प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
जून 2016
अंक -53

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

मूल्यांकन

सहमी हुई सिसकियों की अनुगूँज ' मेरी लोकप्रिय कहानियाँ' : डॉ. सीता शर्मा

 
 
 
हिन्दी की प्रसिद्ध लेखिका डॉ. सूर्यबाला के इस कहानी संग्रह में मध्यम वर्गीय चरित्रों का विभिन्न जीवन परिस्थितियों में आंतरिक संत्रास अपने विविध रूपों के साथ उद्घाटित हुआ है, यहाँ सिर्फ़ आधी आबादी का ही दर्द नहीं है अपितु स्त्री-पुरूष की अंतस पीड़ा को लेखिका ने कई कोणों से उभारा है।
यहाँ परिस्थिति विपर्यय के साथ विद्रोह नहीं है। कोई भी पात्र बाहरी तौर पर अपनी शक्ति और साहस का परिचय देता प्रतीत नहीं होता और ना ही लेखिका ने इसकी आवश्यकता अनुभव होने दी है। प्रत्येक पात्र किसी न किसी स्तर पर आंतरिक मानसिक त्रास को भोगने हेतु सहज रूप से तत्पर है। सभी पात्र सहमें हुए हैं, मुखरता इनके व्यक्तित्व का अंग नहीं है। निरंतर सालते त्रास में यदि कुछ शेष है तो सिर्फ 'सहमी हुई सिसकियों की अनुगूँज’।
 
’रमन की चाची’ कहानी में सामंतवादी क्रूर व्यवस्था प्रदत्त पीड़ा है, 'हाँ पलाश के फूल नहीं ला सकूँगा' में अधूरी प्रेम कथा है, जिसमें खूकी की आजीवन प्रेम प्रतीक्षा और अनूप की जरा-सा साहस न दिखा सकने की उदासीनता पाठक को गहरे तक टीस दे जाती है। 'न किन्नी न' में हँसी-खुशी चलता कथानक एकदम से ग़मगीनी में बदल जाता है; किन्नी की किशोरवय की प्रेम कहानी प्रौढ़ावस्था में जाकर पूर्णता पाती है। यह दोनों कहानियां भावनाओं को व्यक्त न कर सकने की एक अटपटी-सी विवशता के लिए हैं।
 
'सुम्मी की बात' भी स्त्री विमर्श की परिचायक कहानी है। कहानी संग्रह की कई कहानियाँ आज भी भारतीय सामंती बेडि़यों की पीड़ा को व्यक्त करती हैं किन्तु अधिकांश पात्रों ने अपनी सोच रूपी जंजीरों से स्वयं को बंदी बना रखा है। रमन की चाची के पति का एक कथन दृष्टव्य है- ". . . . . वह धीमी मुस्कुराहट- दर्द से छटपटा रही थी, लेकिन यह दर्द एड़ी के जहरीले घाव से कहीं ज्यादा मर्मातंक था। यह दर्द उस मूढ़ दंभ और तिरस्कार का था, जिसने उसे दुरदुराते हुए कहा था- "मैं टिकुली, बिंदी लाने वाला जोरू का गुलाम हूँ क्या- तू फूहड़ ही नहीं, बेशरम भी है।"
'सुम्मी की बात' कहानी में स्त्री विमर्श के आयाम का एक उदाहरण देखिए- "मम्मी सुनते ही उसकी आँखों के सामने चाय का डिब्बा और गैस पर पतीले में खौलता पानी आ जाता है। 'बीबी जी' सुनते ही किचन की गंदी मोरी और 'सुनो' से ताजे अखबार का वह गोल घेरा, जिसके बीचों बीच बैठे उसके पति, ........ पति की 'सुनो' सुनते ही वह कोई भी काम करती होती, उसे छोड़कर बेतहाशा दौड़ पड़ती है। उसे दौड़ते देखकर उसकी बेटियाँ हँस पड़ती हैं और हँसती हुई एक दूसरे से कहती हैं, "दौड़ती हुई मम्मी कितनी फ़न्नी लगती हैं न?"
 
'न किन्नी न' में एक अच्छे मालोपमा के माध्यम से प्रेमी स्त्री मन की कष्टकारी विवशता का मार्मिक चित्रण देखिए- "और मेरा मन जाने कितने कोष्ठकों में विभक्त फड़फड़ाता रहा। कभी मोरपंख-सा झलझलाता, कभी टिटहरी-सा द्विधाग्रस्त हो चीख-चीखकर मँडराता फिरता और कभी गौरैया -सा सहम कर दुबक जाता। एक मन दूसरे से उलझता, तीसरे को संभालता, समझाती और अवश उत्तेजना के ऊपर एक सपाट चादर डालकर कॉलेज चला जाता।"
 
इन कहानियों में प्रमुख रूप से स्त्री पात्रों की घुटन व संत्रास के विविध रूप पाठक को संवेदित करने के साथ ही झकझोरते हैं। यहाँ प्रेमचन्द के पात्रों की भाँति सामाजिक यथार्थ की कटुता नहीं है, ना ही प्रसाद के पात्रों की भाँति आंतरिक संघर्ष और मूल्यों की टकराहट है। यहाँ यदि है तो सिर्फ विवश एकांकीपन जो भरे-पूरे परिवार में भी हृदय के रह-रहकर हजारों टुकड़े करता है। कभी खूकी, कभी किन्नी कभी सुम्मी तो कभी रमन की चाची इसी एकांतिक पीड़ा से गुज़रती है।
 
’बाऊजी और बन्दर’ कहानी वृद्धजन उपेक्षा की मार्मिक अभिव्यक्ति है। बहुओं को पारिवारिक सदस्य के रूप में सास या ससुर नहीं चाहिए अपितु उपयोगी चौकीदार या माली के रूप में। उदाहण के लिए- "पता नहीं ये बूढ़े लोग मोह-माया का इतना ओवर स्टॉक क्यों भरे रहते हैं अपने दिल में। जब देखो तब उलीचने को तैयार। इनके दिल न हुए, मोह-माया के दलदल हो गए, जीना हराम!"
'........मौजीराम की झाड़ू' कहानी लेखिका की सूक्ष्म दृष्टि की परिचायक है। अपार्टमेंट के गार्ड का उचककर सलाम ठोकना अर्थात् व्यक्ति की उच्च प्रस्थिति को सूचित करता है। आज की मध्यम वर्गीय नारी की भुबुक्षा स्वयं को अन्य से ऊँचे स्टेटस का दिखाने की भी है।
 
’होगी जय ....... हे पुरूषोत्ततम नवीन्' कहानी आज के धन व सत्ता लोलुप भ्रष्ट युग में भी सत्यनिष्ठ मनुष्यों के लिए एक आशा की किरण है। ईमानदारी और सत्यता हमारे मूल्य का महान गुण नहीं गिने जाएँ अपितु मानव के स्वभाव होने चाहिए, यही प्रेरणा इसमें निहित है।
'मेरा विद्रोह' और 'माय नेम इश ताता' कहानियों में बाल मनोविज्ञान का स्तरीय सूक्ष्म चित्रण देखा जा सकता है। पुत्र का विद्रोह पिता के अहं को तोड़ने तक ही होता है और बाल मनोदशा हम सब में आदर्श व्यक्तियों को तलाशती है। बच्चों से किए गए वादे निभाना कितना महत्वपूर्ण होता है, उनके व्यक्तित्व निर्माण के लिए, यही इस कहानी की सफलता है।
हम संस्कारी  नयी पीढ़ी देखना तो चाहते हैं किन्तु उनके निर्माण में नींव की ईंटें ही अविश्वास से निर्मित कर दें तो परिणाम की आशा क्या करना?
 
’तोहफा’ कहानी में आज के मध्यम वर्ग की प्रदर्शन प्रियता में बालकों की बलि किस प्रकार चढ़ा दी जाती है, का मार्मिक चित्रण हुआ है।  वी.आई.पी. या माई बॉस जैसे शब्दों ने दुनियाँ में तहलका मचा रखा है। इसी विसंगति को इसमें व्यक्त किया गया है।
विषयवस्तु की दृष्टि से सभी कहानियाँ आंतरिक सत्य की उद्घाटिका है, जिनमें स्त्री विमर्श के विविध तरंग धैर्य हैं। अधिकांश कथानक आरम्भ में बोझिल प्रतीत होते हैं क्योंकि लेखिका के कथन द्वारा पाठक से उनका परिचय नहीं कराया जाता और ना ही कथन से पूर्व पात्र का नाम सांकेतित है अतः पाठक को कथा के अन्दर घुसने में और कथा को पाठक के अंदर घुसने में जटिलता का आभास होता है किन्तु आगे जाकर यह समस्या कम होने लगती है जब संवाद चरित्र चित्रण का माध्यम बनते हैं।
 
यहाँ प्रत्येक कथा में एक प्रमुख पात्र ही सूत्रधार के रूप में प्रस्तुत हुआ है। यहां सूत्रधार पुर्लिंग है और स्वयं भोगता व दृष्टा भी।  यह प्रयोग भी सुष्ट है और विशिष्ट भी।
शब्दों के साथ लेखिका खूब खेली है। कई स्थानों पर नवनिर्माण भी किए हैं। अंदाजने, महसूसने, टटकोरने जैसे शब्दों ने अर्थगाम्भीर्य में वृद्धि की है।
केवल एक स्थान पर लेखिका स्वयं को रोक सकने में अक्षम रही, जब रमन की चाची कहानी में उनकी पात्र की पीड़ा और उसकी घुटन को व्यक्त करने में उनका सूत्रधार पात्र चूंकि उम्र में छोटा है तो लेखिका स्वयं विवश हो जाती हैं ,उसकी पीड़ा और कष्ट को पाठक तक पहुंचाने के लिए; "इसके सामने अम्मा, ताई दर्जनों मवेशियों सी थन फैलाए कुछ बुढ़ाती औरतों के चेहरे मुझे हास्यास्पद लगने लगे।" रेखांकित वाक्यांश एक किशोर की क्षमताओं से परे है जो कि आक्रोशित लेखक मन की अभिव्यक्ति है।
यही एक सच्चे रचनाकार की रचना धर्मिता है कि वह अपने प्रत्येक पात्र को स्वयं में जीता है, महसूसता है, इसीलिए सम्भवतया कवि महाप्राण निराला ने यह कहा है-
"मैंने मैं शैली अपनाई।
देख एक दुःखी निज भाई।
दुःख की छाया पड़ी हृदय पर,
झट उमड़ वेदना आई।
मैंने मैं शैली अपनाई।"
 
कई स्थानों पर वाक्यांश प्रयोग अच्छे बन पड़े हैं- 'न किन्नी न' में- "ताजे अखबार के बुलेटिनों की तरह नई नियुक्तियाँ, नई तरक्कियां और योजनाओं से भरे सफों की तरह पलटते जा रहे सप्ताह, महीने और साल!
इसी प्रकार "शादी मेरी नहीं हुई थी। इसे सुधारकर- 'मैंने नहीं की थीं। कर लीजिएगा, क्योंकि अपने विवाह के लिए दहेज जुटा पाने की मेरी हैसियत नहीं थी, इसे सुधारकर 'दहेज जुटाने के पक्ष में मैं नहीं थी' कर लीजिएगा।
 
भाषा स्तरीय खड़ी बोली हिन्दी में यत्र-तत्र अंग्रेजी के शब्द स्थान पा गए हैं। सूर्यबाला जी की शैली अपने ही तरीके की है, यहां वक्ता, दृष्टा, भोक्ता और सूत्रधार, सर्जक ही है। ज्ञात करना कठिन है। 'कंगाल', 'इज का टीका' और 'एक इन्द्रधनुष जुवेंदा के नाम' कहानियाँ पाठकीय आल्हाद की माध्यम नहीं बन सकी हैं। शेष में आधुनिक जीवन विसंगतियों के साथ विभिन्न शिल्प प्रयोगों से छवित नगरीय बोध के पाठकों के लिए उपयोगी हैं। यहाँ न लोक है, न लोक संस्कृति। निश्चित रूप से यह संग्रह उनके अन्य संग्रहों की भांति ही पठनीय और उपयोगी सिद्ध होगा। 
 
 
 
 
समीक्ष्य पुस्तक- मेरी लोकप्रिय कहानियाँ
लेखिका- डॉ. सूर्यबाला
प्रकाशन- 2015

- डॉ. शीताभ शर्मा