अगस्त 2016
अंक - 17 | कुल अंक - 54
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

जो दिल कहे
हम सब शिकार होंगे, इंतजार में रहिये....!
 
 
बुलंदशहर काण्ड कोई अकेली घटना नहीं है। यह किसी गैंग की कारिस्तानी नहीं है। और इसे न तो कोई मुख्यमंत्री रोक सकता है, न कोई प्रधानमंत्री। यह आइसोलेशन में घटी घटना नहीं है।
रिक्शावाला जब किसी महिला सवारी को बिठाता है तो देखिये उसकी आँखों में लालच का पानी। एक ऑटो ड्राइवर जब किसी युवती या बच्ची को बिठाता है तो देखिये उसकी नजर। वह आधा वक्त मिरर में ही देखता रहता है। बस कंडक्टर, ड्राइवर को देखिये, हवस होती है उनकी आँखों में। न न। जो रेप नहीं करता या नहीं किया, वह भी रेपिस्ट होता है। स्त्रियां समझती है।
 
दूर मत जाइये, अपने पास के बाजार में सब्जी वाले लौंडो की बातें सुनिये, फल बेचने वाले लड़कों की बातें सुनिये, उनके द्विअर्थी संवाद सुनिये, केला, बाबूगोशा, नासपाती, संतरा के कई कई मांयने बनाये होते हैं। वे रिपीटेडली रेप करते हैं, बातों से, नज़रों से। स्त्रियां रोज़ झेलती हैं।
स्कूल की बच्चियों से पूछिये, कैसे देखता हैं उन्हें गार्ड, स्कूल बस का कंडक्टर, ड्राइवर, माली और उनका टीचर भी। स्कूल टीचर से पूछिये, कहाँ कहाँ कैसे कैसे बचती हैं वे। काम वाली बाइयों से पूछिये। बैंक में काम करने वाली स्मार्ट वुमेन से पूछिये, पुलिस में काम करने वाली एम्पावर्ड वुमेन से पूछिये, सब टारगेट हैं। और उन्हें कोई एलियन टारगेट नहीं कर रहा।
 
कल ही धनबाद आनंदविहार समर स्पेशल ट्रेन से धनबाद से लौट रहा था। ट्रेन थोड़ी खाली-सी थी। एक अकेली लड़की भी लौट रही थी। पूरा ट्रेन उसे ऐसे घूर कर देख रहा था मानो चबा जायेंगे, पी जायँगे। चार-चार डिब्बे दूर तक खबर पहुँच चुकी थी कि एक लड़की अकेली है। फेलो-पैसेंजर की छोड़िये, पेंट्री वेंडर तक की नजरें स्कैन कर रही थी उसे। वह ऊपर वाली सीट में लगभग दुबकी ही रही। यह किसी रेप से कम नहीं होता।
 
अपने आसपास देखिये। रेल में देखिये। मेट्रो में देखिये। हवाईअड्डे पर देखिये। किसी अकेली लड़की को घूरती नज़रों को देखिये। शरीफ लोग स्कैन कर लेते हैं उन्हें। ये सब एक तरह से रेप ही है। स्त्रियां रोज़ गुज़रती हैं इस पीड़ा से।
देखिये कभी अपनी पुलिस को भी। स्त्रियों के प्रति उनका नजरिया कभी अनौपचारिक बातचीत में सुनिये। घर से निकलने वाली हर औरत उनके लिए ख़राब है, और घर के भीतर वाली औरतें चीज़।
यह समस्या क़ानून व्यवस्था की नहीं है। यह शिक्षा की भी नहीं है। यह समस्या सोशल कंडीशनिंग की है। जहाँ चारो ओर केवल यही सिखाया जाता है कि स्त्री केवल स्त्री है। माल है, उपभोग की चीज़ है। इसका न किसी पोलिटिकल पार्टी से सम्बन्ध है, न किसी राज्य से। सब जगह एक ही सोच है। स्त्री एक चीज़ है।
 
रोज़ ही बुलंदशहर, रोज़ ही निर्भया काण्ड होता है हमारे बीच। यह कोई ऑर्गेनाइज़्ड क्राइम नहीं है कि पुलिस पेट्रोलिंग, मुखबिर से, इंटेलिजेंस के सपोर्ट से रोक लेंगे आप।
और हाँ , कभी लोकल संगीत को देख लीजिये, किसी भी भाषा में देख लीजिये, उत्तर से दक्खिन तक, पूरब से पश्चिम तक, कितना गन्दा है वह, कितना हिंसक है वह। साथ ही, कितनी सहजता से उपलब्ध है पोर्न।
ये सब कॉकटेल बना रहे हैं। समाज को हिंसक बना रहे हैं और बलात्कारी पैदा कर रहे हैं।
 
और हम सब शिकार होंगे, इंतजार में रहिये....!

- अरुण चन्द्र रॉय

रचनाकार परिचय
अरुण चन्द्र रॉय

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