************************


जाने कब??

जाने कब मन प्रमुदित होगा, मेघ गगन में छायेंगें।
जाने कब ये मेघदूत सब, तेरी छवि दिखलायेंगें।।

रिमझिम बूंदों की बारिश से, अंतस भीगा जायेगा।
प्रेम जलज मन नयनों में, सौरभ को बिखरायेगा।
जाने कब कोयल कूकेगी, झींगुर शोर मचायेंगे।
जाने कब ये मेघदूत सब, तेरी छवि दिखलायेंगे।।

सूख रही मन की सरिता अब, पंकिल जीवन धारा है।
सुमनों पर झिलमिल करती जो, बूँदें वही सहारा है।।
जाने कब पुरवा बहकेगी, विद्युत कब डरवायेंगे।
जाने कब ये मेघदूत सब, तेरी छवि दिखलायेंगे।।

उर उमंग उन्मादित होगा, प्रेम लिए जब आओगे।
शीतल आलिंगन देकर प्रिय, प्रीत अंग सरसाओगे।
जाने कब बदरा नभ आकर, मधु बूँदें बरसायेंगे।
जाने कब ये मेघदूत सब, तेरी छवि दिखलायेंगें।।


******************************


हृदय की पीर

हृदय पीर की अकथ कहानी, अकथ रही है परिभाषा।
कभी निर्दयी छल करती है, कभी दिखाती है आशा।
शब्द नहीं जिनसे रच डालूँ, पीड़ा अपने गीतों में,
मौन हुए जब अधर पीर से, मुखर हुई तब दृग भाषा।।

लगे तिक्त वट की छाया औ, मेघ नहीं मन हरसाते।
गुनगुन करती भौरों की धुन, अधर हास नहीं ले आते।
तप्त लगे शीतल संझा जब, रुष्ट लगे सारी बेला,
हृदय धरा पर तब सावन बन, नयन अश्रु हैं बरसाते।।

सुनो प्रिये! इस विकल हृदय की, पीड़ा तुमसे कहती है।
निशि वासर तुम दूर बसे ये, दूरी कैसे सहती है।
कहने को तो मधुर लगे जब, सुधियाँ तेरी हैं आती।
पर होकर उन्मत्त विरह से, पीर हृदय में बहती है।।

धीर धरूँ हिय पीर भरूँ प्रिय, प्राण सजल पर हो जायें।
मधुर मिलन के जब सपने सब, हृदय धरा पर खो जायें।
आस करूँ तब बन नीरद तुम, मन अम्बर पर छा जाओ।
ऐसा बरसो घिमिर घिमिर प्रिय, बीज प्रीत हम बो पायें।


******************************


प्रेमपत्र

सुनो प्रिये ये पत्र समझना, है अभिव्यक्ति यही मन की।
शब्दों की माला में गूँथी, बातें सब अंतर्मन की।।
समझ नही पाती क्या दे दूँ, तुमको प्रिय मैं उद्बोधन।
छलक पड़े नयनों से सागर, सुनकर मेरा सम्बोधन।

सुधियों में सुरभित रहती हैं, प्रथम मिलन की वो बातें।
कोकिल से गुँजित वो दिन थे, जुगनू से जगमग रातें।
चपला जैसे अंतस चमके, तेरा हरदम मुस्काना।
मधुपूरित तेरे नयनों से, मद पी मेरा भरमाना।।

बात बात बिन बात हँसू मैं, सोचूं जब बंधन प्यारा।
सखियों से भी कब कह पाऊँ, जीवन अब तुम पर वारा।
बिन रिश्तें के बँधी हुई मैं, जैसे चाँद चकोर बँधे।
बिन बंधन के जैसे नदियाँ, तटबन्धों के साथ सधे।

संग तुम्हारे सुनो प्रिये तुम, मुखरित मेरा मौन हुआ।
बिना किसी साथी के जग में, पूर्ण बताओ कौन हुआ।
प्रणय निवेदन है ये मेरा, तुम इसको स्वीकार करो।
निज मानस से हिय तक अपने, प्रिये प्रीत रसधार भरो।।

प्रेम प्रभा में रजनी डूबे, कुसुमित सारे दिवस करो।
एकाकी जीवन को तज कर, तुम मन का सन्ताप हरो।
तुमको अर्पित तन मन सारा, विधि से अब क्या भय करना।
आस साथ विश्वास लिये तुम, हाथों को मेरे धरना।।

अँधियारा मन का हरना...
साथ सदा मेरे रहना...
सुनो प्रिये ये पत्र समझना, है अभिव्यक्ति यही मन की।।


- श्वेता राय
 
रचनाकार परिचय
श्वेता राय

पत्रिका में आपका योगदान . . .
गीत-गंगा (1)