प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
अगस्त 2016
अंक -53

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

आलेख

नए उपन्यासों में पर्यावरण विमर्श: डॉ. मोनिका देवी

समाज में चारों तरफ पर्यावरण है। पर्यावरण मानव जीवन का सह अस्तित्व है। मानव जो कुछ भी महसूस करता है, पर्यावरण उसका कारण है। वायु, जल, वस्त्र-परिधान, प्रकाश, सूर्य की रौशनी, मौसम, अग्नि, वर्षा, भूमि, आबादी, आवास, उद्योग, जीव जंतु एवं वनस्पति सभी पर्यावरण के अवयव हैं। यहां तक कि एक मनुष्य दूसरे मनुष्य के लिए पर्यावरण का एक भाग होता है। पर्यावरण के कुछ अवयव मानव जीवन के अभिन्न अंग हैं। वायु एवं जल के बिना जीवन संभव नहीं तथा अन्य मानव जीवन के सुख, सुविधा एवं उपभोग के साधन, सूर्य ऊर्जा का स्रोत है। पृथ्वी आधार है, वर्षा जल आपूर्ति का साधन है। वनस्पतियां एवं जंतु मनुष्य क खाद्य हैं।
आधुनिकता के नाम पर पर्यावरण को अधिक आघात पहुंच रहा है। भौतिकवाद के कारण आधुनिक मानव की आवश्यकताओं में वृद्धि के कारण प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन हो रहा है, जिसमें पर्यावरण को लगातार नुकसान हो रहा है। हमारी भूलों का परिणाम प्रदूषण, दैवीय प्रकोप और सांस्कृतिक समस्याओं के रूप में प्रकट होने लगा है। इससे आज लोगों में चिंता होना स्वाभाविक है।


विद्यासागर नौटियाल का पहाड़ी जनजीवन और प्रकृति पर आधारित ‘झुंड से बिछुड़ा‘ (2008) उपन्यास है। हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध कथाकार विद्यासागर नौटियाल अपने कथा लेखन में बार-बार पहाड़ पर ही लौटते या पहाड़ी जीवन के बारे में लिखते हैं। लेकिन अपने समकालीन किसी दूसरे पहाड़ी लेखक की तरह नहीं, उनके कथा लेखन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे पहाड़ के भीतर किसी देशी या विदेशी पर्यटक की तरह प्रवेश नहीं करते बल्कि तमाम प्रचलित मिथकों, किवंदतियों, रूढ़ियों, अंधविश्वासों को चीरते हुए पहाड़ी जीवन के संदर्भ को चित्रित करते हैं। और साथ ही वहां से हर बार एक नयी कथा शैली और प्रविधि के साथ चुपचाप पहाड़ और पहाड़ी लोगों के दुःख भरे संघर्ष को, उनके अकेलेपन को जीवंतता के साथ उठाते हैं।
इस उपन्यास की कथा का आरंभ शांति की गाय के मारे जाने से होता है। यह केवल एक पशु की मौत न होकर पहाड़ की कठिन जिंदगी पर मृत्यु की काली छाया का आ जाना है। इसमें वे पहाड़ी जीवन की सांस्कृतिक झलक के बीच बाह्य के आतंक को उठाते हैं। यहां बध्वा शब्द आतंक का पर्याय है। पहाड़ी जन-जीवन के लिए जिसका अर्थ बहुत व्यापक है। बध्वा का आतंक सरकारी तंत्र और सेठ के आतंक से भी बड़ा महसूस होता है।
वहां के लोग कैसे अपना सारा जीवन इसी पहाड़ी की जलवायु में काट देते हैं और डरे-डरे रहते हैं। यह आतंक रूपी बाद्य किसी को दिखाई नहीं देता है। आनन-फानन में अपना काम करके चुपचाप चला जाता है।
उपन्यास में शिकार के बारे में तथा पहाड़ों पर सूरज कितनी गर्मी करता है। बेशक उपन्यास का फलक बहुत छोटा है लेकिन किसी आलोचक को इस उपन्यास में पहाड़ी लोगों के जीवन के बाघ के आतंक के बारे में पढ़ते हुए अमेरिकी उपन्यासकार हेमिंग्वे की अमर कृति ‘डेथ इन द आफ्टरनून‘ का स्मरण होता है तो बिल्कुल सही है क्योंकि यहां शिकार केवल शिकारी नहीं, बल्कि कला, रोमांस और जीवन की गतिशीलता का प्रतीक भी है।


डाॅ.अरुण श्याम कृत ‘मितवा‘ उपन्यास 2007 में प्रकाशित हुआ है। डाॅ.अरुण श्याम की लेखनी में चरित्र-चित्रण के बल पर कृति को लोकप्रिय बना देने की विशेषता है। ‘मितवा‘ उपन्यास इस विशेषता को उजागर करता है। उपन्यास के मुख्य पात्र 'देवऋषि' के माध्यम से उन्होंने जिस तरह मानवीय संवेदनाओं और संबंधों की बारीकियों को प्रस्तुत किया है, वह बहुत ही दुर्लभ है। यही कारण है कि ‘मितवा‘ उपन्यास के पाठकों को देवऋषि के प्रति सहज स्वाभाविक सहानुभूति होने लगती है।
पर्वतीय पृष्ठभूमि पर लिखे गये इस उपन्यास में मनोरम प्रकृति का वर्णन है। वहां के जन जीवन का जीवंत चित्रण है। उपन्यास में पर्वतीय क्षेत्रों के लोगों के रहन-सहन और आचार-विचार को उजागर किया है। ‘मितवा‘ में इंसान और इंसानियत का यथार्थ व उचित चित्रण है। मितवा कोई भी हो सकता है। यदि वह स्नेह और अपनत्व को नैतिक धरातल पर ही अनुभव करता है। यहां एक डाॅक्टर का चरित्र एक ऐसे इंसान का चरित्र है, जो अपने कर्तव्यों के उचित मानदंड पर धंसा है। लेखिका ने डाॅ. देवऋषि को ‘मितवा‘ के रूप में लाकर एक सच्चे इंसान का दर्शन कराया है। यह वास्तव में अभूतपूर्व है।


यह उपन्यास आंचलिकता का बोध कराता है जबकि भाषा शैली के आधार पर उपन्यास को आंचलिक कृति नहीं कहा जा सकता। उपन्यास की बोलचाल की भाषा सामान्य हिंदी है और शैली विवरणात्मक है। संवादों में कथानक की पृष्ठभूमि के अनुकूल कुमाऊंनी शब्दों का सीमित प्रयोग किया गया है। उपन्यास की शैली विवरणात्मक होने से इसका प्रभाव कृति की रोचकता को बढ़ाता ही है। डाॅ.देवऋषि कहते हैं कि आज के युवाओं को मेहनत करके पढ़ाई करना, समय का गलत उपयोग लगता है। इस तरह से युवाओं के लिए डाॅ.देवऋषि एक अच्छा उदाहरण हैं तथा इन्सानियत का रूप है। जो लोग क्लीनिक नहीं आते उनको देखने के लिए वे वहां पहाड़ की ऊंची-नीची चढ़ाई चढ़कर जाते थे। उनको पहाड़ की चढ़ाई में कोई समस्या नहीं है। वे सिर्फ अपना कर्तव्य याद रखते हैं।

कामतानाथ का ‘पिघलेगी बर्फ‘ 2006 में लिखित उपन्यास है। यह एक व्यक्ति की कहानी है। उपन्यास में संपूर्णता पर बल दिया जाता है। कथावाचक के जीवन की विभिन्न दशाओं का वर्णन इस उपन्यास में है, या यों कहें कि घर से भागने की एक घटना के उपरांत विभिन्न स्थितियों में पड़कर वह कैसे उनसे संघर्ष करता है नरेटर के रूप में लगातार यात्राएँ करता रहता है। यात्राएँ करना भी ठीक नहीं है, वह जिंदगी की कठिनाइयों का मुकाबला नहीं करता वरन् उसे छोड़कर दूसरा ही मार्ग अपना लेता है। जो वह अपनाता है उसमें भी उसे कम संघर्ष नहीं करना पड़ता।
वह पिता की मार खा भागकर फौज में भरती होता है, फौज से भगोड़ा बनकर स्थितियों में फंसकर तिब्बत जाता है। तिब्बत में प्रेम करता है तथा अपना घर बसाता है। वहां पर चीनी फौज का कब्ज़ा हो जाने के कारण वह वापस भारत आता है। भारत आकर वह भारत की फौज और आज़ाद हिंद फौज से पेंशन पाने की उम्मीद करता है। परंतु भगोड़े सैनिक के लिए यह उम्मीद करना बड़ा स्वप्न था।


यह उपन्यास इतिहास, संस्कृति, भूगोल और प्रेम के ताने बाने में बुना गया है। प्रेम जीवन की अनिवार्य निजी आवश्यकता है तो इतिहास और संस्कृति व्यक्ति और समाज को पहचान देते हैं। भूगोल एक स्थिर स्वरूप देता है। मसलन तिब्बत की ठंडी जलवायु के कारण वहां का समाज, व्यक्ति अलग किस्म का होगा, उस समाज की सांस्कृतिक भंगिमाएं भी अलग किस्म की होंगी। साथ ही पूरा उपन्यास कई स्वतंत्र कथा संदर्भों से मिलकर बना है। उन कथा संदर्भों के बीच कुछ करुण रोचक प्रसंगों का चित्रण है। पिता की कहानी, आज़ाद हिंद फौज का गठन और गतिविधियां भगोड़े की जिंदगी, तिब्बत में रहने और प्रेम के प्रसंग, चीनी आक्रमण का संदर्भ, तिब्बत त्याग और कैलास मानसरोवर होते हुए भारत पहुंचने तक के संदर्भ कुछ ऐसे ही कथा संदर्भ हैं।

'रेहन पर रग्घू' 2008 में लिखा गया उपन्यास है। भूमंडलीकरण के परिणाम स्वरूप संवेदना संबंध और उसका प्रामाणिक और गहन अंकन है ‘रहन पर रग्घू‘। यह उपन्यास वस्तुतः गांव, शहर से लेकर अमेरिका तक के भूगोल में फैला हुआ है और अकेले और निहत्थे पड़ते जा रहे मनुष्य का बेजोड़ आख्यान है। उपन्यास में भूमंडलीकरण और उदारीकरण के दौर के यथार्थ रूप को मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया गया है।
उपन्यास में केंद्रीय पात्र रघुनाथ की व्यवस्थित और सफल जि़ंदगी चल रही है, सब कुछ उसकी योजना और इच्छा से चलता रहता है। अचानक कुछ ऐसा घटित होता है कि अच्छी चीज़ें टूटने बिखरने, बरबाद होने लगती हैं। इस महाबली आकांक्षा के प्रतिरोध का जो रास्ता उपन्यास के अंत में अख्तियार किया गया है वह न केवल विलक्षण और अचूक है बल्कि ‘रेहन पर रग्घू‘ को यादगार व्यंजनाओं से भर देता है।
उपन्यास की स्त्री पात्र सरला रघुनाथ की बेटी है। वह अपने अस्तित्व को पहचानने और सार्थकता की दिशा तलाशने की कोशिशों में जुटी मिलती है। पिता उसके लिए आए दिन वर ढूँढते हैं। लेकिन उन्हें निराशा हाथ लगती है। समाज में दहेज 
जैसी और कई बुराइयां विद्यमान हैं। सरला अपने इलाके की वह पहली बी.ए., बी.एड. है। वह एक स्कूल में नौकरी करती है।

सरला अपनी इच्छा से जीवन जीना चाहती है साथ ही वह अपना विवाह भी अपनी पसंद से करना चाहती है। वह अपने भविष्य के प्रति सचेत है। उसका कथन है- "शादी मैं करूंगी लेकिन अपनी शर्तों पर, आप मेरी ‘स्वाधीनता‘ दूसरे के हाथ बेच रहे थे। यहां मेरी स्वाधीनता सुरक्षित है, आप अतीत और वर्तमान से आगे नहीं देख रहे थे। मैं भविष्य देख रही हूं जहां स्पेस ही स्पेस है।"


काशीनाथ सिंह अपनी शैली के लिए जाने जाते हैं। छोटे-छोटे वाक्य और तीक्ष्ण संप्रेषणीयता भी इस उपन्यास की विशेषता है। सहज भाषा में भी गंभीर खतरों की तरफ आकृष्ट करने में काशीनाथ जी का कोई जवाब नहीं। काशीनाथ सिंह के शिल्प से किसी भी कथाकार को ईर्ष्या हो सकती है। संक्षेप में कहें तो ‘रेहन पर रग्घू‘ बीते दो दशक के यथार्थ का ऐसा औपन्यासिक रूपांतरण है जो काशीनाथ सिंह और हिंदी उपन्यास दोनों को एक नयी गरिमा प्रदान करता है

नई सदी के उपन्यासों से जो तथ्य उभरते हैं उस आधार पर कहा जा सकता है कि समकालीन हिंदी उपन्यासकारों ने दो उद्देश्यों से उपन्यास साहित्य की रचना की है। एक सामाजिक विकृतियों का निवारण, दूसरा राजनैतिक गतिविधियों, षडयंत्रों एवं कूटनीति के कारण पनपती बुराइयों का परिष्कार करने हेतु की है। समकालीन उपन्यासकारों ने आधुनिक नारी की मानसिकता को प्रभावपूर्ण रूप में प्रस्तुत कर गंभीरतापूर्ण पाठक का ध्यान उनकी ओर केंद्रित किया है। इनके अलावा दलित विमर्श की बदलती मान्यताओं, आदिवासी जीवन के सच और पर्यावरण प्रदूषण की समस्या के बढ़ते जहर संदर्भों का उद्घाटन कर बाह्य जीवन की बारीकियों का जितना सूक्ष्म निरीक्षण अपेक्षित होता है, वह सब समकालीन उपन्यासों में दृष्टव्य है।

 

 

सन्दर्भ ग्रंथ-

 
विद्यासागर नोटियाल, झुंड से बिछुड़ा- 2008
पंकज बिस्ट, उस चिड़ियां का नाम
डॉ. अरुणा श्याम, मितवा- 2007
कामतानाथ, पिघलेगी बर्फ- 2006
डॉ. रामदरश, परिवार- 2006
काशीनाथ सिंह, रेहन पर रग्घू- 2008

- डॉ. मोनिका देवी
 
रचनाकार परिचय
डॉ. मोनिका देवी

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