प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
जून 2016
अंक -53

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

आलेख

विभाजन का दंश और ‘बस्ती’: डॉ. आलोक कुमार सिंह

 
साहित्य के इतिहास को राजनीतिक घटनाओं के संदर्भ में देखना कहाँ तक न्यायसंगत है, यह विवाद का विषय हो सकता है लेकिन राजनीतिक घटनाओं का साहित्य पर तुरंत या बाद में प्रत्यक्ष या परोक्ष प्रभाव पड़ता ही है। उपन्यास में यह प्रभाव हमेशा से दिखाई पड़ता रहा है, क्योंकि यथार्थ से संलग्नता ही उसकी पहचान है। देश विभाजन ने लगभग पूरे उत्तर भारत को साम्प्रदायिकता की ज्वाला में धकेल दिया। इन साम्प्रदायिक दंगों में हजारों व्यक्ति मौत के घाट उतार दिए गए, लाखों विस्थापित हो गए, स्त्रियों और बच्चों के साथ अमानुषिक अत्याचार किए गए और पूरे देश की एक विशाल जनसंख्या को अपना वतन छोड़कर भारत या पाकिस्तान में नए सिरे से बसना पड़ा। यह एक अनहोनी और अमानवीय त्रासदी थी, जिसे अनेक उर्दू उपन्यासकारों ने अपने उपन्यास का विषय बनाया। भारतीय संविधान लागू होने के बाद भारत धर्म और जाति निरपेक्ष राष्ट्र बन गया, पर साम्प्रदायिक समस्या आज भी ज्यों की त्यों बनी हुई है।1 उर्दू उपन्यासकारों ने देश में बढ़ते साम्प्रदायिक उन्माद की परिस्थितियों और उनके कारणों की तलाश करने की कोशिश की है।
 
हिन्दू-मुसलमान का आपसी प्रेम और सौहार्द किस प्रकार की राजनीति की भेंट चढ़ जाता है। ये यथार्थ है कि इन दोनों ने आजादी की लड़ाई साथ मिलकर लड़ी थी। पर आजादी मिलने की पूर्व संध्या में धूर्त राजनीतिज्ञों ने मजहब को कौम का आधार घोषित कर हिन्दुओं और मुसलमानों को दो कौमों में बाँट दिया और देश का बँटवारा कर दिया। देश के बँटवारे के बाद भारत में रह गये मुसलमानों के सामने अपने अस्तित्व की अनेक समस्याएँ पैदा हो गयीं। उनके परिवार टूट गए, जमींदारी चली गयी, आर्थिक स्थिति बदहाल हो गई। कालांतर में हिन्दू राजनीतिज्ञ इसका फायदा उठाकर उन्हें राजनीति का मोहरा बनाने लगे।
 
उर्दू उपन्यासकारों ने अपने उपन्यासों में साम्प्रदायिकता का सजीव चित्रण कर साम्प्रदायवाद और उसके भीतर से पनपते हुए फासीवाद के भयानक चेहरे को उभारने का प्रयास किया है। तस्लीमा नसरीन, कुरर्तुल-एन हैदर, अब्दुल्लाह हुसैन, अब्दुस्समद, सलाम आजाद, शौकत सिद्दीकी आदि उर्दू के सशक्त हस्ताक्षर हैं। जिन्होनें विभाजन के दंश को अपने लेखन में उतारा है। साम्प्रदायिकता का यह विमर्श इन उपन्यासकारों की पीड़ा की गहरी अनुभूति से प्रेरित विमर्श है। इस विमर्श में एक ऐसी वैचारिक तटस्थता, ईमानदारी और संवेदनशीलता है, जो पाठक को तिलमिला और विचलित करती है। सत्ता और सम्पत्ति हासिल करने के लिए राजनीति और सम्प्रदायवादी शक्तियाँ किस प्रकार आम आदमी को गुमराह कर उसकी शान्ति और सकून छीन लेती हैं तथा उसकी जिन्दगी को नरक में तब्दील कर देती है, इस तथ्य का भावपूर्ण चित्रण ही इन उपन्यासों का प्रतिपाद्य रहा है।
 
‘बस्ती’ इन्तजार हुसैन का प्रसिद्ध उपन्यास है। वह भारत-पाकिस्तान के सम्मिलित उर्दू कथा साहित्य के प्रमुख साहित्यकार हैं। यह उपन्यास उन्नीस सौ बयासी में लिखा गया है। इस उपन्यास को पाकिस्तान के सर्वोच्च पुरस्कार 'आदम जी प्राइज़' से सम्मानित किया गया है।
‘बस्ती’ एक मुआशरा या आबादी या शहर भी है और पूरा देश या सम्पूर्ण उपमहाद्वीप भी। उपन्यास में जिन स्थानीय ऐतिहासिक हवालों की भाषा में बात की गई है, उनकी दृष्टि से इस स्पष्टीकरण की आवश्यकता नहीं कि यह बस्ती कौनसी बस्ती है और यह परिवेश कौनसा परिवेश है। यह सीमित प्रकृति की कलात्मक संरचना नहीं क्योंकि इसमें पौराणिक और कथात्मक तत्वों के मिश्रण से आन्तरिक आत्मालाप के प्रभाव से सार्वभौमिक वातावरण उत्पन्न हो जाता है।2
इस उपन्यास की पृष्ठभूमि में 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध को आधार बनाया गया है। इस युद्ध की विभीषिका से भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश तीनों बुरी तरह से प्रभावित होते हैं। बहुत से घर परिवारों को अपनी जन्मभूमि छोड़कर इधर से उधर विस्थापित जीवन यापन करना पड़ता है। उपन्यास का प्रमुख पात्र जाकिर है। उसे रूपनगर (हिन्दुस्तान) से अपने अम्मी-अब्बू के साथ व्यासपुर (पाकिस्तान) आना पड़ता है। अपनी जड़ों से कट कर नई जमीन में स्वयं को स्थापित करने की चुनौती उन सभी के सामने होती है।
 
जाकिर भी अपनी जमीन और उनसे जुड़ी यादों को कभी भुला नहीं पाता। यह टीस रह-रहकर उसे सालती रहती है। पाकिस्तान आकर भी वह अपनी जन्मभूमि को भुला नहीं पाता। स्थिति यह थी कि पाकिस्तान में भी रूपनगर को ढूँढता रहता है- "जब पाकिस्तान अभी नया-नया था, जब पाकिस्तान का आसमान ताजा था, रूपनगर के आसमान की तरह और जमीन अभी मैली नहीं हुई थी। किस तरह उन दिनों काफिले कोसों चलकर यहाँ पहुँच रहे थे। रोज कोई काफिला शहर में दाखिल होता और गलियों-मोहल्लों में बिखर जाता। जिसे यहाँ सिर छुपाने के लिए कोना मिल गया, वहाँ पसर गया। जिसे बड़ा मकान हाथ आ जाता, वह पहले अपनी खुशी से, फिर मुरब्बत में आने वालों को पनाह देता चला जाता, यहाँ तक कि वह बड़ा मकान तंग नजर आने लगता।"3  इसी तरह भारत और बांग्लादेश से लोग स्वयं को सुरक्षित समझकर पाकिस्तान की जमीन पर आते चले जाते हैं- "किस तरह देखते-देखते शामनगर के मकान खुले से तंग होते चले गये और दिलों में गुंजाइश कम होती चली गई। काफिलों का ताँता टूट चुका था। बस कभी कोई इक्का-दुक्का आदमी, कभी कोई छोटा-मोटा खानदान आ निकलता, शामनगर में भटकता फिरता। कहीं सिर छुपाने की जगह न मिलती। शामनगर के सब मकान भर चुके थे, जो खुले पड़े थे वे भी, जो तालाबंद थे वे भी, जो अधबने रह गये थे वे भी।"4
 
यह स्थिति दिन-प्रतिदिन विकट होती जाती है। 1971 के युद्ध की भीषण परिस्थितियों के बीच सामान्य जनजीवन बुरी तरह प्रभावित होता है। भारत से भरा-पूरा परिवार और खानदान छोड़कर आने वालों की संख्या अनगिनत है। "यहाँ से पूरे-पूरे खानदान पाकिस्तान चले गये और पीछे कोई एक मर्द रह गया है। मगर यह मर्द आमतौर पर बूढ़ा आदमी पाया गया है। अकेले रह जाने वाले उन बूढ़ों को जायदाद के ख्याल ने नहीं रोका है, कब्र के ख्याल ने रोका है। जायदाद का क्या है, उसका तो पाकिस्तान में जाकर क्लेम दाखिल किया जा सकता है और जाली क्लेम दाखिल करके हर छोटी जायदाद के बदले में बड़ी जायदाद हासिल की जा सकती है। मगर कब्र का कोई क्लेम दाखिल नहीं किया जा सकता।"5
 
जाकिर तो पाकिस्तान आ जाता है लेकिन उसके बहुत से रिश्तेदार भारत में ही रह जाते हैं। जिनसे बिछड़ने का दर्द वह और उसका परिवार पल-पल महसूस करता रहता है। रह-रह कर उनसे बिछड़ने का दर्द वे झेलते रहते हैं। ये सब तो किसी तरह अपनी जमीन-जायदाद छोड़कर पाकिस्तान आ जाते हैं पर उनके रिश्तेदार वहीं रह जाते हैं। 1971 की जंग में उन्हें यह खबर तक नहीं मिल पाती कि वे सभी वहीं हिन्दुस्तान में हैं या बांग्लादेश चले गये। सभी एक दूसरे की खबर पाने के लिए बेचैन रहते हैं। स्थिति यह हो जाती है कि "कोई हिन्दुस्तान की राह बस्ती-बस्ती खाक छानता, छुपता-छुपाता पहुँचा। किसी ने उस संकट से निकल नेपाल की राह ली और वहाँ से यहाँ आने का डौल निकाला। कोई बर्मा में निकल गया और वहाँ से कष्ट झेलता वापस हुआ। बहुत से हिन्दुस्तान में कैद भुगत कर वापिस हुए। बस फिर ताँता लग गया। कैदी और लापता लोग वापिस आते चले गये। लगता था कि सब ही वापिस आ गये या शायद जैसे न कोई गया, न गुम हुआ, न कम हुआ।"6
इसके बाद भी जाकिर के परिवार वाले अपने अपने भाई-बन्धुओं से मिलने को तरसते रहे। जाकिर की ही तरह और भी ऐसे परिवार हैं, जिनमें अफजाल, इरफान, सलामत, अजमल, जब्बार आदि हैं जो खुद के अस्तित्व को बनाये रखने के लगातार संघर्ष करते हैं।
 
पूर्वी पाकिस्तान का बांग्लादेश के रूप में स्वयं को स्थापित करना पाकिस्तान के लिए असहनीय था। इस घटना से पूरा पाकिस्तान जल उठता है- "जंग के समय सभी जगहों पर ब्लैक आउट घोषित हो जाता है। ब्लैक आउट में मरघट जैसा वातावरण हो जाता है। क्या स्कूल, कॉलेज, सड़कें, दुकान सभी दंगे से प्रभावित होते हैं। कहीं धुंआ है, कहीं आग लगी है, सड़कें पत्थरों से पटी दिखाई देती हैं, चारों ओर हल्ला गुल्ला मचा रहता है। भगदड़ नारे, गालियाँ बरस रही हैं। इस सबके बाद सड़कें सूनी हो जाती हैं। थोड़ी-थोड़ी देर बाद सायरन बोलता, सायरन के साथ सीटियाँ बजतीं। ट्रैफिक के सिपाही और सिविल डिफैंस के रजाकार हर सड़क पर सीटियाँ बजाकर और इशारे करके हिदायतें देते नजर आते। सड़क-सड़क सवारियों की रफ्तार अचानक तेज हो जाती .....। धीरे-धीरे सड़कें खाली हो जातीं.......ट्रैफिक का सारा शोर, शहर की सारी आवाजें बन्द चारों तरफ ठहराव और खामोशी।"7 इस वातावरण का प्रभाव सामान्य जन पर भी पड़ता है। जाकिर भी इस सब के बीच दहशत में जीवन यापन करने को बाध्य है। युद्ध की विभीषिका ऐसी है कि मनुष्य का मनुष्य से विश्वास उठ सा गया है। कब किस जगह बम गिर जाये कुछ पता नहीं। सभी घरों में दुबके बैठे रहते हैं। जाकिर स्वयं को असहाय व निरीह महसूस करता है। वह सोचता है- "जहाँ मैंने इतने दुख सहे हैं, जहाँ बैठकर मैंने रूपनगर को इतना याद किया है और अपनी याद में अब तक जिंदा रखा है, इसे अगर कुछ हो गया तो मैं क्या करूँगा? मैं अपने दुःखों को याद रखना चाहता हूँ। बस्ती बरबाद होती है तो उसके साथ वे दुख भी खामोश हो जाते हैं, जो वहाँ रहते हुए लोगों ने सहे होते हैं। इस जंग के मारे वक्त की खूबी यह है कि हमारे दुख हमारी यादें नहीं बन पाते।"8  जाकिर को रह रह कर रूपनगर की याद सताती है। वहाँ के पेड़, दरख्त, हवायें, मकान, दुकान, गलियाँ, बस्ती, पड़ोसी और अपने बचपन और बचपन के साथी सब कुछ पल पल उसे भीतर तक कुरेदता रहता है।
 
इस जातिगत बँटवारे से किसी को क्या मिला। क्या हिन्दू और क्या मुसलमान? किसी को भी इस बंटवारें ने किसी भी तरह का सुकून नहीं दिया। क्या भारत और पाकिस्तान और क्या ही बांग्लादेश। युद्ध के हाथों पड़कर सभी ने गहरे जख्म खाये। 1971 सभी के लिए नासूर सा बन गया। आज भी इसके दर्द को भुलाया नहीं जा सकता है। कितनी कितनी पीढ़ियाँ तब से गुजर गयीं पर ये टीस अभी तक जस की तस है और साहित्य में सजीवता से इसका अंकन हुआ है।
इस युद्ध के परिणाम स्वरूप सामान्य जन ने जिस दर्द को महसूस किया, उसका अति सूक्ष्म विश्लेषण ‘बस्ती’ उपन्यास में हुआ है। जाकिर के माध्यम से उपन्यासकार ने सामान्य जन के दैनिक जीवन पर हो रहे प्रभाव का सजीव चित्रण किया है।
 
 
 
संदर्भ-
1. कुमार अजय, 'हिन्दी उपन्यासों का साम्प्रदायिक संदर्भ', पूर्वोद्धृत, पृ. 122-25
2. नारंग, गोपीचन्द, उर्दू पर खुलता दरीचा, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2005, पृ. 350
3. हुसैन, इन्तज़ार, बस्ती, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, 2009, पृ. 84-85
4. हुसैन, इन्तज़ार, बस्ती, पृ. 87
5. हुसैन, इन्तज़ार, बस्ती, पृ. 127
6. हुसैन, इन्तज़ार, बस्ती, पृ. 198
7. हुसैन, इन्तज़ार, बस्ती, पृ. 146
8. हुसैन, इन्तज़ार, बस्ती, पृ. 153

- डॉ. आलोक कुमार सिंह
 
रचनाकार परिचय
डॉ. आलोक कुमार सिंह

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