प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
अगस्त 2016
अंक -53

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम

लघुकथा- दावत

 

फुटपाथ पर इमली बेचने वाली बुढ़िया घर पहुँची तो बहुत खुश थी। उसकी पोती ने पूछा- "दादी, क्या हुआ? आज बड़ी खुश हो।"
बुढ़िया चहकती हुई बोली- "जानती है, आज पुलिस वाले ने मुझसे बैठकी नहीं ली। उसका परमोसन हुआ है…बोला- "जा, आज इसी पैसे से कुछ बढ़िया-सा बनाकर खा ले और अपनी पोती को भी खिला दे।"
"अरे वाह! फिर तो दादी आज बच ही गये बीस रूपये!"
"हाँ बेटी, जा खरीद ला जो खाना है।"
"दादी, आप एक बार कह रही थीं कि आपको अरहर की दाल खाये एक ज़माना हो गया।"
"हाँ रे, जब तेरे दादा थे, लाते थे कभी-कभार। शाम को रिक्शा चलाकर लौटते वक्त।" उनकी आँखें नम हो आईं।
"तो वही ले आऊँ दादी। मेरा भी खाने का मन है, मैंने तो कभी चखी ही नही।"
"अरे ना रे! बीस रुपये में कितनी मिलेगी अरहर की दाल! सुना है डेढ-दो सौ का भाव है।"
"कुछ तो मिलेगी, दादी! सौ-पचास ग्राम ही सही। आज हम भी दावत करेंगे।" कहती हुई वह भाग गई।
 
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लघुकथा- कार
 
"पापा, मुझे वो वाली लेना है..वो..वो वाली।" मेले में खिलौने वाली दुकान पर चिण्टू ने पहुँच से दूर रखी कार की ओर चपलता से इशारा किया।
"इसे ले न! यह बढ़िया है, देख यह कैसे दौडती है।" उसके पापा ने पास ही रखी एक कार दुकान के पटल पर चलाकर कहा।
"नहीं, मैं वही लूँगा, वही वही।" चिण्टू हाथ-पाँव इधर-उधर फेंकते हुए ठुनकने लगा।
"अच्छे बच्चे जिद नहीं करते मेरे लाल!" इस बार बच्चे की मम्मी ने उसे समझाना चाहा-"वो मँहगी है, उसे खरीदना तेरे पापा के वश की बात नहीं है।"
पर चिण्टू न माना। "मैं वही लूँगा, वही लूँगा" कह-कह रोए जा रहा था।
एक महाशय, जो थोड़ी देर पहले अपने बेटे के साथ कार से खिलौने खरीदने के लिए आये थे, को चिण्टू के स्यापे पर तरस आ गया। उन्होंने दुकानदार से वही कार लेकर चिण्टू के पापा को उपेक्षित नजरों से देखते हुए चिण्टू की ओर बढ़ाया- "लो बेटे, ले जाओ, पैसे मैं दे दूँगा।"
चिण्टू चुप हो गया। उसने कार लेने से पहले पापा की आँखों में बड़े गौर से झाँका,फिर बोला- "सॉरी अंकल, थैंक यू! पर मुझे अपने पापा पर नाज़ है। जब मैं पढ़-लिखकर बड़ा आदमी बन जाऊँगा तो आपकी कार से बड़ी कार खरीद लूँगा।

- मुन्नू लाल
 
रचनाकार परिचय
मुन्नू लाल

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कथा-कुसुम (3)